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Sunday, September 6, 2026

शिक्षक: शिक्षा के कलाकार -श्री जयंत चौधरी


किसी को भी पहली बार पढ़ना सीखने का सटीक दिन याद नहीं होता। लेकिन लगभग हर व्यक्ति उन शिक्षकों को जरूर याद रखता है, जिन्होंने उसे पढ़ाया होता है। भूल जाने वाले पल और कभी न भुलाए जाने वाले व्यक्ति के बीच का यही अंतर हमें शिक्षण कार्य के बारे में कुछ बेहद जरूरी बातें बता जाता है। एक शिक्षक अपने पीछे ऐसी चीजें छोड़ जाता है, जिन्हें आसानी से आंक पाना संभव नहीं होता: कोशिश करने का आत्मविश्वास, डटे रहने का अनुशासन, सवाल पूछने की जिज्ञासा, या कभी-कभी मात्र यह भरोसा कि इंसान और भी बहुत कुछ कर सकता है। इसलिए, शिक्षण को एक कला से कम कुछ भी नहीं माना जा सकता।


भारत के महामहिम राष्ट्रपति द्वारा हर वर्ष प्रदान किए जाने वाले ‘राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार’ वास्तव में उन चुनिंदा लोगों के प्रति सम्मान होते हैं, जिनका योगदान दूसरों से कहीं बढ़कर रहा होता है। इन सबके अलावा, देश के हर कोने में – चाहे वह कक्षा हो या कौशल संबंधी प्रयोगशाला या पॉलिटेक्निक या खेल का मैदान या फिर संगीत कक्ष – विद्यार्थीगण धन्यवाद कहने का अपना-अपना तरीका ढूंढ ही लेते हैं। कभी हाथ से लिखी हुई एक टिप्पणी। कभी सुबह की सभा में आभार जताने का एक पल। कभी एक ऐसी खामोश सराहना जो दिन खत्म होने के काफी देर बाद तक शिक्षक के मन में बसी रहती है। ये कोई कमतर उत्सव नहीं हैं, बल्कि कई मायनों में ये सबसे सच्चे उत्सव हैं।

हालांकि, आंकड़े हमें एक और चिंताजनक कहानी बताते हैं। ओईसीडी का 2026 का ‘टीचर नॉलेज सर्वे’ किसी विषय की जानकारी होने और उसे पढ़ा पाने की क्षमता के बीच के अंतर की ओर इशारा करता है। इस सर्वेक्षण के निष्कर्षों से पता चलता है कि विषय का ज्ञान हमेशा कारगर शिक्षण-पद्धति में नहीं बदलता। बात बिल्कुल सरल, लेकिन बेहद जरूरी है: किसी चीज को गहराई से जानना और किसी दूसरे व्यक्ति को उसे सीखने में मदद करना - ये दोनों अलग-अलग कौशल  हैं। शिक्षण एक कला है और इसके लिए मानवीय रिश्तों एवं पढ़ाने के तरीकों की समझ के साथ-साथ कक्षा में थोड़ी नाटकीयता की भी जरूरत होती है।

यूनेस्को की ‘शिक्षकों से संबंधित वैश्विक रिपोर्ट 2024’ में इस पेशे की उपेक्षा करने की कीमत को आंकड़ों में दर्शाया गया है। दुनिया को 2030 तक 44 मिलियन अतिरिक्त प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षकों की जरूरत होगी। और, इनमें से आधे से अधिक की जरूरत केवल उन शिक्षकों की जगह लेने के लिए होगी जो नौकरी छोड़ रहे हैं। वहीं, मैकिन्से ग्लोबल इंस्टीच्यूट का अनुमान है कि स्वचालन (ऑटोमेशन) के कारण 2030 तक दुनिया भर में 75 मिलियन से 375 मिलियन कामगारों को अपना पेशा बदलना पड़ सकता है। ऐसी परिस्थिति में, योग्य शिक्षकों की अहमियत पहले से कहीं अधिक होगी।

भारत ने इस चुनौती को समय रहते भांप लिया है और इससे पूरी गंभीरता से निपटने की दिशा में कदम उठाए हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के तहत शुरू किए गए चार-वर्षीय ‘एकीकृत शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम’ में विषयगत निपुणता तथा शिक्षण-पद्धति को एक ही स्नातक कि डिग्री में शामिल किया गया है। इसका उद्देश्य सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को शिक्षण के पेशे की ओर आकर्षित करना है। सेवा में कार्यरत शिक्षकों के बीच एक जैसे मानक सुनिश्चित करने हेतु, ‘शिक्षकों के लिए राष्ट्रीय पेशेवर मानक (एनपीएसटी)’ के तहत करियर में तरक्की को मात्र वरिष्ठता के बजाय, पढ़ाने की असल गुणवत्ता से जोड़ा गया है। अलग-अलग क्षेत्रों में सीखने-सिखाने की प्रक्रिया का लाभ उठाने हेतु, ‘नेशनल मिशन फॉर मेंटरिंग (एनएमएम)’ शिक्षकों को अलग-अलग क्षेत्रों के मार्गदर्शकों (मेंटर) से सीखने के लिए व्यवस्थित सहायता प्रदान करता है। मैंने भी इस मिशन के लिए एक मेंटर के तौर पर पंजीकरण कराया है। माननीय प्रधानमंत्री हर वर्ष राष्ट्रीय पुरस्कार विजेताओं से न केवल बधाई देने के लिए, बल्कि उनकी बातें सुनने, जमीनी स्तर की उनकी कहानियां जानने और उनसे एक ऐसा दृष्टिकोण साझा करने के लिए भी मिलते हैं जो केवल अनुभवी नेतृत्व से ही प्राप्त हो सकता है। शिक्षण एक रचनात्मक काम है और अलग-अलग क्षेत्रों से सीखने-सिखाने की प्रक्रिया इस रचनात्मकता को नयापन प्रदान करती है।

