अरुणेश श्रीवास्तव
देश की स्वतंत्रता केवल इतिहास का एक गौरवपूर्ण अध्याय नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की आकांक्षाओं, संघर्षों और बलिदानों का परिणाम है। इसी स्वतंत्रता की स्मृतियों को जन-जन तक पहुंचाने और राष्ट्र के प्रति सम्मान की भावना को मजबूत करने के उद्देश्य से इन दिनों भारतीय जनता पार्टी द्वारा प्रदेश के लगभग हर जिले में तिरंगा यात्राओं का आयोजन किया जा रहा है। गांवों, कस्बों और शहरों की सड़कों पर हाथों में तिरंगा लेकर निकलते लोग देशभक्ति का संदेश दे रहे हैं। यह दृश्य निश्चित रूप से भावनात्मक और प्रेरणादायक है।
तिरंगा केवल तीन रंगों का कपड़ा नहीं है। यह भारत की संप्रभुता, लोकतंत्र, विविधता और राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक है। इसके सामने राजनीतिक विचारधाराओं, जातीय पहचान और क्षेत्रीय सीमाओं का महत्व छोटा पड़ जाता है। इसलिए तिरंगा यात्रा का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब यह आयोजन किसी दल विशेष के कार्यक्रम तक सीमित न रहकर समाज के व्यापक वर्ग को राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों का एहसास कराने वाला अभियान बने।
भारतीय जनता पार्टी द्वारा हर जिले में तिरंगा यात्रा निकालना राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दल केवल चुनाव लड़ने वाले संगठन नहीं होते, बल्कि समाज को दिशा देने और जनभावनाओं को सकारात्मक मुद्दों से जोड़ने की जिम्मेदारी भी उनकी होती है। यदि तिरंगा यात्रा के माध्यम से युवाओं में देश के इतिहास, स्वतंत्रता आंदोलन और संविधान के प्रति सम्मान पैदा होता है, तो यह निश्चित रूप से स्वागत योग्य पहल है।
लेकिन राष्ट्रभक्ति का अर्थ केवल हाथ में तिरंगा लेकर यात्रा निकालना नहीं हो सकता। राष्ट्र के प्रति सच्ची निष्ठा का अर्थ है अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना, कानून का सम्मान करना, भ्रष्टाचार से दूरी बनाना, महिलाओं का सम्मान करना, पर्यावरण की रक्षा करना और समाज के कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशील रहना। देश के प्रति प्रेम सड़क पर दिखाई देने वाले नारों से आगे बढ़कर हमारे व्यवहार में दिखाई देना चाहिए।
आज देश की सबसे बड़ी आवश्यकता ऐसी राष्ट्रभक्ति की है जो समाज को जोड़ने का काम करे। भारत की शक्ति उसकी विविधता में है। अलग-अलग भाषा, वेशभूषा, खान-पान, परंपराएं और विचार होने के बावजूद तिरंगा सभी को एक सूत्र में बांधता है। इसलिए तिरंगा यात्रा के दौरान यह संदेश भी मजबूत होना चाहिए कि राष्ट्रवाद किसी व्यक्ति, दल या समुदाय की निजी संपत्ति नहीं है। तिरंगा हर भारतीय का है और इसकी गरिमा की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का समान दायित्व है।
विशेष रूप से युवाओं की भागीदारी इस प्रकार के आयोजनों को सार्थक बना सकती है। आज का युवा सामाजिक माध्यमों और डिजिटल दुनिया से तेजी से जुड़ा हुआ है। उसे केवल इतिहास की जानकारी देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह समझाना भी आवश्यक है कि स्वतंत्रता के बाद भारत ने लोकतंत्र, विज्ञान, शिक्षा, तकनीक और विकास के क्षेत्र में कितनी लंबी यात्रा तय की है। तिरंगा यात्रा यदि युवाओं को राष्ट्र निर्माण के कार्यों से जोड़ने का माध्यम बने तो इसका प्रभाव लंबे समय तक दिखाई देगा।
साथ ही, ऐसे आयोजनों में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठने की आवश्यकता है। यदि किसी दल द्वारा निकाली गई तिरंगा यात्रा में दूसरे विचार रखने वाले नागरिक भी सम्मानपूर्वक शामिल हो सकें, तो यह लोकतंत्र की खूबसूरती होगी। राष्ट्रीय पर्व और राष्ट्रध्वज किसी राजनीतिक दल की सीमा में नहीं बंध सकते। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि राष्ट्रहित के मुद्दों पर व्यापक सामाजिक सहभागिता ही लोकतांत्रिक संस्कृति को मजबूत करती है।
तिरंगा यात्रा का एक और महत्वपूर्ण पक्ष स्थानीय समस्याओं से जुड़ना होना चाहिए। यदि यात्रा के साथ स्वच्छता अभियान, पौधरोपण, रक्तदान, सड़क सुरक्षा, नशामुक्ति, शिक्षा और नागरिक जागरूकता जैसे कार्यक्रम भी जोड़े जाएं, तो राष्ट्रभक्ति को सामाजिक जिम्मेदारी का मजबूत आधार मिल सकता है। इससे कार्यक्रम केवल कुछ घंटों की गतिविधि न रहकर जनभागीदारी के स्थायी अभियान में बदल सकता है।
आजादी के अमृतकाल में देश तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारत की वैश्विक भूमिका मजबूत हो रही है और नई पीढ़ी के सामने विकास के अनेक अवसर हैं। ऐसे समय में तिरंगा हमें केवल अतीत के बलिदानों की याद नहीं दिलाता, बल्कि भविष्य के भारत की जिम्मेदारी भी सौंपता है। हमें ऐसा भारत बनाना है जहां विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, युवाओं को रोजगार मिले, शिक्षा गुणवत्तापूर्ण हो और समाज में भाईचारा कायम रहे।
इसलिए भाजपा की तिरंगा यात्राओं को केवल राजनीतिक आयोजन के रूप में देखने के बजाय उसके सकारात्मक सामाजिक संदेश को भी समझना चाहिए। साथ ही आयोजकों की जिम्मेदारी है कि वे तिरंगे की गरिमा, अनुशासन और राष्ट्रीय एकता को सर्वोच्च स्थान दें।
तिरंगा आसमान में तभी सबसे ऊंचा दिखाई देगा, जब उसके नीचे खड़ा समाज भी एकता, सद्भाव, ईमानदारी और जिम्मेदारी के मूल्यों को अपने जीवन में उतारे। तिरंगा यात्रा की सफलता भीड़ की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से तय होगी कि यात्रा समाप्त होने के बाद कितने लोगों के भीतर राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाने का संकल्प मजबूत हुआ। यही तिरंगे को सच्चा सम्मान होगा और यही स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों के भारत की ओर वास्तविक कदम भी।

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