प्रकृति का संतुलन बिगड़ा तो पानी वरदान नहीं, संकट बन जाएगा पहाड़ों से उतरता हुआ पानी सदियों से मैदानों के जीवन की धड़कन रहा है। पहाड़ों की गोद में जन्म लेने वाली नदियां मैदानों को सींचती हैं, खेतों में हरियाली लाती हैं, शहरों की प्यास बुझाती हैं और करोड़ों लोगों के जीवन का आधार बनती हैं। लेकिन आज वही जल कहीं बाढ़ बनकर तबाही मचा रहा है, कहीं भू-स्खलन को जन्म दे रहा है और कहीं कुछ ही समय बाद सूखे की चिंता पैदा कर रहा है। सवाल यह है कि जल संकट केवल पानी की कमी का नाम है या पानी के असंतुलित व्यवहार का भी? प्रकृति का अपना एक अनुशासन है। पहाड़ वर्षा और हिम के जल को अपने भीतर संजोते हैं, जंगल उसे रोकते हैं, मिट्टी उसे धीरे-धीरे धरती में उतारती है और नदियां उसे नियंत्रित गति से मैदानों तक पहुंचाती हैं। यही प्राकृतिक व्यवस्था जीवन का आधार थी। मगर जब पहाड़ों पर जंगल कटते हैं, ढलानों को अंधाधुंध काटकर सड़कें और निर्माण खड़े किए जाते हैं, नदियों के रास्तों में अतिक्रमण होता है और जलधाराओं को अपनी सुविधा के अनुसार मोड़ दिया जाता है, तब प्रकृति का संतुलन टूटता है। फिर बारिश होती है तो पानी को रोकने वाला जंगल नहीं मिलता, मिट्टी पानी को सोख नहीं पाती और पहाड़ से मैदान की ओर पानी तेजी से दौड़ पड़ता है। नदी अपने पुराने रास्ते तलाशती है और जहां मनुष्य ने उसके रास्ते में घर, बाजार, सड़क या निर्माण खड़ा कर दिया है, वहां तबाही दस्तक देती है। प्रश्न पानी का नहीं, हमारी नीयत और नीति का भी है। पहाड़ों में भारी वर्षा या बादल फटने जैसी घटनाएं जब सामने आती हैं तो हम उन्हें केवल प्राकृतिक आपदा कहकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते। प्राकृतिक घटनाएं अपने स्थान पर हैं, लेकिन उनका विनाशकारी प्रभाव कितना होगा, यह काफी हद तक हमारी तैयारी और विकास की दिशा पर निर्भर करता है। आज पहाड़ों की पीड़ा मैदानों तक पहुंच रही है और मैदानों की लापरवाही पहाड़ों को और कमजोर कर रही है। पहाड़ केवल पत्थर नहीं, पानी के प्रहरी हैं । पहाड़ों को केवल खनिज, पर्यटन और निर्माण की भूमि समझना बड़ी भूल है। वे प्रकृति के जल-भंडार हैं। उनके जंगल वर्षा की बूंदों को थामते हैं। उनकी मिट्टी जल को धीरे-धीरे नीचे पहुंचाती है। छोटी-छोटी धाराएं नदियों को जीवन देती हैं। जब जंगल कम होते हैं, तो वर्षा का पानी सीधे ढलानों पर बहता है। मिट्टी कटती है, भूस्खलन बढ़ता है और नदियों में अचानक पानी तथा मलबा पहुंचता है। इसका असर पहाड़ से निकलकर मैदान तक आता है। इसलिए पहाड़ों को बचाना केवल पहाड़ी राज्यों की जिम्मेदारी नहीं है। मैदान में रहने वाला हर व्यक्ति पहाड़ के जंगल से जुड़ा हुआ है। जिस पेड़ को हम पहाड़ पर कटते देखते हैं, उसकी कीमत कभी- कभी मैदान में बाढ़ के रूप में चुकानी पड़ती है। नदी का रास्ता रोककर विकास नहीं होता विकास