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Sunday, October 11, 2026

सीताराम शुक्ल स्वतंत्रता सेनानी कवि - आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


डॉ. मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी के शोध प्रबंध: “बस्ती के छंदकार” के अध्याय 3 तृतीय चरण के फुटकर छंदकारों की सूची में पंडित सीताराम शुक्ल जी का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इसे

बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान , भाग 2, प्रकाशन वर्ष 2008 के

पृष्ठ 233 पर अति संक्षेप में अधिसूचित

किया गया है। श्री सीताराम शुक्ल जी का जन्म बस्ती-बांसी मुख्य मार्ग पर बस्ती से 13 किमी दूर वर्तमान में भानपुर तहसील के बस्ती - बांसी मार्ग पर सल्टौआ ब्लॉक में स्थित भादी खुर्द में गांव में श्री रंगनाथ शुक्ल व सूर्यकली के घर में 1897 ई.में हुआ था। इनका विवाह किशोरी शुक्ला से हुआ था। बस्ती में कांग्रेस की नींव रखने वाले सीताराम शुक्ल गुलामी के कारण प्राइमरी शिक्षा भी पूरी नहीं कर सके थे, लेकिन स्वाध्याय से हिंदी, उर्दू, संस्कृत की जानकारी इनको हासिल थी। गुलामी की जंजीर इन्हें स्वीकार नहीं थी। पति-पत्नी दोनों ने स्वतंत्रता आंदोलन की राह पकड़ ली थी।वर्ष 1919 में नासिक में कांग्रेस अधिवेशन में शुक्ल जी ने व्याख्यान दिया था , जिसके बाद वे ब्रिटिश सरकार की निगाह में आ गए थे। आजादी की लड़ाई में उनकी गाथा आज भी इतिहास के पन्नों में अमर है। उन्होंने इस लड़ाई में अपना सब कुछ दान कर दिया था। 


कई बार जेल भी गये -

नासिक अधिवेशन से लौटने के बाद बस्ती में कांग्रेस के संस्थापकों में रहने वाले सीताराम शुक्ल ने सभी आंदोलनों को लीड किया था और पांच बार जेल गए थे। 

1922 के असहयोग आंदोलन में शुक्ल को एक वर्ष, 1930 में नमक सत्याग्रह में छह माह, 1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में छह माह, 1940 के व्यक्तिगत सत्याग्रह में तीन माह व 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में दो वर्ष का कारावास हुआ था। कुल मिलाकर उन्होंने चार साल तीन माह की सजा काटी थी। 


सीताराम शुक्ल  के घर रुके नेहरू जी

19 सितंबर 1921 पंडित जवाहर लाल नेहरू की एक जनसभा गोरखपुर में होनी थी। अंग्रेजों ने सभा निरस्त कर गिरफ्तारी का आदेश दिया। 20 सितम्बर को नेहरू जी सीताराम शुक्ल के घर पहुंचे। यहीं पर गोरखपुर जनपद (जिसमें बस्ती जिला भी शामिल था) की कमेटी का गठन किया। रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी को जिला अध्यक्ष, भगवती प्रसाद दुबे को उपाध्यक्ष, प्रसिद्ध आर्यसमाजी देवव्रत को महामंत्री तथा सीताराम शुक्ल को सहयोगी बनाया गया था। 1921 में गांधीनगर (पक्का-बजार) बस्ती में सीताराम शुक्ल के संयोजन में नेहरू जी की एक विशाल जनसभा कराई गई थी। विदेशी वस्तुओं की होली जलाई गई थी। नौ अक्टूबर 1929 को बस्ती के गांधीनगर में होने वाली जनसभा में भाग लेने आए नेहरू जी इनके घर पर रुके थे। हालांकि, धारा 144 लागू होने के चलते यह जनसभा निरस्त हो गई थी। नाराज सीताराम शुक्ल ने इसी दिन हथियागढ़ में जनसभा कराई थी, जिसको महात्मा गांधी व पंडित जवाहर लाल नेहरू ने संबोधित किया था।


