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Tuesday, August 11, 2026

छात्रों के सवाल पर सियासत का अलग-अलग चेहरा - अरुणेश श्रीवास्तव

जंतर-मंतर से लेकर झारखंड तक छात्रों के आंदोलनों ने एक बार फिर भारतीय राजनीति के सामने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है—क्या छात्रों के अधिकार और उनके भविष्य का सवाल राजनीतिक दलों के लिए हर जगह समान होता है? या फिर आंदोलन का स्थान, सरकार का राजनीतिक रंग और उससे मिलने वाला राजनीतिक लाभ तय करता है कि किस मुद्दे पर कितनी आवाज उठानी है?

छात्र आंदोलन किसी भी लोकतंत्र के लिए असामान्य घटना नहीं हैं। युवा जब अपनी परीक्षा, रोजगार और भविष्य को लेकर सड़क पर उतरते हैं तो इसे केवल कानून-व्यवस्था का विषय मानना लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। उनकी शिकायतों को सुनना, तथ्यों की जांच करना और समाधान का रास्ता निकालना सरकार की जिम्मेदारी है। आंदोलन के दौरान अनुशासन और कानून का पालन जरूरी है, लेकिन शासन का पहला दायित्व संवाद होना चाहिए, टकराव नहीं।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के सवाल को लेकर राहुल गांधी और अखिलेश यादव की सक्रियता ने इस मुद्दे को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया। अरविंद केजरीवाल ने भी छात्र हित और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े सवालों पर अपनी राजनीतिक सक्रियता दिखाई। विपक्षी नेताओं का छात्रों के बीच पहुंचना लोकतंत्र में स्वाभाविक है। विपक्ष का काम ही सरकार से सवाल पूछना और जनता की आवाज को मजबूती देना है।

लेकिन असली कसौटी तब सामने आती है, जब इसी तरह का सवाल किसी ऐसी सरकार के सामने खड़ा हो, जिसे विपक्षी दलों का समर्थन प्राप्त हो या जिससे राजनीतिक संबंध हों।

झारखंड में छात्रों के प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई ने इसी विरोधाभास को सामने ला दिया। छात्रों की मांग चाहे उचित हो या अनुचित, उसका निर्णय संवाद और तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। यदि प्रदर्शनकारी कानून तोड़ रहे थे तो प्रशासन के पास कार्रवाई के वैधानिक रास्ते मौजूद हैं। लेकिन कार्रवाई का स्वरूप ऐसा होना चाहिए कि उससे समस्या और न बढ़े। लाठी या बल प्रयोग अंतिम विकल्प होना चाहिए, पहला नहीं।

यहां राहुल गांधी, अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल सहित पूरे विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि दिल्ली में छात्रों के पक्ष में खड़ा होना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है तो झारखंड में भी छात्रों के सवाल पर उतनी ही स्पष्टता अपेक्षित है। लोकतंत्र में राजनीतिक सुविधा के अनुसार सिद्धांत बदलना जनता को पसंद नहीं आता।

अखिलेश यादव के सामने यह चुनौती विशेष रूप से बड़ी है। उत्तर प्रदेश में युवाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों की संख्या बहुत बड़ी है। परीक्षा, भर्ती और रोजगार के मुद्दे उनकी राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। इसलिए उनसे यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे हर प्रदेश के छात्रों के साथ समान संवेदनशीलता दिखाएं। यदि किसी सरकार की कार्रवाई गलत है तो वह सरकार अपने राजनीतिक खेमे की हो या विरोधी खेमे की, सवाल उठना चाहिए।

राहुल गांधी की राजनीति पिछले कुछ समय में युवाओं, रोजगार और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर केंद्रित रही है। ऐसे में छात्र आंदोलनों के प्रति उनकी सक्रियता स्वाभाविक है। लेकिन उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता की असली परीक्षा भी वहीं होगी जहां सवाल किसी विरोधी सरकार से नहीं, बल्कि सहयोगी या मित्र राजनीतिक समूह से जुड़े शासन से हो। लोकतांत्रिक राजनीति में असहमति का मूल्य तभी है जब वह अपने पक्ष के लिए भी उतनी ही कठोर हो जितनी विपक्ष के लिए।

