वॉयस ऑफ बस्ती संवाददाता
मेघालय (शिलांग)। दृढ़ इच्छाशक्ति, प्रकृति के प्रति प्रेम और समाज के लिए कुछ करने का जज्बा इंसान को ऐसी ऊंचाई तक पहुंचा सकता है, जिसकी कल्पना भी कभी उसने नहीं की होती। मेघालय के सेज गांव निवासी करीब 70 वर्षीय हैली वार की कहानी इसी जज्बे और समर्पण की मिसाल है। उन्होंने अपने जीवन के लगभग 50 वर्ष जीवित पेड़ों की जड़ों से पुल तैयार करने और इस पारंपरिक तकनीक को संरक्षित करने में लगा दिए। उनके लंबे और उल्लेखनीय योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली और 16 मार्च 2026 को उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया।
हैली वार ने बताया कि उन्होंने महज 10 वर्ष की उम्र में अपने पिता के साथ लिविंग रूट ब्रिज बनाने का काम शुरू किया था। उस समय उनके सामने पुरस्कार अथवा प्रसिद्धि हासिल करने का कोई उद्देश्य नहीं था। उनका मकसद गांव के लोगों की आवागमन संबंधी परेशानी को दूर करना, एक गांव को दूसरे गांव से जोड़ना और कृषि कार्यों को आसान बनाना था। इसी उद्देश्य से उन्होंने पेड़ों की हवाई जड़ों को विशेष दिशा में बढ़ाना और उन्हें आपस में जोड़कर पुल का आकार देना शुरू किया।
लिविंग रूट ब्रिज सामान्य पुलों से बिल्कुल अलग होते हैं। इनके निर्माण में सीमेंट, सरिया या कंक्रीट की जगह जीवित पेड़ों की जड़ों को प्राकृतिक रूप से विकसित कर पुल का स्वरूप दिया जाता है। जड़ों को आवश्यक दिशा में मोड़कर उन्हें सहारा दिया जाता है। वर्षों तक उनकी देखभाल और मार्गदर्शन के बाद जड़ें आपस में मजबूत होती जाती हैं और एक ऐसा प्राकृतिक पुल तैयार होता है, जो समय के साथ और मजबूत होता रहता है।
दस साल की उम्र से शुरू हुआ सफर, पांच दशक तक जारी रहा काम
हैली वार के लिए यह केवल पुल बनाने का काम नहीं था, बल्कि उनके जीवन का हिस्सा बन गया। करीब 10 वर्ष की उम्र में पिता के साथ शुरू हुआ यह सिलसिला पांच दशक तक चलता रहा। उन्होंने लगातार पेड़ों की जड़ों को दिशा दी, उनकी देखभाल की और प्राकृतिक तरीके से पुल को मजबूत बनाने का काम किया। करीब 70 वर्ष की उम्र में भी उनके अनुभव और मेहनत का परिणाम उमकर रूट ब्रिज के रूप में दिखाई देता है।
इस पुल ने स्थानीय लोगों के लिए आवागमन को आसान बनाने के साथ कृषि कार्यों में भी सुविधा प्रदान की। बरसात के मौसम में जब प्राकृतिक जलधाराएं और नाले रास्ते में बाधा बनते हैं, ऐसे स्थानों पर लिविंग रूट ब्रिज स्थानीय समुदाय के लिए उपयोगी साबित होते हैं।
लागत नहीं, लोगों का सहयोग और प्रकृति बनी आधार
हैली वार बताते हैं कि इस पुल को तैयार करने में पारंपरिक निर्माण की तरह भारी आर्थिक लागत नहीं आई। उनका कहना है कि लोगों के सहयोग और प्रकृति के साथ तालमेल से यह पुल तैयार हुआ है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका पेड़ों की जीवित जड़ों की है, जिन्हें वर्षों तक सही दिशा में बढ़ाया और संभाला जाता है।
उनकी यह कार्यपद्धति आधुनिक निर्माण के बीच प्रकृति आधारित पारंपरिक ज्ञान की उपयोगिता को भी सामने लाती है। यही कारण है कि उनके काम को केवल स्थानीय सुविधा के रूप में नहीं, बल्कि पर्यावरण और प्राकृतिक संरक्षण से जुड़े प्रयास के रूप में भी देखा जा रहा है।
