मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि उसका धन, पद, बल या वैभव नहीं, बल्कि उसका चरित्र और विनम्रता है। इतिहास साक्षी है कि जिसने विनम्रता को अपनाया, वह लोगों के हृदय में अमर हो गया; और जिसने अहंकार को अपना आभूषण बना लिया, उसका पतन निश्चित हुआ। यही कारण है कि कहा गया है—"अधिक मद, बढ़ते कद को कुतर देता है।" अहंकार धीरे-धीरे जन्म लेता है। सफलता मिलती है, प्रशंसा बढ़ती है, अधिकार मिलता है और मनुष्य स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है। यही वह क्षण होता है जब उसके भीतर का विवेक कमजोर पड़ने लगता है। वह सलाह सुनना छोड़ देता है, आलोचना से चिढ़ने लगता है और स्वयं को ही अंतिम सत्य मान बैठता है। यहीं से पतन का मार्ग आरंभ हो जाता है। आज के सामाजिक और सार्वजनिक जीवन में भी यह प्रवृत्ति दिखाई देती है। कहीं सत्ता का अहंकार है, कहीं धन का, कहीं ज्ञान का, तो कहीं प्रसिद्धि का। सोशल मीडिया के दौर में थोड़ी-सी लोकप्रियता भी कई लोगों को वास्तविकता से दूर कर देती है। दिखावे की संस्कृति ने विनम्रता को पीछे धकेल दिया है। परिणाम यह है कि रिश्तों में दूरी बढ़ रही है, संवाद कम हो रहा है और संवेदनाएँ क्षीण होती जा रही हैं। प्रकृति हमें प्रतिदिन विनम्रता का संदेश देती है। फलों से लदा वृक्ष झुक जाता है, बादल बरसकर धरती को तृप्त करते हैं और नदियाँ निरंतर बहकर जीवन देती हैं। जो जितना महान होता है, वह उतना ही विनम्र होता है। इसके विपरीत, सूखा वृक्ष तनकर खड़ा तो रहता है, पर अंततः सबसे पहले वही टूटता है। भारतीय संस्कृति भी अहंकार त्यागने की शिक्षा देती है। रावण अत्यंत विद्वान और पराक्रमी था, पर अहंकार ने उसके विवेक को ढक लिया और उसका सर्वनाश हुआ। दुर्योधन का अभिमान भी महाभारत के विनाश का कारण बना। दूसरी ओर श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण, महात्मा बुद्ध, संत कबीर और महात्मा गांधी जैसे महापुरुषों ने विनम्रता के बल पर जन-जन के हृदय में स्थान बनाया। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सफलता का उत्सव मनाएँ, लेकिन सफलता को सिर पर न चढ़ाएँ। पद और प्रतिष्ठा सेवा का अवसर हैं, श्रेष्ठता का प्रमाणपत्र नहीं। जो व्यक्ति अपनी उपलब्धियों का श्रेय समाज, परिवार और ईश्वर को देता है, वही लंबे समय तक सम्मानित रहता है। बच्चों को भी केवल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि संस्कार और विनम्रता की शिक्षा देना समय की माँग है। यदि नई पीढ़ी के भीतर नम्रता, सहिष्णुता और कृतज्ञता के संस्कार विकसित होंगे, तभी समाज स्वस्थ और समरस बनेगा। अहंकार से भरा व्यक्ति कुछ समय के लिए लोगों को प्रभावित कर सकता है, पर उनके हृदय में स्थान नहीं बना सकता। अंततः यही सत्य है कि मनुष्य का वास्तविक कद उसके पद से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार से मापा जाता है। अहंकार उस दीमक के समान है जो भीतर ही भीतर व्यक्तित्व को खोखला कर देता है, जबकि विनम्रता वह सुगंध है जो साधारण व्यक्ति को भी असाधारण बना देती है। आइए, हम सफलता का स्वागत करें, पर अहंकार का नहीं; क्योंकि अधिक मद सचमुच बढ़ते कद को कुतर देता है। विनम्रता ही वह शक्ति है जो मनुष्य को ऊँचा उठाती है, सम्मान दिलाती है और उसे युगों तक स्मरणीय बनाती है।
Thursday, July 23, 2026
अधिक मद, बढ़ते कद को कुतर देता है - विक्रम दयाल
मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि उसका धन, पद, बल या वैभव नहीं, बल्कि उसका चरित्र और विनम्रता है। इतिहास साक्षी है कि जिसने विनम्रता को अपनाया, वह लोगों के हृदय में अमर हो गया; और जिसने अहंकार को अपना आभूषण बना लिया, उसका पतन निश्चित हुआ। यही कारण है कि कहा गया है—"अधिक मद, बढ़ते कद को कुतर देता है।" अहंकार धीरे-धीरे जन्म लेता है। सफलता मिलती है, प्रशंसा बढ़ती है, अधिकार मिलता है और मनुष्य स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है। यही वह क्षण होता है जब उसके भीतर का विवेक कमजोर पड़ने लगता है। वह सलाह सुनना छोड़ देता है, आलोचना से चिढ़ने लगता है और स्वयं को ही अंतिम सत्य मान बैठता है। यहीं से पतन का मार्ग आरंभ हो जाता है। आज के सामाजिक और सार्वजनिक जीवन में भी यह प्रवृत्ति दिखाई देती है। कहीं सत्ता का अहंकार है, कहीं धन का, कहीं ज्ञान का, तो कहीं प्रसिद्धि का। सोशल मीडिया के दौर में थोड़ी-सी लोकप्रियता भी कई लोगों को वास्तविकता से दूर कर देती है। दिखावे की संस्कृति ने विनम्रता को पीछे धकेल दिया है। परिणाम यह है कि रिश्तों में दूरी बढ़ रही है, संवाद कम हो रहा है और संवेदनाएँ क्षीण होती जा रही हैं। प्रकृति हमें प्रतिदिन विनम्रता का संदेश देती है। फलों से लदा वृक्ष झुक जाता है, बादल बरसकर धरती को तृप्त करते हैं और नदियाँ निरंतर बहकर जीवन देती हैं। जो जितना महान होता है, वह उतना ही विनम्र होता है। इसके विपरीत, सूखा वृक्ष तनकर खड़ा तो रहता है, पर अंततः सबसे पहले वही टूटता है। भारतीय संस्कृति भी अहंकार त्यागने की शिक्षा देती है। रावण अत्यंत विद्वान और पराक्रमी था, पर अहंकार ने उसके विवेक को ढक लिया और उसका सर्वनाश हुआ। दुर्योधन का अभिमान भी महाभारत के विनाश का कारण बना। दूसरी ओर श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण, महात्मा बुद्ध, संत कबीर और महात्मा गांधी जैसे महापुरुषों ने विनम्रता के बल पर जन-जन के हृदय में स्थान बनाया। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सफलता का उत्सव मनाएँ, लेकिन सफलता को सिर पर न चढ़ाएँ। पद और प्रतिष्ठा सेवा का अवसर हैं, श्रेष्ठता का प्रमाणपत्र नहीं। जो व्यक्ति अपनी उपलब्धियों का श्रेय समाज, परिवार और ईश्वर को देता है, वही लंबे समय तक सम्मानित रहता है। बच्चों को भी केवल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि संस्कार और विनम्रता की शिक्षा देना समय की माँग है। यदि नई पीढ़ी के भीतर नम्रता, सहिष्णुता और कृतज्ञता के संस्कार विकसित होंगे, तभी समाज स्वस्थ और समरस बनेगा। अहंकार से भरा व्यक्ति कुछ समय के लिए लोगों को प्रभावित कर सकता है, पर उनके हृदय में स्थान नहीं बना सकता। अंततः यही सत्य है कि मनुष्य का वास्तविक कद उसके पद से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार से मापा जाता है। अहंकार उस दीमक के समान है जो भीतर ही भीतर व्यक्तित्व को खोखला कर देता है, जबकि विनम्रता वह सुगंध है जो साधारण व्यक्ति को भी असाधारण बना देती है। आइए, हम सफलता का स्वागत करें, पर अहंकार का नहीं; क्योंकि अधिक मद सचमुच बढ़ते कद को कुतर देता है। विनम्रता ही वह शक्ति है जो मनुष्य को ऊँचा उठाती है, सम्मान दिलाती है और उसे युगों तक स्मरणीय बनाती है।
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