- संरक्षण के साथ महिलाओं को मिला जंगल की रखवाली का जिम्मा
वॉयस ऑफ बस्ती संवाददाता
असम। भारत-भूटान सीमा से लगे मानस नेशनल पार्क में जंगल को बचाने की कहानी अब सिर्फ बाघ, हाथी और गैंडे तक सीमित नहीं है। यहां वन्यजीवों के लिए प्राकृतिक आवास को दोबारा तैयार करने के साथ स्थानीय समुदाय को संरक्षण से जोड़ने की कोशिशों ने एक अलग तस्वीर सामने रखी है। कभी उग्रवाद, अतिक्रमण और अत्यधिक चराई जैसी चुनौतियों से प्रभावित रहे मानस में अब घासभूमियों के पुनर्स्थापन पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
मानस टाइगर रिजर्व में अपनाए जा रहे ‘ग्रास ट्रांसफॉर्मेशन’ के तहत उन क्षेत्रों को फिर से विकसित किया जा रहा है, जहां समय के साथ प्राकृतिक घासभूमि प्रभावित हुई थी। वन्यजीवों के लिए घास के मैदान केवल हरियाली का हिस्सा नहीं, बल्कि उनके पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। घास उपलब्ध होने पर शाकाहारी वन्यजीवों के लिए भोजन का आधार मजबूत होता है और यही आगे चलकर पूरे खाद्य तंत्र को प्रभावित करता है।
इस संरक्षण अभियान की एक खास तस्वीर जंगल में तैनात महिला वनकर्मियों के रूप में दिखाई देती है। हाथ में वायरलेस सेट और जरूरी उपकरण लेकर ये महिलाएं जंगल के संवेदनशील क्षेत्रों में गश्त कर रही हैं। कैमरा ट्रैप की निगरानी, वन्यजीवों से जुड़ी सूचनाओं का संकलन और जैव विविधता संबंधी आंकड़े जुटाने जैसे कार्यों में भी उनकी भूमिका है।
मानस टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर युवराज सिंह के अनुसार, जैव विविधता की दृष्टि से मानस बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जहां बाघ, हाथी और एक सींग वाला गैंडा जैसे वन्यजीव पाए जाते हैं। संरक्षण व्यवस्था को मजबूत करने के साथ स्थानीय महिलाओं को रोजगार और जिम्मेदारी से जोड़ना भी इस पहल का हिस्सा है। महिला कर्मियों को वन्यजीव व्यवहार, हथियार संचालन, प्राथमिक उपचार और जंगल में सुरक्षित रहने जैसी तकनीकों का प्रशिक्षण दिया गया है।
मानस की कहानी इस बात को सामने लाती है कि जंगल का संरक्षण केवल वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं रह सकता। प्राकृतिक आवास की बहाली, वन्यजीवों की निगरानी और स्थानीय समुदाय की भागीदारी जब एक साथ आगे बढ़ती है, तभी संरक्षण का असर व्यापक होता है। यहां घासभूमि की वापसी के साथ जंगल की पारिस्थितिकी को मजबूत करने और महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की कोशिश इसी बदलाव की तस्वीर पेश कर रही है।

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