अरविंद केजरीवाल की राजनीति भी लंबे समय तक व्यवस्था परिवर्तन, भ्रष्टाचार विरोध और आम नागरिक के अधिकारों के सवालों से जुड़ी रही है। इसलिए उनसे भी यही अपेक्षा की जानी चाहिए कि छात्रों के प्रश्न को केवल राजनीतिक अवसर के रूप में नहीं, बल्कि व्यवस्था सुधार के मुद्दे के रूप में देखें।

आज देश का युवा सबसे अधिक जिस चीज से परेशान है, वह केवल बेरोजगारी नहीं है। उससे भी बड़ा संकट है अनिश्चितता। छात्र वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता है। परिवार अपनी बचत खर्च करता है। उम्र की सीमा समाप्त होने का डर बना रहता है। परीक्षा होने के बाद परिणाम में देरी, प्रश्नपत्र को लेकर विवाद, भर्ती प्रक्रिया पर सवाल या न्यायालय में मामला पहुंच जाना—इन सबके बीच एक युवा का महत्वपूर्ण समय निकल जाता है।

इसलिए सरकारों को छात्र आंदोलन को राजनीतिक विरोध मानने के बजाय चेतावनी के रूप में देखना चाहिए। जहां हजारों युवा एक ही समस्या को लेकर आवाज उठा रहे हों, वहां यह समझना जरूरी है कि व्यवस्था में कहीं न कहीं गंभीर कमी है।

साथ ही छात्रों को भी यह समझना होगा कि लोकतांत्रिक आंदोलन की ताकत उसकी शांति और नैतिकता में होती है। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, हिंसा करना या कानून हाथ में लेना किसी भी जायज मांग को कमजोर करता है। सरकार और छात्र दोनों को अपनी-अपनी सीमाओं का सम्मान करना होगा।

लेकिन राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी सबसे बड़ी है। सत्ता में रहते हुए जिस लोकतांत्रिक अधिकार की रक्षा की जाती है, विपक्ष में रहते हुए उसी अधिकार की मांग करना राजनीति का सामान्य चरित्र हो सकता है; परंतु लोकतांत्रिक आदर्श इससे आगे है। आदर्श यह है कि अधिकार सत्ता बदलने से न बदलें।

जंतर-मंतर और झारखंड की घटनाओं को इसी कसौटी पर देखने की जरूरत है। सवाल यह नहीं कि राहुल गांधी किसके साथ खड़े हैं, अखिलेश यादव किसके साथ खड़े हैं या केजरीवाल किस आंदोलन में पहुंचे। बड़ा सवाल यह है कि क्या ये नेता हर छात्र के साथ खड़े होंगे, चाहे उसके सामने किसी भी दल की सरकार क्यों न हो?

देश के युवाओं को नेताओं की तस्वीरें नहीं, अपने भविष्य की सुरक्षा चाहिए। उन्हें ऐसी परीक्षा व्यवस्था चाहिए जिसमें प्रश्नपत्र सुरक्षित हो, ऐसी भर्ती चाहिए जिसमें पारदर्शिता हो और ऐसी सरकार चाहिए जिसमें शिकायत करने पर उनकी बात सुनी जाए।

राजनीतिक दल यदि छात्रों के आंदोलनों को केवल चुनावी मुद्दा बनाएंगे तो कुछ समय के लिए उन्हें राजनीतिक लाभ मिल सकता है, लेकिन लंबे समय में युवा राजनीति से और दूर हो सकता है। इसके विपरीत यदि छात्र प्रश्न को दलगत सीमा से ऊपर उठाकर देखा जाएगा तो लोकतंत्र मजबूत होगा।

जंतर-मंतर और झारखंड दोनों हमें यही याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र में सरकारें बदलती रहती हैं, राजनीतिक गठबंधन बदलते रहते हैं, लेकिन युवाओं का भविष्य किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं हो सकता।

छात्रों के सवाल पर राजनीति का चेहरा एक होना चाहिए—चाहे सामने दिल्ली की सत्ता हो या झारखंड की। यही लोकतांत्रिक राजनीति की वास्तविक पहचान और विपक्ष की सबसे बड़ी नैतिक परीक्षा है।

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