शक्ति ही सृष्टि का आधार है। शक्ति के बिना शिव भी शव के समान माने गए हैं। यही सनातन दर्शन का वह गूढ़ सत्य है, जिसे शारदीय नवरात्रि अपने नौ पवित्र दिनों और नौ रात्रियों के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाती है। यह पर्व केवल दीप, धूप, पुष्प, उपवास और पूजा का उत्सव नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर सोई हुई शक्ति को जागृत करने का आध्यात्मिक अवसर है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली शारदीय नवरात्रि सनातन परंपरा का अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। नौ दिनों तक मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की आराधना और दसवें दिन विजयादशमी का उत्सव इस बात का प्रतीक है कि जब शक्ति धर्म के साथ खड़ी होती है तो अंततः विजय सत्य की ही होती है। 2026 में शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से प्रारंभ होकर 20 अक्टूबर को विजयादशमी के साथ पूर्ण होगी। आदिशक्ति का पौराणिक स्वरूप: सनातन धर्म में देवी को केवल एक देवी के रूप में नहीं, बल्कि आदिशक्ति, जगदम्बा और समस्त सृष्टि की मूल ऊर्जा के रूप में देखा गया है। ब्रह्मा की सृजन-शक्ति, विष्णु की पालन-शक्ति और महेश की संहार-शक्ति—इन सभी के पीछे उसी परम शक्ति का विस्तार माना गया है। मार्कण्डेय पुराण में वर्णित देवी माहात्म्य, जिसे दुर्गा सप्तशती अथवा चंडी पाठ भी कहा जाता है, देवी की महिमा का अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें देवी के द्वारा मधु-कैटभ, महिषासुर तथा शुम्भ-निशुम्भ जैसे असुरों के विनाश का वर्णन मिलता है। महिषासुर के अत्याचारों से जब देवता और समस्त लोक व्यथित हुए, तब देवताओं के तेज से एक महान दिव्य शक्ति का प्राकट्य हुआ। देवताओं ने अपनी-अपनी शक्तियां और अस्त्र उस महाशक्ति को प्रदान किए। यही शक्ति आगे चलकर महिषासुरमर्दिनी मां दुर्गा के रूप में प्रतिष्ठित हुई। यह कथा केवल देवासुर संग्राम की कथा नहीं है। इसके भीतर मनुष्य के जीवन का भी एक गहरा संदेश छिपा है। महिषासुर केवल बाहर का कोई दैत्य नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपे अहंकार, मद, मोह और विकारों का प्रतीक भी माना जा सकता है। जब मनुष्य अपने भीतर के इन असुरों पर विजय प्राप्त करता है, तभी वास्तविक विजय होती है। नौ रातें, नौ शक्तियां: नवरात्रि में मां के नौ स्वरूपों की आराधना की परंपरा है—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। इन नौ रूपों में शक्ति के अलग-अलग आयामों का दर्शन होता है। मां शैलपुत्री: हमें स्थिरता और संकल्प का संदेश देती हैं। मां ब्रह्मचारिणी: तप, त्याग और संयम की प्रेरणा देती हैं। मां चंद्रघंटा: साहस और शौर्य की प्रतीक हैं।मां कूष्मांडा: सृजनात्मक ऊर्जा का बोध कराती हैं। मां स्कंदमाता: ममता और मातृत्व का स्वरूप हैं। मां कात्यायनी: अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा देती हैं।मां कालरात्रि: अंधकार और भय का नाश करने वाली शक्ति हैं।