हर्रैया से दो बार विधायक रहे -

आप उत्तर प्रदेश की प्रथम विधानसभा में विधायक रहे। 1952 उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में इन्होंने उत्तर प्रदेश के बस्‍ती जिले के 292 - हर्रैया (दक्षिण- पश्चिम) विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस की ओर से चुनाव में भाग लिया। उनका कार्यकाल 1952-57 तक था।1973 में स्वतंत्रता की 25वीं वर्षगांठ पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पंडित सीताराम शुक्ल एवं उनकी पत्नी किशोरी शुक्ल को दिल्ली बुलाकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रमाण-पत्र व ताम्र-पत्र देकर सम्मानित किया था। 


राजकीय सम्मान के साथ अंत्येष्टि  -

2 फरवरी 1977 को लखनऊ के सिविल अस्पताल में उनकी मौत हो गई थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका दाह संस्कार कराया था।


चौमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति-

शुक्लजी चौमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। वे वक्ता, गायक, वादक, घुड़सवार भी रहे । वे एक स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ-साथ एक प्रखर कवि और लेखक भी थे। उन्होंने  14 पुस्तको का लेखन भी किया जिसमें अधिकांश कृतियां उचित संरक्षण के अभाव में समय के साथ लुप्त (गायब) हो गईं। वर्तमान में उपलब्ध उनके साहित्य में सबसे प्रमुख और प्रामाणिक कृति स्वराज्य का रास्ता है।

स्वराज्य का रास्ता :  एकमात्र उपलब्ध कृति - 

गंगा पुस्तक माला कार्यालय, लखनऊ द्वारा हिंदी में 1939 में 129 पृष्ठों वाला यह ग्रन्थ प्रकाशित हुआ था। पंडित सीताराम शुक्ल द्वारा लिखित और 1939 में गंगा पुस्तकमाला कार्यालय, लखनऊ द्वारा प्रकाशित 'स्वराज्य का रास्ता' एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और राजनीतिक कृति है। यह पुस्तक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौर में स्वराज्य की अवधारणा, आर्थिक स्वावलंबन, स्वदेशी अपनाने और सामाजिक एकता पर जोर देती है, जो राष्ट्र निर्माण के लिए नागरिकों को मानसिक व सामाजिक दासता से मुक्त होने का संदेश देती है।


विद्वान वक्ता -

वे कुशल नेतृत्व कर्ता के साथ साथ विद्वान् वक्ता भी थे । उनका हिन्दी, संस्कृत, उर्दू, था अंग्रेजी पर समान अधिकार था। वह एक प्रतिष्ठित स्वतंत्रता सेनानी और वीर रस, राष्ट्रभक्ति व सामाजिक चेतना से ओतप्रोत रचनाएं करने वाले छंदकार थे। साहित्य और काव्य कला के क्षेत्र में, विशेषकर परंपरागत शास्त्रीय छंदों (दोहा, मनहरण कवित्त, और सवैया) की रचना में उनका गहरा अनुराग रहा है। उनके छंद पारंपरिक विधाओं जैसे कवित्त और सवैया में रचे गए थे, जो क्रांतिकारियों में जोश भरते थे। वे फुटकर कविता भी लिखते रहे हैं। उनके द्वारा रचित छंदों और इन तीनों पारंपरिक काव्य विधाओं का विवरण इस प्रकार है-


1. दोहा छंद -

दोहा एक मात्रिक अर्धसम छंद है। इसमें चार चरण होते हैं। इसके पहले और तीसरे चरण में 13-13 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। अंत में गुरु और लघु (।) का होना आवश्यक माना जाता है। इसके लक्षण: 13 + 11 = 24 मात्राएँ प्रति पंक्ति होती है।


2. मनहरण (कवित्त) छंद -

मनहरण को 'कवित्त छंद' भी कहा जाता है। यह एक प्रमुख वर्णिक मुक्तक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 31 वर्ण होते हैं। इसमें 16 और 15 वर्णों पर यति (विराम) होती है और प्रत्येक चरण का अंतिम वर्ण गुरु (काव्य रूप से दीर्घ) होता है। इसके लक्षण: 16 + 15 = 31 वर्ण होते हैं।


3. सवैया छंद -

सवैया एक वर्णिक सम वृत्त छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 22 से लेकर 26 वर्ण तक होते हैं। इसके अंतर्गत कई भेद आते हैं जैसे मत्तगयन्द सवैया, दुर्मिल सवैया, किरीट सवैया आदि, जो गणों (मगण, भगण आदि) के क्रम के आधार पर तय होते हैं। इनके लक्षण: 22 से 26 वर्णों का सुंदर संगीतात्मक प्रवाह होता है।

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