
प्रशान्त कुमार पाण्डेय
जीवन के झंझावात करें जब बोझिल हमको बेदम हमको
हम हार न माने रार ना ठाने देना सीखे खुशियां सबको
जब अपना ही कोई अपनापन छीने अमिट लक्ष्य भी धुंधला होले
तब नारायण का ध्यान धरे जो आकर सारे बंधन खोले।
जब झूठ फरेब धोखे की जय जय कार सुनाई देती हो।
जब मद में पापी हो जाये झूठे हर्षित हो मुस्काये
तब देव हरे तुम रुद्र मेरे मेरा जीवन बन आ जाना
मानवता की रक्षा को तुम मुझ क्षुद्र को ले जाना।
बंदनवार लगाकर करू प्रतीक्षा, अहा ऐसा पल कब आएगा
घातो ने प्रति घातो ने और शकुनी की कपटी चालो ने
जो सुष्क कर दिया जीवन है उसमें प्राण वही पल भर पायेगा
फिर करना देव मेरे तुम तम के विरोध एक संख नाद
हम आएंगे आहुति बनकर पाने अपना अंतिम प्रसाद।
हर हलकोरों को मोड़ेंगे हम स्वार्थ हमारे छोड़ेंगे
जग के कष्ट धराशायी होंगे हम जग के प्रति उत्तरदायीं होंगे
हे देव मेरे हे रुद्र मेरे इस सृष्टि को नवजीवन दे दो
हम तोड़ सके यह मोह जाल ऐसा हमे आशीर्वचन दे दो।
प्रशान्त कुमार पाण्डेय
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