20 से 25 युवाओं को सिखाई पुल बनाने की कला
हैली वार ने अपनी इस कला और अनुभव को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने पर भी जोर दिया। उन्होंने करीब 20 से 25 युवाओं को लिविंग रूट ब्रिज बनाने का प्रशिक्षण दिया है। ये युवा अब आगे दूसरे लोगों को भी इस तकनीक की जानकारी और प्रशिक्षण दे रहे हैं।
इससे मेघालय की पारंपरिक जड़-पुल निर्माण तकनीक को संरक्षित करने की दिशा में प्रयास आगे बढ़ रहा है। हैली वार का पांच दशक का अनुभव अब केवल उनके तक सीमित नहीं है, बल्कि युवाओं के माध्यम से आगे की पीढ़ी तक पहुंच रहा है।
दूर-दूर से ब्रिज देखने पहुंचते हैं लोग
उमकर रूट ब्रिज अब स्थानीय आवागमन के साथ-साथ पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र भी बन चुका है। इसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं। प्राकृतिक जड़ों से तैयार इस अनोखे पुल को देखने और उसकी निर्माण प्रक्रिया को समझने में पर्यटकों की विशेष रुचि रहती है।
पुल को देखने आने वाले लोगों के लिए शुल्क भी निर्धारित किया गया है। बड़े लोगों के लिए 80 रुपये और छोटे बच्चों के लिए 10 रुपये शुल्क लिया जाता है। पर्यटकों के आने से स्थानीय स्तर पर पर्यटन गतिविधियों को भी बढ़ावा मिल रहा है।
विश्वविद्यालय ने भी किया सम्मानित
हैली वार के योगदान को विश्वविद्यालय स्तर पर भी सम्मान मिला है। यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी मेघालय (यूएसटीएम) के सामाजिक कार्य विभाग की ओर से उन्हें ‘सोशल वर्क एक्सीलेंस अवार्ड-2026’ प्रदान किया गया।
16 मार्च 2026 को दिए गए इस प्रमाण-पत्र में हैली वार के 50 वर्षों के समर्पण का उल्लेख करते हुए मेघालय की लिविंग रूट ब्रिज परंपरा को संरक्षित करने में उनके योगदान की सराहना की गई है। प्रमाण-पत्र में पेड़ों की हवाई जड़ों को दिशा देकर टिकाऊ संरचना तैयार करने तथा प्रकृति और जलवायु संरक्षण के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत करने के उनके कार्य को रेखांकित किया गया है।
निर्मला सीतारमण भी पहुंचीं सेज गांव
हैली वार के काम की पहचान अब मेघालय से बाहर भी पहुंच चुकी है। उनके अनुसार केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भी उनके सेज गांव पहुंच चुकी हैं। गांव में पहुंचकर उनके काम और प्राकृतिक तरीके से तैयार किए गए रूट ब्रिज की जानकारी लेना स्थानीय स्तर पर इस प्रयास के महत्व को दर्शाता है।
हैली वार का कहना है कि उन्होंने यह काम किसी पुरस्कार की उम्मीद में नहीं किया। गांव के लोगों को सुविधा मिले और प्रकृति के साथ तालमेल बनाकर जरूरत पूरी हो, इसी सोच के साथ उन्होंने बचपन में शुरू किया काम लगातार जारी रखा।
आज करीब पांच दशक बाद वही काम उनकी पहचान बन चुका है। उमकर रूट ब्रिज सिर्फ एक रास्ता नहीं, बल्कि आधी सदी की मेहनत, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता, सामुदायिक सहयोग और पारंपरिक ज्ञान का जीवंत उदाहरण है। हैली वार ने साबित किया है कि किसी काम को पूरी निष्ठा और धैर्य के साथ वर्षों तक किया जाए तो वह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी विरासत बन सकता है।


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