आवश्यक है, लेकिन ऐसा विकास जो प्रकृति की सांस रोक दे, वह विकास नहीं बल्कि भविष्य के संकट की तैयारी है। नदियों के किनारे अवैज्ञानिक निर्माण, जलधाराओं पर अतिक्रमण, प्राकृतिक नालों को बंद करना और बाढ़ क्षेत्रों में बस्तियां बसाना आज अनेक स्थानों पर गंभीर समस्या बन चुका है। बरसात के दिनों में पानी जब अपना रास्ता मांगता है तो उसे प्रशासनिक नक्शे नहीं, अपना प्राकृतिक मार्ग दिखाई देता है। हमने नालों को नालियां समझ लिया, नदियों को जमीन समझ लिया और बाढ़ क्षेत्र को निर्माण योग्य क्षेत्र मान लिया। फिर जब पानी घरों में प्रवेश करता है तो हम पानी को दोष देते हैं। नदी अपराधी नहीं है। हमने नदी की भाषा समझने से इनकार किया है। जल संकट का दूसरा चेहरा विडंबना देखिए —एक ओर कुछ दिनों की बारिश जिंदगी को परेशान कर देती है और दूसरी ओर वर्ष के बाकी दिनों में वही समाज पानी की बूंद-बूंद के लिए संघर्ष करता है। बाढ़ का पानी समुद्र में चला जाता है, क्योंकि हमने वर्षाजल को रोकने और धरती में उतारने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं की। तालाब सूखते हैं, कुएं समाप्त होते हैं, जलधाराएं सिकुड़ती हैं और भूजल का स्तर नीचे जाता है। फिर गर्मी आते ही पानी की कमी का हाहाकार सुनाई देता है। अर्थात समस्या यह नहीं कि हमारे पास पानी नहीं है। समस्या यह है कि जब पानी आता है, तब हम उसे संभाल नहीं पाते और जब वह चला जाता है, तब उसके लिए तरसते हैं। गांव और किसान सबसे पहले भुगतते हैं जल का यह असंतुलन सबसे अधिक किसान को प्रभावित करता है। कभी खेत पानी में डूब जाते हैं, कभी फसल सूखे की भेंट चढ़ जाती है। बीज, खाद, श्रम और उम्मीद—सब कुछ पानी के साथ बह जाता है। किसान केवल अपनी फसल नहीं खोता; उसके साथ परिवार की आर्थिक सुरक्षा, बच्चों की पढ़ाई और भविष्य की योजनाएं भी प्रभावित होती हैं। इसलिए जल प्रबंधन केवल पर्यावरण का विषय नहीं है। यह कृषि, रोजगार, अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता का भी प्रश्न है। समाधान प्रकृति से लड़ने में नहीं, उसके साथ चलने में है अब समय केवल आपदा के बाद राहत बांटने का नहीं, आपदा से पहले विवेक जगाने का है। पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण की वैज्ञानिक सीमा तय करनी होगी। जंगलों की रक्षा करनी होगी। जलधाराओं और प्राकृतिक नालों को अतिक्रमण से मुक्त करना होगा। नदी के बाढ़ क्षेत्र में निर्माण पर कठोर नियंत्रण आवश्यक है। वर्षाजल संचयन को केवल सरकारी योजना नहीं, जन-अभियान बनाना होगा। गांवों में तालाब, कुएं और पारंपरिक जल-स्रोत पुनर्जीवित करने होंगे। शहरों में वर्षाजल को सीधे नालियों में बहाने के बजाय भूजल पुनर्भरण की व्यवस्था करनी होगी। बांधों और जलाशयों का संचालन भी वैज्ञानिक मौसम पूर्वानुमान और नदी के प्राकृतिक प्रवाह को ध्यान में रखकर