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Friday, August 21, 2026

समरसता का पर्व, है सनातनी गर्व- विक्रम दयाल


भारत की आत्मा केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं में नहीं बसती, बल्कि उसकी उस महान सांस्कृतिक चेतना में निवास करती है, जिसने सदियों से विविधताओं को स्वीकार कर उन्हें एक सूत्र में पिरोने का संदेश दिया है। यही चेतना समरसता है और इसी समरसता में सनातन संस्कृति का वास्तविक गौरव निहित है। पर्व केवल पूजा-पाठ, व्रत-उपवास और उत्सव का नाम नहीं; वे समाज को जोड़ने, मनुष्य को मनुष्य के निकट लाने और जीवन में सद्भाव जगाने के अवसर भी होते हैं। सनातन परंपरा ने कभी एकरूपता को अपनी शक्ति नहीं माना। उसने तो विविधता में एकता को जीवन का स्वाभाविक सत्य स्वीकार किया। अलग-अलग देवी-देवता, अलग-अलग उपासना-पद्धतियां, अलग-अलग भाषाएं, वेशभूषाएं और लोक परंपराएं होते हुए भी भारत की सांस्कृतिक धारा एक रही। यही कारण है कि यहां पर्व किसी एक व्यक्ति या वर्ग के नहीं रहे, बल्कि समाज के सामूहिक आनंद और सहभागिता के पर्व बने। समरसता का अर्थ यह नहीं कि सबकी मान्यताएं और विचार एक जैसे हो जाएं। समरसता का वास्तविक अर्थ है—भिन्नताओं के बावजूद एक-दूसरे के सम्मान और सहयोग के साथ आगे बढ़ना। जहां मतभेद हों, वहां मनभेद न हों; जहां विविधता हो, वहां विभाजन न हो; और जहां अधिकार हों, वहां कर्तव्य का बोध भी बना रहे। आज के समय में इस भावना की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। आधुनिक जीवन ने मनुष्य को सुविधाएं तो बहुत दी हैं, लेकिन उसके बीच दूरी भी बढ़ाई है। समाज में आर्थिक असमानता, जातिगत पूर्वाग्रह, राजनीतिक वैमनस्य, धार्मिक कटुता और व्यक्तिगत स्वार्थ की दीवारें खड़ी होती दिखाई देती हैं। ऐसे समय में हमारे पर्व हमें याद दिलाते हैं कि समाज की वास्तविक शक्ति आपसी विश्वास में है। सनातन संस्कृति का मूल संदेश ही लोकमंगल का रहा है। प्रार्थना में केवल अपने सुख की कामना नहीं, बल्कि समस्त संसार के कल्याण की भावना दिखाई देती है—“सर्वे भवन्तु सुखिनः”। यह एक वाक्य नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का विराट दर्शन है। इसमें किसी के प्रति भेदभाव नहीं, बल्कि सबके सुख की मंगलकामना है। पर्वों की सबसे सुंदर विशेषता यही है कि वे घर की सीमाओं से निकलकर समाज तक पहुंचते हैं। दीपावली का दीप केवल एक घर को प्रकाशित नहीं करता, होली का रंग केवल एक व्यक्ति को नहीं रंगता, रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं रहता और मकर संक्रांति का संदेश केवल तिल-गुड़ की मिठास तक नहीं ठहरता। इन पर्वों के भीतर सामाजिक संबंधों को मधुर बनाने और मन की दूरियां मिटाने की शक्ति छिपी है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हम पर्वों के बाहरी स्वरूप को तो अपना रहे हैं, उनके मूल संदेश को भी आत्मसात कर रहे हैं? यदि किसी पर्व पर हम भव्य आयोजन करें, मंदिरों को सजाएं, दीप जलाएं और धार्मिक अनुष्ठान करें, लेकिन अपने पड़ोसी के दुख से आंखें फेर लें, किसी गरीब के बच्चे की शिक्षा में सहयोग न करें, किसी बुजुर्ग को अकेला छोड़ दें या किसी जरूरतमंद के प्रति संवेदना न रखें, तो पर्व