मांमहागौरी: पवित्रता और आत्मशुद्धि की प्रतीक हैं। मां सिद्धिदात्री: साधना की पूर्णता और सिद्धि का संदेश देती हैं। इस प्रकार नवरात्रि की साधना बाहर की देवी को प्रसन्न करने से कहीं अधिक अपने भीतर की शक्ति को पहचानने की साधना बन जाती है। दुर्गा का अर्थ ही क्या है?: 'दुर्गा' नाम अपने भीतर अत्यंत गहरा आध्यात्मिक अर्थ समेटे हुए है। जो जीवन के दुर्गम संकटों से पार लगाती हैं, जो भय और बाधाओं से रक्षा करती हैं, वही दुर्गा हैं। मनुष्य जब जीवन की कठिनाइयों में घिर जाता है, जब चारों ओर निराशा दिखाई देती है, जब अन्याय और असत्य का प्रभाव बढ़ता प्रतीत होता है, तब उसके भीतर एक अदृश्य शक्ति उसे संघर्ष करने का साहस देती है। सनातन परंपरा उसी शक्ति को मां दुर्गा के रूप में प्रणाम करती है। इसलिए देवी की आराधना का अर्थ केवल यह नहीं कि हम मंदिर में जाकर वरदान मांगें। इसका अर्थ यह भी है कि हम अपने भीतर साहस, सत्य, करुणा, संयम और धर्म की स्थापना करें। शक्ति का वास्तविक स्वरूप: आज समाज को सबसे अधिक आवश्यकता बाहरी शक्ति की नहीं, बल्कि चरित्र की शक्ति की है। शिक्षा है, लेकिन संस्कार कम होते जा रहे हैं। सुविधाएं हैं, लेकिन संतोष घट रहा है। तकनीक है, लेकिन संवाद कम हो रहा है। सूचना है, लेकिन विवेक संकट में है। संपत्ति बढ़ रही है, लेकिन संवेदनाएं कमजोर पड़ रही हैं। ऐसे समय में नवरात्रि हमें स्मरण कराती है कि शक्ति का अर्थ केवल सामर्थ्य नहीं है। सच्ची शक्ति वह है जो कमजोर की रक्षा करे, अन्याय के सामने झुके नहीं, अहंकार को त्यागे और सत्य के मार्ग पर अडिग रहे। मां दुर्गा का सिंह पर आरूढ़ होना भी इसी निर्भीकता का प्रतीक माना जा सकता है। भय पर विजय, अधर्म के विरुद्ध संघर्ष और धर्म की रक्षा—यही शक्ति का सार है। स्त्री में शक्ति का सम्मान: नवरात्रि का सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश नारी सम्मान भी है। जिस सनातन परंपरा में स्त्री को आदिशक्ति, जगदम्बा, दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में पूजा गया, उसी समाज को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि किसी महिला के सम्मान, सुरक्षा और स्वतंत्र अस्तित्व पर आंच न आए। नवरात्रि में कन्या पूजन करने से पहले यह विचार आवश्यक है कि हमारे घर, परिवार और समाज में बेटियों को वास्तव में कितना सम्मान और अधिकार प्राप्त है। मां की प्रतिमा के सामने सिर झुकाना तभी सार्थक होगा, जब जीवित नारी के सम्मान के सामने हमारा सिर स्वयं झुके। देवी की पूजा फूलों से जितनी होती है, उससे कहीं अधिक नारी के सम्मान और सुरक्षा से होती है। उपवास का आध्यात्मिक अर्थ: नवरात्रि के व्रत को केवल भोजन छोड़ने की परंपरा मान लेना इसके आध्यात्मिक पक्ष को सीमित कर देना है। व्रत का व्यापक अर्थ है—अपने मन और इंद्रियों को अनुशासित करना। यदि नौ दिनों तक भोजन में संयम है, लेकिन वाणी में कटुता है; मंदिर में दीप जल रहा है, लेकिन मन में द्वेष है; हाथ में माला है, लेकिन व्यवहार में छल है—तो साधना अधूरी रह जाती है। नवरात्रि का वास्तविक व्रत है—क्रोध पर संयम, लोभ पर नियंत्रण, अहंकार का त्याग, वाणी में मधुरता, व्यवहार में करुणा और कर्म में धर्म। यही साधना मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाती है। देवी महात्म्य का सबसे बड़ा संदेश: देवी महात्म्य की कथाओं में बार-बार यह भाव सामने आता है कि जब अधर्म अपनी सीमा पार करता है, तब शक्ति का प्राकट्य होता है।