होना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात—प्रकृति को केवल आपदा के समय याद करने की आदत बदलनी होगी। आने वाली पीढ़ी का सवाल: आज हम जिस जमीन पर निर्माण कर रहे हैं, वह केवल हमारी नहीं है। आने वाली पीढ़ियों का भी उस पर अधिकार है। हम उन्हें क्या देंगे? कंक्रीट के जंगल, सूखती नदियां और प्रदूषित जल? या ऐसे पहाड़ जिन पर जंगल हों, ऐसी नदियां जिनमें निर्मल प्रवाह हो और ऐसे मैदान जहां किसान निश्चिंत होकर खेती कर सके? यह चुनाव आज हमारे सामने है। जल जीवन है—यह बात बचपन से सुनते आए हैं। लेकिन अब इस वाक्य को केवल पाठ्यपुस्तक की पंक्ति नहीं, जीवन की नीति बनाना होगा। पहाड़ से मैदान तक पानी का सफर तभी सुखद होगा, जब मनुष्य अपनी लालच की सीमा और प्रकृति की मर्यादा दोनों समझेगा। प्रकृति हमें बार-बार संकेत दे रही है। पहाड़ खिसक रहे हैं, नदियां उफन रही हैं, मैदान डूब रहे हैं और दूसरी ओर जलस्रोत सूख रहे हैं। ये अलग-अलग घटनाएं नहीं, एक ही बिगड़ते संतुलन की चेतावनियां हैं। अब भी समय है। पहाड़ को पहाड़ रहने दें, जंगल को जंगल रहने दें और नदी को नदी रहने दें। क्योंकि जिस दिन हमने प्रकृति के रास्ते पूरी तरह रोक दिए, उस दिन पानी रास्ता नहीं पूछेगा—वह अपना रास्ता खुद बनाएगा। और तब सवाल यह नहीं होगा कि पानी कितना आया, बल्कि यह होगा कि हमने प्रकृति को कितना समझा और अपने भविष्य को कितना बचाया।
प्रकृति का संतुलन बिगड़ा तो पानी वरदान नहीं, संकट बन जाएगा पहाड़ों से उतरता हुआ पानी सदियों से मैदानों के जीवन की धड़कन रहा है। पहाड़ों की गोद में जन्म लेने वाली नदियां मैदानों को सींचती हैं, खेतों में हरियाली लाती हैं, शहरों की प्यास बुझाती हैं और करोड़ों लोगों के जीवन का आधार बनती हैं। लेकिन आज वही जल कहीं बाढ़ बनकर तबाही मचा रहा है, कहीं भू-स्खलन को जन्म दे रहा है और कहीं कुछ ही समय बाद सूखे की चिंता पैदा कर रहा है। सवाल यह है कि जल संकट केवल पानी की कमी का नाम है या पानी के असंतुलित व्यवहार का भी? प्रकृति का अपना एक अनुशासन है। पहाड़ वर्षा और हिम के जल को अपने भीतर संजोते हैं, जंगल उसे रोकते हैं, मिट्टी उसे धीरे-धीरे धरती में उतारती है और नदियां उसे नियंत्रित गति से मैदानों तक पहुंचाती हैं। यही प्राकृतिक व्यवस्था जीवन का आधार थी। मगर जब पहाड़ों पर जंगल कटते हैं, ढलानों को अंधाधुंध काटकर सड़कें और निर्माण खड़े किए जाते हैं, नदियों के रास्तों में अतिक्रमण होता है और जलधाराओं को अपनी सुविधा के अनुसार मोड़ दिया जाता है, तब प्रकृति का संतुलन टूटता है। फिर बारिश होती है तो पानी को रोकने वाला जंगल नहीं मिलता, मिट्टी पानी को सोख नहीं पाती और पहाड़ से मैदान की ओर पानी तेजी से दौड़ पड़ता है। नदी अपने पुराने रास्ते तलाशती है और जहां मनुष्य ने उसके रास्ते में घर, बाजार, सड़क या निर्माण खड़ा कर दिया है, वहां तबाही दस्तक