"जब सत्ता अपनी शक्ति का प्रदर्शन करती है और प्रकृति अपना स्वरूप बदलती है, तब सबसे अधिक परीक्षा आम इंसान की होती है।" मनुष्य ने विज्ञान की ऊँचाइयों को छू लिया है। उसने समुद्र की गहराइयों को नापा, अंतरिक्ष में अपनी पहचान बनाई और कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक का निर्माण कर लिया। किंतु आज भी दो ऐसी शक्तियाँ हैं जिनके सामने वह स्वयं को अक्सर असहाय महसूस करता है—एक, सरकार की नीतियाँ और दूसरी, करतार अर्थात प्रकृति और नियति का विधान। लोकतंत्र में सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है। जनता यह विश्वास करती है कि उसके प्रतिनिधि उसके जीवन को सरल, सुरक्षित और समृद्ध बनाएँगे। लेकिन जब जनहित की जगह सत्ता का अहंकार, संवाद की जगह आदेश और संवेदनशीलता की जगह कठोरता ले लेती है, तब आम नागरिक के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या उसकी आवाज़ वास्तव में सुनी जा रही है? महँगाई बढ़ती है, नए कर लगते हैं, नियम बदलते हैं, आवश्यक वस्तुएँ महँगी होती जाती हैं। आम आदमी अपने सीमित साधनों के साथ हर नए निर्णय का बोझ अपने कंधों पर ढोता है। उसके पास विरोध करने का अधिकार तो है, लेकिन परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं कि वह अक्सर चुप रह जाने को विवश हो जाता है। लोकतंत्र में जनता मालिक कही जाती है, पर कई बार वही मालिक सबसे अधिक बेबस दिखाई देता है। दूसरी ओर करतार की लीला भी कम विचित्र नहीं है। कभी सूखा, कभी बाढ़, कभी भूकंप, कभी महामारी, तो कभी असमय वर्षा—प्रकृति जब अपना रौद्र रूप दिखाती है, तब मनुष्य का सारा अभिमान क्षण भर में टूट जाता है। किसान पूरे वर्ष मेहनत करता है, लेकिन एक ओलावृष्टि उसकी सारी आशाओं को नष्ट कर देती है। मजदूर दिन-रात परिश्रम करता है, लेकिन एक बीमारी पूरे परिवार की आर्थिक रीढ़ तोड़ देती है। यही वह क्षण होता है जब मनुष्य समझता है कि अंतिम नियंत्रण उसके हाथ में नहीं है। लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि मनुष्य पूरी तरह असहाय है? बिल्कुल नहीं। सरकार की गलत नीतियों को लोकतांत्रिक तरीके से बदला जा सकता है। जागरूक नागरिक, स्वतंत्र पत्रकारिता, निष्पक्ष न्यायपालिका और सजग समाज किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत हैं। सत्ता, संवेदना और नागरिक की पीड़ा इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब-जब सत्ता ने स्वयं को जनता से ऊपर समझा है, तब-तब समाज में असंतोष ने जन्म लिया है। शासन की शक्ति का उद्देश्य भय उत्पन्न करना नहीं, बल्कि विश्वास पैदा करना होता है। यदि सरकार का प्रत्येक निर्णय जनता की सहभागिता, पारदर्शिता और संवेदनशीलता के साथ लिया जाए, तो कठोर निर्णय भी स्वीकार्य हो जाते हैं। लेकिन जब निर्णय संवाद के बिना, जनभावनाओं की उपेक्षा करते हुए अथवा केवल प्रशासनिक शक्ति के बल पर लागू किए जाते हैं, तब लोकतंत्र की आत्मा आहत होती है। आज का आम नागरिक अनेक प्रकार के दबावों से घिरा हुआ है। महँगाई उसकी आय से तेज़ दौड़ रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और