बस्ती। अधर्म पर धर्म की विजय ही रामायण का सार है। राम धर्म के प्रतीक हैं, जबकि रावण अधर्म का प्रतीक है। यह उद्बोधन कथा व्यास स्वरूपानन्द जी महाराज ने नारायण सेवा संस्थान ट्रस्ट द्वारा आयोजित 9 दिवसीय संगीतमयी श्रीराम कथा के समापन अवसर पर व्यक्त किया। दुबौलिया बाजार स्थित राम विवाह मैदान में आयोजित इस कथा का विधि-विधान के साथ विश्राम हुआ।
कथा व्यास ने नौ दिनों तक संपूर्ण रामायण को सरस एवं भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया। अंतिम दिन उत्तरकांड का वर्णन करते हुए रामराज्य की स्थापना तक की कथा सुनाई। उन्होंने कहा कि ‘उत्तर’ का अर्थ अंतिम, उत्तीर्ण और मोक्ष होता है। मनुष्य के जीवन में पाप रूपी लंका में बसे रावण का अंत करना ही सच्चा लक्ष्य है।
उन्होंने बताया कि राम-रावण का युद्ध केवल त्रेता युग की घटना नहीं, बल्कि हर व्यक्ति के भीतर चलने वाला धर्म और अधर्म का संघर्ष है। भगवान श्रीराम ने वानर-भालू सेना के साथ लंका पर चढ़ाई कर राक्षसों का संहार किया, लेकिन विशेष बात यह रही कि जिन्हें उन्होंने मारा, उनका उद्धार भी किया।
महात्मा जी ने कहा कि रावण कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि एक प्रवृत्ति है, जिसका अंत केवल श्रीराम की शरण लेकर ही संभव है। उन्होंने कहा कि “निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा” — भगवान श्रीराम सरल और सहज हैं तथा शरणागत की रक्षा करते हैं। विभीषण के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि श्रीराम ने शरण में आए विभीषण को गले लगाकर उन्हें स्वीकार किया।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि श्रीराम कथा को अपने जीवन में उतारकर रावण रूपी बुराइयों का नाश करें। कथा का समापन हवन, यज्ञ एवं भंडारे के साथ हुआ।
कार्यक्रम के अंतिम दिन मुख्य यजमान संजीव सिंह ने विधि-विधान से कथा व्यास का पूजन किया। आयोजन में बाबूराम सिंह, अनिल सिंह, कृष्ण दत्त दूबे, डॉ. अभिषेक सिंह, कालिका सिंह, हरिशंकर उपाध्याय, जसवंत सिंह, प्रवीन कुमार, अनूप सिंह, दयाराम, हरीलाल गुप्ता, नर बहादुर यादव, जितेंद्र सिंह, राजेश सिंह, सुनील सिंह, राधेश्याम, सत्यनारायण द्विवेदी, गोरखनाथ सोनी, अजय सिंह, नंदकिशोर पांडे, गणेश तिवारी, अरुण सिंह, अजय मिश्रा, महिमा सिंह, विभा सिंह, इन्द्रपरी सिंह, सोनू सिंह, हर्षित, वर्धन सहित बड़ी संख्या में क्षेत्रीय श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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