देती है। प्रश्न पानी का नहीं, हमारी नीयत और नीति का भी है। पहाड़ों में भारी वर्षा या बादल फटने जैसी घटनाएं जब सामने आती हैं तो हम उन्हें केवल प्राकृतिक आपदा कहकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते। प्राकृतिक घटनाएं अपने स्थान पर हैं, लेकिन उनका विनाशकारी प्रभाव कितना होगा, यह काफी हद तक हमारी तैयारी और विकास की दिशा पर निर्भर करता है। आज पहाड़ों की पीड़ा मैदानों तक पहुंच रही है और मैदानों की लापरवाही पहाड़ों को और कमजोर कर रही है। पहाड़ केवल पत्थर नहीं, पानी के प्रहरी हैं । पहाड़ों को केवल खनिज, पर्यटन और निर्माण की भूमि समझना बड़ी भूल है। वे प्रकृति के जल-भंडार हैं। उनके जंगल वर्षा की बूंदों को थामते हैं। उनकी मिट्टी जल को धीरे-धीरे नीचे पहुंचाती है। छोटी-छोटी धाराएं नदियों को जीवन देती हैं। जब जंगल कम होते हैं, तो वर्षा का पानी सीधे ढलानों पर बहता है। मिट्टी कटती है, भूस्खलन बढ़ता है और नदियों में अचानक पानी तथा मलबा पहुंचता है। इसका असर पहाड़ से निकलकर मैदान तक आता है। इसलिए पहाड़ों को बचाना केवल पहाड़ी राज्यों की जिम्मेदारी नहीं है। मैदान में रहने वाला हर व्यक्ति पहाड़ के जंगल से जुड़ा हुआ है। जिस पेड़ को हम पहाड़ पर कटते देखते हैं, उसकी कीमत कभी- कभी मैदान में बाढ़ के रूप में चुकानी पड़ती है। नदी का रास्ता रोककर विकास नहीं होता विकास आवश्यक है, लेकिन ऐसा विकास जो प्रकृति की सांस रोक दे, वह विकास नहीं बल्कि भविष्य के संकट की तैयारी है। नदियों के किनारे अवैज्ञानिक निर्माण, जलधाराओं पर अतिक्रमण, प्राकृतिक नालों को बंद करना और बाढ़ क्षेत्रों में बस्तियां बसाना आज अनेक स्थानों पर गंभीर समस्या बन चुका है। बरसात के दिनों में पानी जब अपना रास्ता मांगता है तो उसे प्रशासनिक नक्शे नहीं, अपना प्राकृतिक मार्ग दिखाई देता है। हमने नालों को नालियां समझ लिया, नदियों को जमीन समझ लिया और बाढ़ क्षेत्र को निर्माण योग्य क्षेत्र मान लिया। फिर जब पानी घरों में प्रवेश करता है तो हम पानी को दोष देते हैं। नदी अपराधी नहीं है। हमने नदी की भाषा समझने से इनकार किया है। जल संकट का दूसरा चेहरा विडंबना देखिए —एक ओर कुछ दिनों की बारिश जिंदगी को परेशान कर देती है और दूसरी ओर वर्ष के बाकी दिनों में वही समाज पानी की बूंद-बूंद के लिए संघर्ष करता है। बाढ़ का पानी समुद्र में चला जाता है, क्योंकि हमने वर्षाजल को रोकने और धरती में उतारने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं की। तालाब सूखते हैं, कुएं समाप्त होते हैं, जलधाराएं सिकुड़ती हैं और भूजल का स्तर नीचे जाता है। फिर गर्मी आते ही पानी की कमी का हाहाकार सुनाई देता है। अर्थात समस्या यह नहीं कि हमारे पास पानी नहीं है। समस्या यह है कि जब पानी आता है, तब हम उसे संभाल नहीं पाते और जब वह चला जाता है, तब उसके लिए तरसते