इसका आध्यात्मिक अर्थ यह है कि मनुष्य को अन्याय के सामने निष्क्रिय नहीं रहना चाहिए। जहां अत्याचार है, वहां साहस चाहिए। जहां असत्य है, वहां सत्य चाहिए। जहां भय है, वहां विश्वास चाहिए। जहां निराशा है, वहां आशा चाहिए। और जहां अंधकार है, वहां प्रकाश चाहिए । मां दुर्गा इसी जागरण की प्रतीक हैं। नवरात्रि हमें भीतर से बदलने का अवसर दे: आज नवरात्रि के भव्य आयोजन होते हैं। मंदिर सजते हैं, पंडाल बनते हैं, माता की ज्योति प्रज्वलित होती है और श्रद्धालु भक्ति में डूब जाते हैं। यह सब हमारी सांस्कृतिक चेतना का सुंदर स्वरूप है। लेकिन पर्व की सार्थकता तब बढ़ेगी, जब इन नौ दिनों की भक्ति हमारे जीवन में नौ अच्छे संकल्प लेकर आए। हम किसी जरूरतमंद की सहायता करें। किसी दुखी व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान लाएं। किसी वृद्ध की उपेक्षा न करें। बेटियों के सम्मान की रक्षा करें। प्रकृति के प्रति अपना दायित्व समझें। अपनी वाणी को संयमित करें।अपने भीतर के अहंकार को पहचानें। असत्य से दूरी बनाएं। और धर्म को केवल पूजा तक सीमित न रखकर आचरण में उतारें। तभी नवरात्रि वास्तव में आत्मजागरण का पर्व बनेगी। विजयादशमी का संदेश: नौ रातों की साधना के बाद दसवें दिन विजयादशमी आती है। यह विजय केवल एक पौराणिक युद्ध की विजय नहीं, बल्कि उस शाश्वत विश्वास की विजय है कि अंततः धर्म की स्थापना होती है और अधर्म का पतन। मनुष्य के भीतर भी प्रतिदिन एक युद्ध चलता है—सद्विचार और दुर्विचार के बीच, संयम और वासना के बीच, सत्य और असत्य के बीच, करुणा और क्रूरता के बीच। नवरात्रि हमें उसी आंतरिक युद्ध में विजय प्राप्त करने का अवसर देती है। मां दुर्गा की आराधना का वास्तविक अर्थ यही है कि हम अपने भीतर के महिषासुर को पहचानें और उसका अंत करने का संकल्प लें। निष्कर्ष शारदीय नवरात्रि सनातन संस्कृति का केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि शक्ति, श्रद्धा, साधना, संस्कार और आत्मजागरण का महापर्व है। मां दुर्गा की आराधना हमें यह विश्वास देती है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि मनुष्य सत्य, धर्म और साहस के साथ खड़ा रहे तो विजय का मार्ग अवश्य निकलता है। आज आवश्यकता केवल देवी के जयकारे लगाने की नहीं, बल्कि देवी के गुणों को जीवन में उतारने की है। जहां नारी का सम्मान होगा, वहां शक्ति होगी। जहां सत्य का सम्मान होगा, वहां धर्म होगा। जहां करुणा होगी, वहां मानवता होगी। जहां साहस होगा, वहां विजय होगी। आइए, इस शारदीय नवरात्रि मां जगदम्बा के चरणों में यही प्रार्थना करें— “हे आदिशक्ति! हमारे भीतर से भय, अहंकार, लोभ, मोह और अज्ञान का अंधकार दूर करें। हमें सत्य के मार्ग पर चलने की शक्ति दें, अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस दें और समाज में प्रेम, सद्भाव, संस्कार एवं मानवता की ज्योति प्रज्वलित करने का सामर्थ्य दें।” जय माता दी। जय जगदम्बे। जय भवानी।
Sunday, October 11, 2026
शारदीय नवरात्रि एवम् शक्तिस्वरूपिणी देवी दुर्गा का महात्म्य- विक्रम दयाल
