विक्रम दयाल
"वृक्ष कभी अपने लिए नहीं जीते। वे फल स्वयं नहीं खाते, छाया स्वयं नहीं लेते और प्राणवायु का मूल्य कभी नहीं मांगते। उनका सम्पूर्ण जीवन परोपकार की अनुपम मिसाल है।" आज मानव विकास की अंधी दौड़ में इतना आगे निकल आया है कि वह अपनी ही जीवनदायिनी प्रकृति को पीछे छोड़ता जा रहा है। ऊँची-ऊँची इमारतें, चौड़ी सड़कें, उद्योगों का विस्तार और बढ़ता शहरीकरण विकास का प्रतीक अवश्य हैं, किन्तु यदि इनकी कीमत हरे-भरे वृक्षों के विनाश से चुकानी पड़े तो यह विकास नहीं, विनाश का मार्ग है। धरती को यदि किसी ने सबसे अधिक सजाया है तो वह वृक्षों ने। उन्होंने बंजर भूमि को हरियाली दी, नदियों को जीवन दिया, पक्षियों को आश्रय दिया और मानव को साँस लेने के लिए शुद्ध वायु दी। सच तो यह है कि मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु तक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वृक्षों पर ही निर्भर रहता है। फिर भी विडंबना यह है कि वही मनुष्य आज सबसे अधिक वृक्षों का विनाश कर रहा है। प्रकृति ने कभी मनुष्य से कोई मूल्य नहीं माँगा। वृक्ष बिना किसी भेदभाव के सबको समान रूप से छाया देते हैं। उनकी शाखाओं पर चहकते पक्षी, उनकी जड़ों से सुरक्षित मिट्टी और उनके पत्तों से शुद्ध होती हवा इस बात का प्रमाण हैं कि प्रकृति का प्रत्येक उपहार निःस्वार्थ है। किंतु मनुष्य ने इस निःस्वार्थता का सम्मान करने के बजाय उसका दोहन करना अधिक उचित समझा। आज जलवायु परिवर्तन, असमय वर्षा, भीषण गर्मी, सूखा, बाढ़, भूजल का गिरता स्तर और बढ़ता वायु प्रदूषण किसी एक देश की समस्या नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के सामने खड़ा संकट है। इन समस्याओं का मूल कारण कहीं न कहीं प्रकृति के साथ हमारा असंतुलित व्यवहार है। जब जंगल कटते हैं तो बादलों का स्वभाव बदलता है, वर्षा का चक्र प्रभावित होता है और धरती का तापमान निरंतर बढ़ता जाता है। भारतीय संस्कृति में वृक्षों को देवतुल्य माना गया है। पीपल, बरगद, नीम, तुलसी और बेल जैसे वृक्ष केवल वनस्पति नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना का अभिन्न अंग हैं। हमारे ऋषियों ने प्रकृति की पूजा इसलिए नहीं की कि वे अंधविश्वासी थे, बल्कि इसलिए कि वे जानते थे—प्रकृति का सम्मान ही मानव जीवन की सुरक्षा है। आज आवश्यकता केवल पौधे लगाने की नहीं, बल्कि उन्हें वृक्ष बनने तक स्नेह और संरक्षण देने की है। अनेक बार हम अभियान के उत्साह में पौधे लगा तो देते हैं, लेकिन उनकी देखभाल भूल जाते हैं। परिणामस्वरूप कुछ ही दिनों में वे सूख जाते हैं। सच्चा वृक्षारोपण वही है जो वर्षों तक उसकी रक्षा का संकल्प भी साथ लेकर चले। विद्यालयों, महाविद्यालयों, सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं और प्रत्येक परिवार को वृक्षारोपण को एक संस्कार बनाना होगा। यदि जन्मदिन, विवाह, स्मृति दिवस या किसी शुभ अवसर पर एक पौधा लगाया जाए और उसकी जिम्मेदारी निभाई जाए, तो आने वाले वर्षों में भारत पुनः हरित और समृद्ध बन सकता है। वृक्ष केवल ऑक्सीजन ही नहीं देते, वे आशा देते हैं। वे केवल फल ही नहीं देते, भविष्य देते हैं। वे केवल छाया ही नहीं देते, जीवन का संदेश देते हैं। इसलिए प्रत्येक नागरिक का यह नैतिक दायित्व है कि वह अपने जीवनकाल में जितने वृक्ष काटे जाने से बचा सके, उतने बचाए और जितने संभव हों उतने नए वृक्ष लगाए। आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि केवल पर्यावरण दिवस पर नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक दिन प्रकृति के प्रति अपना दायित्व निभाएँगे। क्योंकि यदि धरती मुस्कुराएगी तो मानवता सुरक्षित रहेगी। आइए, एक पौधा केवल अपने लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए लगाएँ। "एक पेड़ धरा-सुंदरा, माता वसुंधरा के नाम।
जिसने जीवन की जरूरतों को दिया, बिन लिए कोई दाम।।" यही केवल एक कविता नहीं, बल्कि मानव जीवन का सबसे बड़ा पर्यावरणीय संदेश और हमारी आने वाली पीढ़ियों के प्रति पवित्र संकल्प है।

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