हैं। गांव और किसान सबसे पहले भुगतते हैं जल का यह असंतुलन सबसे अधिक किसान को प्रभावित करता है। कभी खेत पानी में डूब जाते हैं, कभी फसल सूखे की भेंट चढ़ जाती है। बीज, खाद, श्रम और उम्मीद—सब कुछ पानी के साथ बह जाता है। किसान केवल अपनी फसल नहीं खोता; उसके साथ परिवार की आर्थिक सुरक्षा, बच्चों की पढ़ाई और भविष्य की योजनाएं भी प्रभावित होती हैं। इसलिए जल प्रबंधन केवल पर्यावरण का विषय नहीं है। यह कृषि, रोजगार, अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता का भी प्रश्न है। समाधान प्रकृति से लड़ने में नहीं, उसके साथ चलने में है अब समय केवल आपदा के बाद राहत बांटने का नहीं, आपदा से पहले विवेक जगाने का है। पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण की वैज्ञानिक सीमा तय करनी होगी। जंगलों की रक्षा करनी होगी। जलधाराओं और प्राकृतिक नालों को अतिक्रमण से मुक्त करना होगा। नदी के बाढ़ क्षेत्र में निर्माण पर कठोर नियंत्रण आवश्यक है। वर्षाजल संचयन को केवल सरकारी योजना नहीं, जन-अभियान बनाना होगा। गांवों में तालाब, कुएं और पारंपरिक जल-स्रोत पुनर्जीवित करने होंगे। शहरों में वर्षाजल को सीधे नालियों में बहाने के बजाय भूजल पुनर्भरण की व्यवस्था करनी होगी। बांधों और जलाशयों का संचालन भी वैज्ञानिक मौसम पूर्वानुमान और नदी के प्राकृतिक प्रवाह को ध्यान में रखकर होना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात—प्रकृति को केवल आपदा के समय याद करने की आदत बदलनी होगी। आने वाली पीढ़ी का सवाल: आज हम जिस जमीन पर निर्माण कर रहे हैं, वह केवल हमारी नहीं है। आने वाली पीढ़ियों का भी उस पर अधिकार है। हम उन्हें क्या देंगे? कंक्रीट के जंगल, सूखती नदियां और प्रदूषित जल? या ऐसे पहाड़ जिन पर जंगल हों, ऐसी नदियां जिनमें निर्मल प्रवाह हो और ऐसे मैदान जहां किसान निश्चिंत होकर खेती कर सके? यह चुनाव आज हमारे सामने है। जल जीवन है—यह बात बचपन से सुनते आए हैं। लेकिन अब इस वाक्य को केवल पाठ्यपुस्तक की पंक्ति नहीं, जीवन की नीति बनाना होगा। पहाड़ से मैदान तक पानी का सफर तभी सुखद होगा, जब मनुष्य अपनी लालच की सीमा और प्रकृति की मर्यादा दोनों समझेगा। प्रकृति हमें बार-बार संकेत दे रही है। पहाड़ खिसक रहे हैं, नदियां उफन रही हैं, मैदान डूब रहे हैं और दूसरी ओर जलस्रोत सूख रहे हैं। ये अलग-अलग घटनाएं नहीं, एक ही बिगड़ते संतुलन की चेतावनियां हैं। अब भी समय है। पहाड़ को पहाड़ रहने दें, जंगल को जंगल रहने दें और नदी को नदी रहने दें। क्योंकि जिस दिन हमने प्रकृति के रास्ते पूरी तरह रोक दिए, उस दिन पानी रास्ता नहीं पूछेगा—वह अपना रास्ता खुद बनाएगा। और तब सवाल यह नहीं होगा कि पानी कितना आया, बल्कि यह होगा कि हमने प्रकृति को कितना समझा और अपने भविष्य को कितना बचाया।

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