1 जुलाई 1962 को जन्मे डॉ. सिंह ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से कृषि में स्नातक तथा आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन में स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने आईसीएआर-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान से आनुवंशिकी विषय में पीएचडी की। वर्ष 1994 में वह आईसीएआर-आईएआरआई के आनुवंशिकी प्रभाग में वैज्ञानिक के रूप में कृषि अनुसंधान सेवा से जुड़े और वर्ष 2008 से बासमती प्रजनन कार्यक्रम का नेतृत्व कर रहे हैं।
डॉ. सिंह ने प्रमुख प्रजनक के रूप में 27 चावल किस्मों का विकास किया, जिनमें 11 बासमती किस्में शामिल हैं। उनके नेतृत्व में विकसित कम अवधि, उच्च उपज और रोग प्रतिरोधी बासमती किस्मों ने देशभर के किसानों के बीच व्यापक लोकप्रियता हासिल की। वर्तमान में उनकी विकसित किस्मों का उपयोग भारत के कुल बासमती क्षेत्र के 90 प्रतिशत से अधिक हिस्से में किया जा रहा है। इन किस्मों के माध्यम से देश को वर्ष 2024-25 में लगभग 50,312 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई है।
उन्होंने पूसा बासमती 1509, पूसा बासमती 1692 और पूसा बासमती 1847 जैसी अल्पकालिक किस्मों के माध्यम से किसानों को फसल विविधीकरण और आय वृद्धि का अवसर प्रदान किया। साथ ही रोग प्रतिरोधी किस्मों के विकास से खेती की लागत में कमी आई तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय बासमती की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ी।
डॉ. सिंह ने सीधे बीज वाली खेती के लिए शाकनाशी-रोधी बासमती किस्मों का भी विकास किया, जिससे सिंचाई जल की बचत, उत्पादन लागत में कमी और ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में कमी संभव हुई। उनके इन प्रयासों को टिकाऊ कृषि और कम कार्बन उत्पादन प्रणाली की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
एक कुशल शिक्षक और शोधकर्ता के रूप में डॉ. सिंह अब तक 34 पीएचडी और पांच एमएससी छात्रों का मार्गदर्शन कर चुके हैं। उन्होंने 200 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित किए हैं तथा उनका एच-इंडेक्स 41 और 6300 से अधिक साइटेशन दर्ज हैं।
उन्हें रफी अहमद किदवई पुरस्कार, सी. सुब्रमण्यम पुरस्कार, बी.पी. पाल पुरस्कार, बोरलॉग पुरस्कार, ओम प्रकाश भसीन पुरस्कार और वासविक पुरस्कार सहित कई राष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा जा चुका है।

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