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Tuesday, March 24, 2026

खेलो इंडिया जनजातीय खेल: भारत के ओलंपिक सपनों की ओर एक मजबूत कदम -

 

 


 


भारत की खेल यात्रा अद्भुत विविधता से भरी हुई है। उत्तर-पूर्व के पहाड़ों से लेकर मध्य भारत के जंगलों तक, हमारे देश के हर कोने में प्रतिभा मौजूद है। खेलो इंडिया कार्यक्रम की शुरुआत को अब आठ वर्ष हो चुके हैं, और इतने कम समय में यह एक राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में विकसित हो चुका है। युवा खेल, विश्वविद्यालय खेल, बीच गेम्स और विंटर गेम्स जैसे विभिन्न आयामों के माध्यम से, खेलो इंडिया ने देशभर के युवा खिलाड़ियों की विविध प्रतिभाओं को पहचानने और उभारने में सफलता प्राप्त की है।

 

खेलो इंडिया जनजातीय खेल (केआईटीजी) का समावेश इस यात्रा में एक और महत्वपूर्ण कदम है। इसका पहला संस्करण 25 मार्च से 3 अप्रैल तक छत्तीसगढ़ में आयोजित किया जाएगा, जिसमें 31 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लगभग 3,000 खिलाड़ी भाग लेंगे। इन खेलों में सात पदक खेल शामिल होंगे—एथलेटिक्स, फुटबॉल, हॉकी, भारोत्तोलन , तीरंदाजी, तैराकी और कुश्ती प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएंगी।

 

इन खेलों का आयोजन बस्तर क्षेत्र के जनजातीय बहुल जिलों, जो प्राचीन दंडकारण्य क्षेत्र का हिस्सा हैं, के साथ-साथ सरगुजा क्षेत्र, रायगढ़ और मानपुर जैसे क्षेत्रों में किया जाएगा। यह केवल एक और खेल प्रतियोगिता की शुरुआत नहीं है, बल्कि यह हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के उस संकल्प का हिस्सा है, जिसके तहत भारत के खेल पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) को व्यापक बनाते हुए हर खिलाड़ी तक अवसर पहुँचाना है—चाहे वह किसी भी भौगोलिक या सामाजिक पृष्ठभूमि से आता हो। सीधे शब्दों में कहें तो यह हाशिए पर पड़े खिलाड़ियों को मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास है।

 

जनजातीय क्षेत्रों के खिलाड़ियों ने लंबे समय से देश को गौरवान्वित किया है। राजस्थान के महान तीरंदाज लिम्बा राम से लेकर झारखंड की तीरंदाजी स्टार दीपिका कुमारी तक, और अनेक हॉकी खिलाड़ियों से लेकर ओलंपिक पदक विजेता मीराबाई चानू तक, उनकी उपलब्धियाँ लाखों लोगों को प्रेरित करती हैं। ये उदाहरण इन क्षेत्रों में निहित अपार संभावनाओं को दर्शाते हैं।

कई जनजातीय क्षेत्र ऐसे भी हैं जो ऐतिहासिक रूप से सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना करते रहे हैं। इन क्षेत्रों के युवाओं के लिए पहचान और विकास के अवसर सीमित रहे हैं। ऐसे में, इन क्षेत्रों में संगठित खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन युवाओं की ऊर्जा को सकारात्मक और राष्ट्र निर्माण की दिशा में मोड़ने का कार्य करता है। यह अनिश्चितता को अवसर में और अलगाव को समावेशन में बदलने का प्रयास है।

 

वास्तव में,  हमारे माननीय प्रधानमंत्री, श्री नरेंद्र मोदी का दृष्टिकोण—“खेलेगा भारत तो खिलेगा भारत”—आज साकार हो रहा है। खेल आज एक सशक्त माध्यम और समान अवसर प्रदान करने वाला साधन बन चुका है, जो वंचित वर्गों के खिलाड़ियों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी पहचान बनाने का अवसर देता है। जनजातीय क्षेत्रों में खेलो इंडिया का विस्तार इसी दृष्टि का स्वाभाविक विस्तार है और यह इस विश्वास को मजबूत करता है कि खेल राष्ट्र निर्माण का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।