शक्ति ही सृष्टि का आधार है। शक्ति के बिना शिव भी शव के समान माने गए हैं। यही सनातन दर्शन का वह गूढ़ सत्य है, जिसे शारदीय नवरात्रि अपने नौ पवित्र दिनों और नौ रात्रियों के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाती है। यह पर्व केवल दीप, धूप, पुष्प, उपवास और पूजा का उत्सव नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर सोई हुई शक्ति को जागृत करने का आध्यात्मिक अवसर है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली शारदीय नवरात्रि सनातन परंपरा का अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। नौ दिनों तक मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की आराधना और दसवें दिन विजयादशमी का उत्सव इस बात का प्रतीक है कि जब शक्ति धर्म के साथ खड़ी होती है तो अंततः विजय सत्य की ही होती है। 2026 में शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से प्रारंभ होकर 20 अक्टूबर को विजयादशमी के साथ पूर्ण होगी। आदिशक्ति का पौराणिक स्वरूप: सनातन धर्म में देवी को केवल एक देवी के रूप में नहीं, बल्कि आदिशक्ति, जगदम्बा और समस्त सृष्टि की मूल ऊर्जा के रूप में देखा गया है। ब्रह्मा की सृजन-शक्ति, विष्णु की पालन-शक्ति और महेश की संहार-शक्ति—इन सभी के पीछे उसी परम शक्ति का विस्तार माना गया है। मार्कण्डेय पुराण में वर्णित देवी माहात्म्य, जिसे दुर्गा सप्तशती अथवा चंडी पाठ भी कहा जाता है, देवी की महिमा का अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें देवी के द्वारा मधु-कैटभ, महिषासुर तथा शुम्भ-निशुम्भ जैसे असुरों के विनाश का वर्णन मिलता है। महिषासुर के अत्याचारों से जब देवता और समस्त लोक व्यथित हुए, तब देवताओं के तेज से एक महान दिव्य शक्ति का प्राकट्य हुआ। देवताओं ने अपनी-अपनी शक्तियां और अस्त्र उस महाशक्ति को प्रदान किए। यही शक्ति आगे चलकर महिषासुरमर्दिनी मां दुर्गा के रूप में प्रतिष्ठित हुई। यह कथा केवल देवासुर संग्राम की कथा नहीं है। इसके भीतर मनुष्य के जीवन का भी एक गहरा संदेश छिपा है। महिषासुर केवल बाहर का कोई दैत्य नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपे अहंकार, मद, मोह और विकारों का प्रतीक भी माना जा सकता है। जब मनुष्य अपने भीतर के इन असुरों पर विजय प्राप्त करता है, तभी वास्तविक विजय होती है। नौ रातें, नौ शक्तियां: नवरात्रि में मां के नौ स्वरूपों की आराधना की परंपरा है—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। इन नौ रूपों में शक्ति के अलग-अलग आयामों का दर्शन होता है। मां शैलपुत्री: हमें स्थिरता और संकल्प का संदेश देती हैं। मां ब्रह्मचारिणी: तप, त्याग और संयम की प्रेरणा देती हैं। मां चंद्रघंटा: साहस और शौर्य की प्रतीक हैं।मां कूष्मांडा: सृजनात्मक ऊर्जा का बोध कराती हैं। मां स्कंदमाता: ममता और मातृत्व का स्वरूप हैं। मां कात्यायनी: अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा देती हैं।मां कालरात्रि: अंधकार और भय का नाश करने वाली शक्ति हैं।