का आध्यात्मिक उद्देश्य अधूरा रह जाता है। सनातन गर्व केवल अतीत की महानता गिनाने में नहीं, बल्कि वर्तमान को श्रेष्ठ बनाने में है। हमारी संस्कृति की महानता तभी सार्थक होगी, जब उसके संस्कार हमारे व्यवहार में दिखाई देंगे। किसी भूखे को भोजन देना, किसी निराश व्यक्ति को सहारा देना, किसी असहाय की सहायता करना, किसी वृद्ध का सम्मान करना और समाज में प्रेम का वातावरण बनाना भी उतना ही बड़ा धार्मिक कर्म है जितना कोई अनुष्ठान। समरसता का पर्व हमें यह भी सिखाता है कि समाज में कोई व्यक्ति छोटा-बड़ा नहीं होता। प्रत्येक मनुष्य की गरिमा समान है। श्रम करने वाला हाथ हो या ज्ञान देने वाला मस्तिष्क, खेत में पसीना बहाने वाला किसान हो या सीमा पर राष्ट्र की रक्षा करने वाला जवान—हर व्यक्ति राष्ट्र की सामूहिक शक्ति का हिस्सा है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सामाजिक पहचान को संघर्ष का कारण न बनने दें। जाति, भाषा, क्षेत्र, पंथ और आर्थिक स्थिति की विविधताएं भारत की वास्तविकता हैं, लेकिन इन्हें वैमनस्य का आधार बनाना हमारी सांस्कृतिक विरासत के विपरीत है। हमारी पहचान अनेक हो सकती है, पर हमारा मानवीय धर्म एक होना चाहिए। समरस समाज में उत्सव की खुशी तब और बढ़ जाती है, जब उसमें अंतिम पंक्ति में खड़ा व्यक्ति भी स्वयं को सहभागी महसूस करे। मंदिर का प्रसाद तभी पूर्ण है जब वह भूखे तक पहुंचे। पर्व की मिठास तभी सार्थक है जब वह किसी अकेले घर तक भी पहुंचे। दीप तभी सार्थक है जब वह किसी के अंधकार को कम करे। आज जब सोशल मीडिया और सूचना के तेज प्रवाह ने समाज को अभूतपूर्व रूप से जोड़ दिया है, वहीं दुर्भाग्य से शब्दों के माध्यम से मनुष्य को बांटने और एक-दूसरे के प्रति अविश्वास पैदा करने की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। ऐसे दौर में संयमित भाषा, सहिष्णु विचार और संवाद की संस्कृति को बढ़ावा देना भी सामाजिक धर्म है। सनातन परंपरा की शक्ति उसकी सहिष्णुता, आत्मचिंतन और निरंतर परिवर्तनशीलता में रही है। जिसने हजारों वर्षों की यात्रा में अनेक परिस्थितियों को देखा, अनेक संस्कृतियों से संवाद किया और फिर भी अपनी मूल चेतना को जीवित रखा, उस परंपरा का गर्व तभी सार्थक है जब वह समाज में प्रेम, न्याय, करुणा और समरसता को मजबूत करे। पर्व हमें केवल यह नहीं बताते कि हमें क्या पूजा करनी है; वे यह भी बताते हैं कि हमें कैसा मनुष्य बनना है। इसलिए “समरसता का पर्व, है सनातनी गर्व” केवल एक शीर्षक नहीं, बल्कि आज के समाज के लिए एक आह्वान है। आइए, पर्वों को केवल कैलेंडर की तारीख न बनने दें। उन्हें अपने आचरण का हिस्सा बनाएं। अपने भीतर के अहंकार को मिटाएं, मन की दूरियां कम करें और उस भारत का निर्माण करें जहां विविधता विभाजन नहीं, सौंदर्य बने; जहां धर्म विवाद नहीं, सदाचार बने; और जहां संस्कृति केवल गर्व का विषय नहीं, बल्कि जीवन का व्यवहार बने। क्योंकि अंततः सनातन का सबसे बड़ा गर्व किसी बाहरी प्रदर्शन में नहीं, बल्कि उस हृदय में है जिसमें सबके लिए सम्मान, सबके लिए करुणा और सबके लिए मंगलकामना हो। यही समरसता है, यही सनातनी संस्कार है और यही भारत की शाश्वत शक्ति है।

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