रोज़गार की बढ़ती लागत उसके सपनों को छोटा करती जा रही है। मध्यमवर्ग करों के बोझ से दबा है, किसान मौसम और बाज़ार के बीच पिस रहा है, मजदूर अनिश्चित रोजगार की चिंता में जी रहा है और युवा अवसरों की तलाश में भटक रहा है। ऐसे समय में सरकार से केवल योजनाओं की घोषणा नहीं, बल्कि संवेदनशील क्रियान्वयन की अपेक्षा होती है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति जनता का विश्वास है। यह विश्वास टूटने लगे, तो कानून की कठोरता भी व्यवस्था को अधिक दिनों तक संभाल नहीं सकती। जनता को केवल मतदाता समझना लोकतंत्र का अपमान है; उसे सहभागी मानना ही सच्चे लोकतंत्र की पहचान है। सरकारें आती हैं और चली जाती हैं, लेकिन जनता का विश्वास एक बार टूट जाए तो उसे पुनः अर्जित करना अत्यंत कठिन हो जाता है। इसी प्रकार मीडिया, साहित्यकार, बुद्धिजीवी और सामाजिक संगठन भी लोकतंत्र के प्रहरी हैं। यदि वे निष्पक्षता और साहस के साथ जनभावनाओं को अभिव्यक्त करें, तो सत्ता भी आत्ममंथन के लिए विवश होती है। लोकतंत्र में असहमति राष्ट्रविरोध नहीं, बल्कि राष्ट्र को सही दिशा देने वाली चेतावनी होती है। जो शासन आलोचना सुनने का धैर्य रखता है, वही इतिहास में सम्मान पाता है। इतिहास गवाह है कि जब जनता ने शांतिपूर्ण और संगठित होकर अपनी बात रखी, तब बड़े-बड़े निर्णय बदले गए। इसलिए सरकार की मनमानी स्थायी नहीं होती, यदि जनता अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सजग रहे। इसी प्रकार करतार की इच्छा के सामने विनम्रता आवश्यक है, लेकिन निष्क्रियता नहीं। प्रकृति का सम्मान करना, पर्यावरण की रक्षा करना, वैज्ञानिक सोच अपनाना, आपदा प्रबंधन को मजबूत करना और मानवीय सहयोग की भावना विकसित करना—यही वे साधन हैं जिनसे मनुष्य कठिन परिस्थितियों का सामना कर सकता है। जब करतार की अदालत लगती है यदि सरकार की शक्ति सीमित है, तो प्रकृति की शक्ति असीमित है। मनुष्य चाहे जितनी ऊँची इमारतें बना ले, एक प्रचंड भूकंप उन्हें क्षणों में मलबे में बदल सकता है। चाहे जितनी वैज्ञानिक प्रगति कर ले, एक महामारी पूरी दुनिया को घरों में कैद कर सकती है। चाहे जितनी आर्थिक योजनाएँ बना ले, एक भीषण बाढ़ या सूखा वर्षों की मेहनत पर पानी फेर सकता है। यही कारण है कि भारतीय चिंतन ने सदैव प्रकृति को पूजनीय माना। नदियों को माता, पृथ्वी को धरा, वृक्षों को जीवनदाता और पर्वतों को देवस्वरूप मानने का उद्देश्य केवल आस्था नहीं था, बल्कि मनुष्य को यह स्मरण कराना था कि वह प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका एक विनम्र अंश है। आज पर्यावरण का असंतुलन, जलवायु परिवर्तन, घटते वन, प्रदूषित नदियाँ और बढ़ता तापमान केवल प्राकृतिक घटनाएँ नहीं हैं; वे मानव की अविवेकपूर्ण नीतियों का परिणाम भी हैं। इसलिए जब हम करतार की इच्छा की बात करते हैं, तब हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि अनेक संकट हमने स्वयं अपने हाथों से पैदा किए हैं। नीति और नियति का संगम जीवन केवल सरकार से नहीं चलता और केवल भाग्य से भी नहीं चलता। जीवन नीति और नियति, पुरुषार्थ और परमात्मा, अधिकार और उत्तरदायित्व—इन सभी के संतुलन का नाम है। जहाँ सरकार का कर्तव्य न्यायपूर्ण व्यवस्था देना है, वहीं नागरिक का दायित्व कानून का सम्मान करना, करों का ईमानदारी से भुगतान करना, पर्यावरण की रक्षा करना और सामाजिक सद्भाव बनाए रखना है। यदि सरकार संवेदनशील हो, समाज जागरूक हो और नागरिक उत्तरदायी हों, तो अनेक संकट आने से पहले ही टाले जा सकते हैं। लेकिन यदि तीनों अपने-अपने दायित्व भूल जाएँ, तो फिर न केवल शासन डगमगाता है, बल्कि समाज भी दिशाहीन हो जाता है। सच्चाई यही है कि सत्ता की शक्ति भी क्षणभंगुर है और मनुष्य का अभिमान भी। स्थायी केवल वही व्यवस्था होती है, जो न्याय, करुणा, सत्य और जनकल्याण पर आधारित हो। इसलिए सरकार को यह स्मरण रखना चाहिए कि उसका अधिकार संविधान से है, किंतु उसकी वास्तविक शक्ति जनता के विश्वास से आती है; और मनुष्य को यह नहीं भूलना चाहिए कि करतार के दरबार में अंततः धन, पद और प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि कर्म का लेखा-जोखा ही स्वीकार होता है। ईश्वर ने मनुष्य को केवल भाग्य पर निर्भर रहने के लिए नहीं, बल्कि बुद्धि, विवेक और कर्म के लिए भी बनाया है। वास्तविक समस्या तब पैदा होती है जब सरकार अपनी जवाबदेही भूल जाए और समाज अपनी जिम्मेदारी। यदि सत्ता संवेदनशील हो, प्रशासन पारदर्शी हो और नागरिक कर्तव्यनिष्ठ हों, तो अनेक समस्याएँ जन्म लेने से पहले ही समाप्त हो सकती हैं। यह भी सत्य है कि हर कठिनाई के लिए सरकार को दोष देना उचित नहीं और हर सफलता का श्रेय केवल भाग्य को देना भी न्यायसंगत नहीं। जीवन कर्म और परिस्थिति, नीति और नियति, पुरुषार्थ और परमात्मा—इन सबके संतुलन से चलता है। जहाँ मनुष्य का अधिकार समाप्त होता है, वहाँ धैर्य की आवश्यकता होती है; और जहाँ अन्याय दिखाई देता है, वहाँ साहसपूर्वक आवाज़ उठाना भी उतना ही आवश्यक है। आज का समय हमें यही सिखाता है कि सत्ता का अहंकार और मनुष्य का अहंकार—दोनों टिकाऊ नहीं होते। अंततः वही व्यवस्था स्थायी रहती है जो न्याय, करुणा और जनहित पर आधारित हो। सरकार को यह स्मरण रखना चाहिए कि उसकी शक्ति जनता के विश्वास से आती है, और मनुष्य को यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रकृति के नियमों से बड़ा कोई कानून नहीं। अंततः प्रश्न यह नहीं कि सरकार की मनमानी बड़ी है या करतार की। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या मनुष्य अपने विवेक, साहस, नैतिकता और सामूहिक चेतना का उपयोग कर रहा है? क्योंकि जहाँ जागरूक नागरिक खड़े हो जाते हैं, वहाँ सत्ता को भी झुकना पड़ता है; और जहाँ सच्चा कर्म खड़ा हो जाता है, वहाँ कठिन से कठिन नियति भी नई राह दिखा देती है।
Sunday, August 9, 2026
सरकार की मनमानी और करतार की मनमानी पर इंसानी जोर नहीं? - विक्रम दयाल