मांमहागौरी: पवित्रता और आत्मशुद्धि की प्रतीक हैं। मां सिद्धिदात्री: साधना की पूर्णता और सिद्धि का संदेश देती हैं। इस प्रकार नवरात्रि की साधना बाहर की देवी को प्रसन्न करने से कहीं अधिक अपने भीतर की शक्ति को पहचानने की साधना बन जाती है। दुर्गा का अर्थ ही क्या है?: 'दुर्गा' नाम अपने भीतर अत्यंत गहरा आध्यात्मिक अर्थ समेटे हुए है। जो जीवन के दुर्गम संकटों से पार लगाती हैं, जो भय और बाधाओं से रक्षा करती हैं, वही दुर्गा हैं। मनुष्य जब जीवन की कठिनाइयों में घिर जाता है, जब चारों ओर निराशा दिखाई देती है, जब अन्याय और असत्य का प्रभाव बढ़ता प्रतीत होता है, तब उसके भीतर एक अदृश्य शक्ति उसे संघर्ष करने का साहस देती है। सनातन परंपरा उसी शक्ति को मां दुर्गा के रूप में प्रणाम करती है। इसलिए देवी की आराधना का अर्थ केवल यह नहीं कि हम मंदिर में जाकर वरदान मांगें। इसका अर्थ यह भी है कि हम अपने भीतर साहस, सत्य, करुणा, संयम और धर्म की स्थापना करें। शक्ति का वास्तविक स्वरूप: आज समाज को सबसे अधिक आवश्यकता बाहरी शक्ति की नहीं, बल्कि चरित्र की शक्ति की है। शिक्षा है, लेकिन संस्कार कम होते जा रहे हैं। सुविधाएं हैं, लेकिन संतोष घट रहा है। तकनीक है, लेकिन संवाद कम हो रहा है। सूचना है, लेकिन विवेक संकट में है। संपत्ति बढ़ रही है, लेकिन संवेदनाएं कमजोर पड़ रही हैं। ऐसे समय में नवरात्रि हमें स्मरण कराती है कि शक्ति का अर्थ केवल सामर्थ्य नहीं है। सच्ची शक्ति वह है जो कमजोर की रक्षा करे, अन्याय के सामने झुके नहीं, अहंकार को त्यागे और सत्य के मार्ग पर अडिग रहे। मां दुर्गा का सिंह पर आरूढ़ होना भी इसी निर्भीकता का प्रतीक माना जा सकता है। भय पर विजय, अधर्म के विरुद्ध संघर्ष और धर्म की रक्षा—यही शक्ति का सार है। स्त्री में शक्ति का सम्मान: नवरात्रि का सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश नारी सम्मान भी है। जिस सनातन परंपरा में स्त्री को आदिशक्ति, जगदम्बा, दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में पूजा गया, उसी समाज को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि किसी महिला के सम्मान, सुरक्षा और स्वतंत्र अस्तित्व पर आंच न आए। नवरात्रि में कन्या पूजन करने से पहले यह विचार आवश्यक है कि हमारे घर, परिवार और समाज में बेटियों को वास्तव में कितना सम्मान और अधिकार प्राप्त है। मां की प्रतिमा के सामने सिर झुकाना तभी सार्थक होगा, जब जीवित नारी के सम्मान के सामने हमारा सिर स्वयं झुके। देवी की पूजा फूलों से जितनी होती है, उससे कहीं अधिक नारी के सम्मान और सुरक्षा से होती है। उपवास का आध्यात्मिक अर्थ: नवरात्रि के व्रत को केवल भोजन छोड़ने की परंपरा मान लेना इसके आध्यात्मिक पक्ष को सीमित कर देना है। व्रत का व्यापक अर्थ है—अपने मन और इंद्रियों को अनुशासित करना। यदि नौ दिनों तक भोजन में संयम है, लेकिन वाणी में कटुता है; मंदिर में दीप जल रहा है, लेकिन मन में द्वेष है; हाथ में माला है, लेकिन व्यवहार में छल है—तो साधना अधूरी रह जाती है। नवरात्रि का वास्तविक व्रत है—क्रोध पर संयम, लोभ पर नियंत्रण, अहंकार का त्याग, वाणी में मधुरता, व्यवहार में करुणा और कर्म में धर्म। यही साधना मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाती है। देवी महात्म्य का सबसे बड़ा संदेश: देवी महात्म्य की कथाओं में बार-बार यह भाव सामने आता है कि जब अधर्म अपनी सीमा पार करता है, तब शक्ति का प्राकट्य होता है।