भारत में ‘शिक्षक’ किसे माना जाए, इसका दायरा भी बढ़ाया जा रहा है और शायद यह सबसे अनूठा विचार है। ‘समाज में सभी के लिए आजीवन सीखने की समझ (उल्लास)’ यानी ‘न्यू इंडिया लिटरेसी प्रोग्राम’ इस सिद्धांत पर आधारित है कि हर साक्षर व्यक्ति एक निरक्षर व्यक्ति को पढ़ा सकता है। इस वर्ष जब हम ‘अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस’ मना रहे हैं, तो इस कार्यक्रम के तहत नौ राज्यों एवं केन्द्र-शासित प्रदेशों को पूरी तरह साक्षर घोषित किया गया है। शिक्षा मंत्रालय के 'विद्यांजलि' पोर्टल में भी यही भावना दिखाई देती है। यह पोर्टल 8.75 लाख से अधिक सरकारी स्कूलों को ऐसे वॉलंटियरों से जोड़ता है जो एक उपहार के रूप में अपनी विशेषज्ञताओं - चाहे वह नृत्य से संबंधित हो या गणित से या सार्वजनिक भाषण या फिर शिल्प से - को कक्षाओं में प्रदर्शित करते हैं। हर वॉलंटियर एक शिक्षक की भूमिका निभाता है। ये वॉलंटियर जो भी विषय पढ़ाते हैं, उसे बराबर का महत्व दिया जाता है। क्योंकि वास्तव में, शिक्षण कोई तकनीकी काम नहीं बल्कि एक कला है। हर अध्याय को पढ़ाने की योजना एक रचना जैसी होती है। हर व्याख्या एक प्रदर्शन सरीखी होती है।

कोई भी कला किसी भी कलाकार में भेद नहीं करती। इसलिए हमारे मन में ऊंच-नीच की जो भी धारणा है, उसे परख कर खत्म करना जरूरी है। कभी-कभी संगीत शिक्षक या शारीरिक शिक्षा के शिक्षक को पूरक और व्यावसायिक शिक्षा के प्रशिक्षक को वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर देखा जाता। यह वर्गीकरण न केवल अनुचित है, बल्कि पूरी तरह गलत भी है। परीक्षा का दबाव बढ़ने पर संगीत या व्यायाम मन को शांत कर सकते हैं, जिससे तैयारी में मदद मिलती है। भारत की बढ़ती रचनात्मक अर्थव्यवस्था (ऑरेंज इकोनॉमी) के साथ, अनेक कला रूप विद्यार्थियों को आधुनिक दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में से एक के लिए तैयार करेंगे। जैसे-जैसे खेल विश्वविद्यालय आकार ले रहे हैं और राष्ट्रीय खेल अवसंरचना को सुदृढ़ कर रहे हैं, खेल प्रशिक्षक तथा शारीरिक शिक्षा के शिक्षक एक विश्वसनीय करियर के द्वार खोलेंगे। सटीक मैन्यूफैक्चरिंग सिखा रहे आईटीआई के प्रशिक्षक, ऐसे कौशल विकसित कर रहे हैं जो पुलों के निर्माण और अस्पतालों को सुदृढ़ बनाने में सहायक हैं। यही राष्ट्र निर्माण का एक दूसरा स्वरूप है।

आज के दौर में जब मशीनें लगभग हर उस काम को करने में सक्षम हो रही हैं जिसका पहले से अनुमान लगाया जा सकता है, तब भी एक काम ऐसा है जिसकी जगह कोई नहीं ले सकता - और वह है शिक्षक का काम: एक ऐसा शिक्षक जो एक विद्यार्थी में ऐसी क्षमता देख लेता है जिसे खुद विद्यार्थी अभी नहीं देख पा रहा होता है। इस काम का कोई एल्गोरिदम नहीं है। यह स्कूल की घंटी बजने पर खत्म नहीं होता। और यह देश भर के हर तरह के संस्थान में, हर विषय के हर शिक्षक से जुड़ा है।

एक लैटिन कहावत इस तथ्य को सटीक ढंग से रेखांकित करती है: नॉन स्कोलाए सेड विताए डिस्सिमस (Non scholae sed vitae discimus)। हम स्कूल के लिए नहीं, बल्कि जिंदगी के लिए सीखते हैं।

और इंसानी संभावनाओं का सच्चा कलाकार माना जाने वाला एक शिक्षक ही वही व्यक्ति है, जो इसे संभव बनाता है।

(लेखक केन्द्रीय शिक्षा तथा कौशल विकास और उद्यमशीलता राज्यमंत्री हैं।)

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