आक्रोश से अधिक आवश्यक है आत्मोत्थान, संघर्ष से अधिक आवश्यक है समाधान
जब किसी राष्ट्र में जनता की पीड़ा बार-बार अनसुनी कर दी जाती है, जब व्यवस्था संवेदनहीनता का आवरण ओढ़ लेती है, जब आश्वासनों का अंबार तो लगता है पर समाधान धरातल पर दिखाई नहीं देता, तब आंदोलन जन्म लेते हैं। आंदोलन किसी भी लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी चेतना का प्रमाण होते हैं। किंतु हर आंदोलन अपने साथ एक प्रश्न भी लेकर चलता है—क्या हमारा संघर्ष केवल विरोध के लिए है, या परिवर्तन के लिए? आज देश का सामाजिक परिदृश्य अनेक प्रकार के आंदोलनों से गुजर रहा है। कहीं किसान अपनी उपज का उचित मूल्य मांग रहा है, कहीं बेरोजगार युवा वर्षों की मेहनत के बाद भी अवसर के लिए भटक रहा है। कहीं कर्मचारी अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं, कहीं महिलाएँ सुरक्षा और सम्मान की मांग कर रही हैं। पर्यावरण, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय जैसे विषय भी समय-समय पर आंदोलनों का रूप लेते रहे हैं। इन सबके पीछे एक ही पुकार है—हमें सुना जाए, हमें न्याय मिले। लेकिन एक कटु सत्य यह भी है कि जब आंदोलन अपनी मूल भावना से भटककर हिंसा, कटुता, तोड़फोड़ और राजनीतिक स्वार्थ का माध्यम बन जाते हैं, तब सबसे बड़ी हार जनता की ही होती है। जलती हुई बसें जनता की होती हैं, टूटती हुई रेलें जनता की होती हैं, बंद पड़े विद्यालयों में नुकसान विद्यार्थियों का होता है, और रुकते हुए उद्योगों का दर्द श्रमिकों के घर तक पहुँचता है। प्रश्न उठता है—यदि संघर्ष में समाज ही घायल हो जाए, तो विजय किसकी होगी? यहीं से उत्तोलन की आवश्यकता प्रारंभ होती है। उत्तोलन का अर्थ केवल किसी मांग को मनवा लेना नहीं है; इसका अर्थ है समाज की चेतना को ऊँचा उठाना, शासन को उत्तरदायी बनाना, जनता में विश्वास जगाना और संवाद के पुल का निर्माण करना। आंदोलन तब महान बनता है जब वह प्रतिशोध नहीं, परिवर्तन का मार्ग चुनता है। आज सबसे बड़ा संकट केवल समस्याओं का नहीं, बल्कि संवाद के अभाव का भी है। लोकतंत्र में सत्ता और जनता एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि साझेदार होती हैं। जब संवाद समाप्त होता है, तब सड़कें बोलने लगती हैं। और जब सड़कें बोलती हैं, तब दोनों पक्षों को यह याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति टकराव नहीं, बल्कि विश्वास है। महात्मा गांधी ने पूरी दुनिया को दिखाया कि बिना हिंसा के भी सबसे बड़ी सत्ता को झुकाया जा सकता है। उनका सत्याग्रह किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं था; वह अन्याय के विरुद्ध था। उनका उद्देश्य किसी को पराजित करना नहीं, बल्कि सबके भीतर की मानवता को जागृत करना था। यही आंदोलन का सर्वोच्च उत्तोलन है। आज आवश्यकता केवल आंदोलन करने वालों को ही नहीं, बल्कि शासन करने वालों को भी आत्ममंथन करने की है। यदि जनता बार-बार सड़कों पर उतरने को विवश हो रही है, तो यह केवल जनता की बेचैनी नहीं, बल्कि व्यवस्था के लिए भी एक गंभीर संकेत है। समय रहते संवाद, पारदर्शिता और संवेदनशीलता अपनाना किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। दूसरी ओर आंदोलनकारियों का भी यह दायित्व है कि वे संविधान, शांति और अनुशासन की मर्यादा को कभी न छोड़ें। सोशल मीडिया के इस दौर में उत्तेजना बहुत तेजी से फैलती है, लेकिन समाधान उतनी तेजी से नहीं आता। कुछ भड़काऊ संदेश हजारों लोगों को सड़क पर ला सकते हैं, परंतु एक जिम्मेदार विचार लाखों लोगों का भविष्य बदल सकता है। इसलिए आंदोलनों को भावनाओं के साथ-साथ विवेक का भी नेतृत्व चाहिए। राष्ट्र निर्माण का मार्ग संघर्ष से होकर अवश्य जाता है, परंतु वह संघर्ष ऐसा होना चाहिए जो समाज को तोड़े नहीं, जो संवाद के दरवाज़े बंद न करे, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए कटुता नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण व्यवस्था की विरासत छोड़ जाए। आंदोलन की सफलता विरोध की तीव्रता में नहीं, बल्कि समाधान की स्थिरता में होती है। आज देश को ऐसे आंदोलनों की आवश्यकता है जो व्यवस्था को आईना दिखाएँ, लेकिन उसे तोड़ें नहीं; जो सरकार को जवाबदेह बनाएँ, लेकिन समाज को विभाजित न करें; जो अधिकारों की रक्षा करें, किंतु कर्तव्यों को भी स्मरण रखें। जब आंदोलन जनजागरण, आत्मानुशासन और रचनात्मक सुझावों का माध्यम बनते हैं, तभी वे राष्ट्र को ऊपर उठाते हैं। यही वास्तविक उत्तोलन है। अंत में केवल इतना ही— "आंदोलन की मशाल यदि विवेक के हाथों में रहे तो वह अंधकार मिटाती है; लेकिन यदि वह क्रोध के हवाले हो जाए, तो अपने ही घर को जला देती है।" इसलिए आज आवश्यकता आंदोलन की नहीं, बल्कि समाधानकारी आंदोलन की है; विरोध की नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण परिवर्तन की है; और उत्तेजना की नहीं, बल्कि उत्तोलन की है। यही लोकतंत्र की आत्मा है, यही राष्ट्रहित का मार्ग है और यही भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

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