इसका आध्यात्मिक अर्थ यह है कि मनुष्य को अन्याय के सामने निष्क्रिय नहीं रहना चाहिए। जहां अत्याचार है, वहां साहस चाहिए। जहां असत्य है, वहां सत्य चाहिए। जहां भय है, वहां विश्वास चाहिए। जहां निराशा है, वहां आशा चाहिए। और जहां अंधकार है, वहां प्रकाश चाहिए । मां दुर्गा इसी जागरण की प्रतीक हैं। नवरात्रि हमें भीतर से बदलने का अवसर दे: आज नवरात्रि के भव्य आयोजन होते हैं। मंदिर सजते हैं, पंडाल बनते हैं, माता की ज्योति प्रज्वलित होती है और श्रद्धालु भक्ति में डूब जाते हैं। यह सब हमारी सांस्कृतिक चेतना का सुंदर स्वरूप है। लेकिन पर्व की सार्थकता तब बढ़ेगी, जब इन नौ दिनों की भक्ति हमारे जीवन में नौ अच्छे संकल्प लेकर आए। हम किसी जरूरतमंद की सहायता करें। किसी दुखी व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान लाएं। किसी वृद्ध की उपेक्षा न करें। बेटियों के सम्मान की रक्षा करें। प्रकृति के प्रति अपना दायित्व समझें। अपनी वाणी को संयमित करें।अपने भीतर के अहंकार को पहचानें। असत्य से दूरी बनाएं। और धर्म को केवल पूजा तक सीमित न रखकर आचरण में उतारें। तभी नवरात्रि वास्तव में आत्मजागरण का पर्व बनेगी। विजयादशमी का संदेश: नौ रातों की साधना के बाद दसवें दिन विजयादशमी आती है। यह विजय केवल एक पौराणिक युद्ध की विजय नहीं, बल्कि उस शाश्वत विश्वास की विजय है कि अंततः धर्म की स्थापना होती है और अधर्म का पतन। मनुष्य के भीतर भी प्रतिदिन एक युद्ध चलता है—सद्विचार और दुर्विचार के बीच, संयम और वासना के बीच, सत्य और असत्य के बीच, करुणा और क्रूरता के बीच। नवरात्रि हमें उसी आंतरिक युद्ध में विजय प्राप्त करने का अवसर देती है। मां दुर्गा की आराधना का वास्तविक अर्थ यही है कि हम अपने भीतर के महिषासुर को पहचानें और उसका अंत करने का संकल्प लें। निष्कर्ष शारदीय नवरात्रि सनातन संस्कृति का केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि शक्ति, श्रद्धा, साधना, संस्कार और आत्मजागरण का महापर्व है। मां दुर्गा की आराधना हमें यह विश्वास देती है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि मनुष्य सत्य, धर्म और साहस के साथ खड़ा रहे तो विजय का मार्ग अवश्य निकलता है। आज आवश्यकता केवल देवी के जयकारे लगाने की नहीं, बल्कि देवी के गुणों को जीवन में उतारने की है। जहां नारी का सम्मान होगा, वहां शक्ति होगी। जहां सत्य का सम्मान होगा, वहां धर्म होगा। जहां करुणा होगी, वहां मानवता होगी। जहां साहस होगा, वहां विजय होगी। आइए, इस शारदीय नवरात्रि मां जगदम्बा के चरणों में यही प्रार्थना करें— “हे आदिशक्ति! हमारे भीतर से भय, अहंकार, लोभ, मोह और अज्ञान का अंधकार दूर करें। हमें सत्य के मार्ग पर चलने की शक्ति दें, अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस दें और समाज में प्रेम, सद्भाव, संस्कार एवं मानवता की ज्योति प्रज्वलित करने का सामर्थ्य दें।” जय माता दी। जय जगदम्बे। जय भवानी।
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