 

खेलो इंडिया जनजातीय खेलों का आयोजन स्थानीय खेल पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) पर भी दीर्घकालिक प्रभाव डालेगा। इससे जनजातीय क्षेत्रों में खेल अवसंरचना का विकास और उन्नयन होगा, साथ ही स्थानीय कोच, प्रशिक्षकों और सहयोगी कर्मचारियों के लिए रोजगार के अवसर भी उत्पन्न होंगे। स्कूलों और सामुदायिक संस्थानों को दैनिक जीवन में खेल को शामिल करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा, जिससे जमीनी स्तर पर एक स्थायी और समावेशी खेल संस्कृति विकसित हो सके।

 

ये खेलो इंडिया जनजातीय खेल केवल एक बार आयोजित होने वाला आयोजन नहीं हैं, बल्कि इन्हें खेलो इंडिया के वार्षिक कैलेंडर में स्थायी स्थान दिया जाएगा। इससे देशभर के जनजातीय खिलाड़ियों को निरंतर और नियमित मंच मिलेगा, जो उनके दीर्घकालिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। प्रत्येक संस्करण के साथ ये खेल व्यापक खेलो इंडिया (इकोसिस्टम) पारिस्थितिकी तंत्र  के लिए एक आधार के रूप में कार्य करेंगे। इस दृष्टि से, जनजातीय खेल केवल एक मंच नहीं, बल्कि एक समृद्ध खेल संसार में प्रवेश का द्वार हैं।

 

इन खेलों के माध्यम से हम प्रतिभाओं की पहचान और उनके विकास का लक्ष्य रखते हैं। राष्ट्रीय कोच, उच्च प्रदर्शन निदेशक और भारतीय खेल प्राधिकरण के तकनीकी विशेषज्ञ इन खेलों में उपस्थित रहेंगे। चयनित खिलाड़ियों को उन्नत प्रशिक्षण के लिए भाखेप्रा  केंद्रों में भेजा जाएगा, जिससे वे अपने खेल करियर को नई ऊँचाइयों तक ले जा सकें।

 

जैसे-जैसे भारत 2030 राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी की तैयारी कर रहा है और 2036 ओलंपिक खेलों की मेजबानी के लिए प्रयासरत है, वैसे-वैसे प्रतिभाओं का दायरा बढ़ाना और भी आवश्यक हो जाता है। इसका अर्थ है देश के हर कोने तक पहुँचना और यह सुनिश्चित करना कि हर युवा खिलाड़ी—विशेषकर जनजातीय समुदायों से—अवसरों से वंचित न रहे। जनजातीय खेलों की शुरुआत इसी सोच का परिणाम है और यह भारत के विकसित होते खेल तंत्र की मजबूती को दर्शाता है।

 

खेल उत्कृष्टता की यात्रा अक्सर उन गाँवों और समुदायों से शुरू होती है जहाँ सपने तो होते हैं, लेकिन अवसर सीमित होते हैं। खेलो इंडिया जनजातीय खेलों के माध्यम से, सरकार खेल को इन्हीं क्षेत्रों तक पहुँचा रही है। इस प्रक्रिया में हम न केवल भविष्य के चैंपियनों को खोज रहे हैं, बल्कि भारत की प्रतिभा श्रृंखला को भी सशक्त बना रहे हैं, ताकि हम एक वैश्विक खेल महाशक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ सकें और 2036 तक शीर्ष 10 तथा 2047 तक शीर्ष 5 खेल राष्ट्र बनने के प्रधानमंत्री के लक्ष्य को साकार कर सकें।

 

(लेखक भारत सरकार में युवा कार्यक्रम एवं खेल तथा श्रम एवं रोजगार मंत्री हैं।)

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