"जब सत्ता अपनी शक्ति का प्रदर्शन करती है और प्रकृति अपना स्वरूप बदलती है, तब सबसे अधिक परीक्षा आम इंसान की होती है।" मनुष्य ने विज्ञान की ऊँचाइयों को छू लिया है। उसने समुद्र की गहराइयों को नापा, अंतरिक्ष में अपनी पहचान बनाई और कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक का निर्माण कर लिया। किंतु आज भी दो ऐसी शक्तियाँ हैं जिनके सामने वह स्वयं को अक्सर असहाय महसूस करता है—एक, सरकार की नीतियाँ और दूसरी, करतार अर्थात प्रकृति और नियति का विधान। लोकतंत्र में सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है। जनता यह विश्वास करती है कि उसके प्रतिनिधि उसके जीवन को सरल, सुरक्षित और समृद्ध बनाएँगे। लेकिन जब जनहित की जगह सत्ता का अहंकार, संवाद की जगह आदेश और संवेदनशीलता की जगह कठोरता ले लेती है, तब आम नागरिक के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या उसकी आवाज़ वास्तव में सुनी जा रही है? महँगाई बढ़ती है, नए कर लगते हैं, नियम बदलते हैं, आवश्यक वस्तुएँ महँगी होती जाती हैं। आम आदमी अपने सीमित साधनों के साथ हर नए निर्णय का बोझ अपने कंधों पर ढोता है। उसके पास विरोध करने का अधिकार तो है, लेकिन परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं कि वह अक्सर चुप रह जाने को विवश हो जाता है। लोकतंत्र में जनता मालिक कही जाती है, पर कई बार वही मालिक सबसे अधिक बेबस दिखाई देता है। दूसरी ओर करतार की लीला भी कम विचित्र नहीं है। कभी सूखा, कभी बाढ़, कभी भूकंप, कभी महामारी, तो कभी असमय वर्षा—प्रकृति जब अपना रौद्र रूप दिखाती है, तब मनुष्य का सारा अभिमान क्षण भर में टूट जाता है। किसान पूरे वर्ष मेहनत करता है, लेकिन एक ओलावृष्टि उसकी सारी आशाओं को नष्ट कर देती है। मजदूर दिन-रात परिश्रम करता है, लेकिन एक बीमारी पूरे परिवार की आर्थिक रीढ़ तोड़ देती है। यही वह क्षण होता है जब मनुष्य समझता है कि अंतिम नियंत्रण उसके हाथ में नहीं है। लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि मनुष्य पूरी तरह असहाय है? बिल्कुल नहीं। सरकार की गलत नीतियों को लोकतांत्रिक तरीके से बदला जा सकता है। जागरूक नागरिक, स्वतंत्र पत्रकारिता, निष्पक्ष न्यायपालिका और सजग समाज किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत हैं। सत्ता, संवेदना और नागरिक की पीड़ा इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब-जब सत्ता ने स्वयं को जनता से ऊपर समझा है, तब-तब समाज में असंतोष ने जन्म लिया है। शासन की शक्ति का उद्देश्य भय उत्पन्न करना नहीं, बल्कि विश्वास पैदा करना होता है। यदि सरकार का प्रत्येक निर्णय जनता की सहभागिता, पारदर्शिता और संवेदनशीलता के साथ लिया जाए, तो कठोर निर्णय भी स्वीकार्य हो जाते हैं। लेकिन जब निर्णय संवाद के बिना, जनभावनाओं की उपेक्षा करते हुए अथवा केवल प्रशासनिक शक्ति के बल पर लागू किए जाते हैं, तब लोकतंत्र की आत्मा आहत होती है। आज का आम नागरिक अनेक प्रकार के दबावों से घिरा हुआ है। महँगाई उसकी आय से तेज़ दौड़ रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और रोज़गार की बढ़ती लागत उसके सपनों को छोटा करती जा रही है। मध्यमवर्ग करों के बोझ से दबा है, किसान मौसम और बाज़ार के बीच पिस रहा है, मजदूर अनिश्चित रोजगार की चिंता में जी रहा है और युवा अवसरों की तलाश में भटक रहा है। ऐसे समय