अरुणेश कुमार श्रीवास्तव
बस्ती। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा बस्ती के पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी को राष्ट्रीय महामंत्री की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दिए जाने के बाद जिले की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। 31 अगस्त को राष्ट्रीय महामंत्री बनने के बाद हरीश द्विवेदी का बस्ती में प्रथम आगमन है। इसे लेकर घघौआ से लेकर सुयश होटल तक जगह-जगह स्वागत के लिए होर्डिंग, बैनर और पोस्टर लगाए गए हैं। खास बात यह है कि इन स्वागत संदेशों में भाजपा के समर्थकों के साथ वे चेहरे भी नजर आ रहे हैं, जिन्हें कभी हरीश द्विवेदी का राजनीतिक विरोधी माना जाता रहा है।
हरीश द्विवेदी वर्ष 2014 में पहली बार बस्ती लोकसभा सीट से भाजपा के सांसद निर्वाचित हुए थे। इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में बस्ती की जनता ने उन्हें दोबारा संसद पहुंचाया। हालांकि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के रामप्रसाद चौधरी ने उन्हें पराजित कर दिया। इस हार के बाद भाजपा के भीतर हार के कारणों को लेकर तरह-तरह की राजनीतिक चर्चाएं होती रही हैं। पार्टी के अंदर एक वर्ग ने इसे कथित तौर पर ‘भीतरघात’ से जोड़कर देखा, जबकि कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे स्थानीय संगठन और विधानसभा स्तर के समीकरणों से भी जोड़कर देखा।
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव के परिणामों को भी इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में देखा जाता है। बस्ती जनपद की पांच विधानसभा सीटों में भाजपा केवल हर्रैया विधानसभा सीट पर अपनी जीत दोहरा सकी, जहां अजय सिंह विजयी हुए। शेष चार सीटों पर भाजपा के तत्कालीन विधायक दोबारा चुनाव जीतने में सफल नहीं रहे। इन परिणामों को लेकर भी भाजपा के अंदर और बाहर हरीश द्विवेदी की भूमिका को लेकर राजनीतिक चर्चाएं हुईं।
अब समय का पहिया एक बार फिर घूमता दिखाई दे रहा है। राष्ट्रीय नेतृत्व ने हरीश द्विवेदी को भाजपा का राष्ट्रीय महामंत्री बनाकर संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी है। इसके बाद बस्ती में उनके स्वागत को लेकर जिस तरह का उत्साह दिखाई दे रहा है, उसने स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं को और हवा दे दी है।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि 31 अगस्त के स्वागत समारोह में लगाए गए तमाम होर्डिंग और बैनर केवल व्यक्तिगत सम्मान का प्रतीक नहीं हैं। इनमें ऐसे कई लोग भी नजर आ रहे हैं जो आगामी विधानसभा चुनाव में स्वयं को भाजपा का टिकट दावेदार मानकर चल रहे हैं। माना जा रहा है कि राष्ट्रीय महामंत्री के साथ नजदीकी और सार्वजनिक रूप से मजबूत संबंध दिखाकर कई संभावित दावेदार अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करना चाहते हैं।
लेकिन सवाल यह भी है कि जब एक विधानसभा सीट से टिकट के कई दावेदार होंगे तो टिकट तो किसी एक को ही मिलेगा। ऐसे में टिकट से वंचित होने वाले दावेदार पार्टी के निर्णय को स्वीकार कर संगठन के साथ मजबूती से खड़े रहेंगे या फिर पुरानी तरह बगावती तेवर अपनाएंगे, यह आने वाला समय बताएगा।
राजनीति में परिस्थितियों के अनुसार समीकरण बदलते रहते हैं। जो चेहरे कभी एक-दूसरे के विरोध में खड़े दिखाई देते थे, वही आज स्वागत के पोस्टरों और होर्डिंग्स में साथ नजर आ रहे हैं। इसे कोई राजनीतिक एकता का संकेत मान रहा है तो कोई इसे राजनीतिक अवसरवादिता से जोड़कर देख रहा है। हालांकि किसी के मन में क्या है, यह केवल सार्वजनिक तस्वीरों से तय नहीं किया जा सकता।
फिलहाल बस्ती की सियासत में हरीश द्विवेदी का राष्ट्रीय महामंत्री बनना भाजपा के लिए एक बड़ा राजनीतिक अवसर माना जा रहा है। यदि स्वागत के दौरान दिखाई दे रही यह एकजुटता आने वाले समय में संगठनात्मक स्तर पर भी कायम रहती है और 2027 के विधानसभा चुनाव तक भाजपा के सभी नेता और दावेदार एकजुट होकर मैदान में उतरते हैं, तो पार्टी जिले की पांचों विधानसभा सीटों पर मजबूत चुनौती पेश कर सकती है।
वहीं यदि टिकट वितरण के समय दावेदारी और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं संगठनात्मक एकता पर भारी पड़ती हैं और भीतरखाने असंतोष या बगावत जन्म लेती है, तो इसका असर चुनावी परिणामों पर पड़ सकता है। ऐसे में 2027 का विधानसभा चुनाव केवल प्रत्याशियों की लोकप्रियता का ही नहीं, बल्कि हरीश द्विवेदी के संगठनात्मक प्रभाव और बस्ती में भाजपा को एकजुट रखने की उनकी क्षमता का भी बड़ा राजनीतिक परीक्षण होगा।

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