कर्मों का फल मुझे भा रहा ।
दुख में रह कर मजा आ रहा ।।
हाले दिल किसको बतलाये ,
गांव छोड़ कर शहर जा रहा _
बुद्ध हुआ बगिया का माली ,
हुआ जेब पैसों से खाली,,
गुज़र _वसर होगी अब कैसे ,
इसी सोच में मरा जा रहा _
सुत करते अपनी मन मानी।
बंटवारे की जिद है ठानी।।
कभी कर्ज की करे न चिंता,
कैसे मुझे ठगा जा रहा _
हार _हार कर जीतू बाजी।
संकट सहने को मैं राजी ।।
रहमन नभ को भी छू लेगा,
इसी लिए तो जिये जा रहा _
जन कवि
रहमान अली रहमान

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