में सरकार से केवल योजनाओं की घोषणा नहीं, बल्कि संवेदनशील क्रियान्वयन की अपेक्षा होती है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति जनता का विश्वास है। यह विश्वास टूटने लगे, तो कानून की कठोरता भी व्यवस्था को अधिक दिनों तक संभाल नहीं सकती। जनता को केवल मतदाता समझना लोकतंत्र का अपमान है; उसे सहभागी मानना ही सच्चे लोकतंत्र की पहचान है। सरकारें आती हैं और चली जाती हैं, लेकिन जनता का विश्वास एक बार टूट जाए तो उसे पुनः अर्जित करना अत्यंत कठिन हो जाता है। इसी प्रकार मीडिया, साहित्यकार, बुद्धिजीवी और सामाजिक संगठन भी लोकतंत्र के प्रहरी हैं। यदि वे निष्पक्षता और साहस के साथ जनभावनाओं को अभिव्यक्त करें, तो सत्ता भी आत्ममंथन के लिए विवश होती है। लोकतंत्र में असहमति राष्ट्रविरोध नहीं, बल्कि राष्ट्र को सही दिशा देने वाली चेतावनी होती है। जो शासन आलोचना सुनने का धैर्य रखता है, वही इतिहास में सम्मान पाता है। इतिहास गवाह है कि जब जनता ने शांतिपूर्ण और संगठित होकर अपनी बात रखी, तब बड़े-बड़े निर्णय बदले गए। इसलिए सरकार की मनमानी स्थायी नहीं होती, यदि जनता अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सजग रहे। इसी प्रकार करतार की इच्छा के सामने विनम्रता आवश्यक है, लेकिन निष्क्रियता नहीं। प्रकृति का सम्मान करना, पर्यावरण की रक्षा करना, वैज्ञानिक सोच अपनाना, आपदा प्रबंधन को मजबूत करना और मानवीय सहयोग की भावना विकसित करना—यही वे साधन हैं जिनसे मनुष्य कठिन परिस्थितियों का सामना कर सकता है। जब करतार की अदालत लगती है यदि सरकार की शक्ति सीमित है, तो प्रकृति की शक्ति असीमित है। मनुष्य चाहे जितनी ऊँची इमारतें बना ले, एक प्रचंड भूकंप उन्हें क्षणों में मलबे में बदल सकता है। चाहे जितनी वैज्ञानिक प्रगति कर ले, एक महामारी पूरी दुनिया को घरों में कैद कर सकती है। चाहे जितनी आर्थिक योजनाएँ बना ले, एक भीषण बाढ़ या सूखा वर्षों की मेहनत पर पानी फेर सकता है। यही कारण है कि भारतीय चिंतन ने सदैव प्रकृति को पूजनीय माना। नदियों को माता, पृथ्वी को धरा, वृक्षों को जीवनदाता और पर्वतों को देवस्वरूप मानने का उद्देश्य केवल आस्था नहीं था, बल्कि मनुष्य को यह स्मरण कराना था कि वह प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका एक विनम्र अंश है। आज पर्यावरण का असंतुलन, जलवायु परिवर्तन, घटते वन, प्रदूषित नदियाँ और बढ़ता तापमान केवल प्राकृतिक घटनाएँ नहीं हैं; वे मानव की अविवेकपूर्ण नीतियों का परिणाम भी हैं। इसलिए जब हम करतार की इच्छा की बात करते हैं, तब हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि अनेक संकट हमने स्वयं अपने हाथों से पैदा किए हैं। नीति और नियति का संगम जीवन केवल सरकार से नहीं चलता और केवल भाग्य से भी नहीं चलता। जीवन नीति और नियति, पुरुषार्थ और परमात्मा, अधिकार और उत्तरदायित्व—इन सभी के संतुलन का नाम है। जहाँ सरकार का कर्तव्य न्यायपूर्ण व्यवस्था देना है, वहीं नागरिक का दायित्व कानून का सम्मान करना, करों का ईमानदारी से भुगतान करना, पर्यावरण की रक्षा करना और सामाजिक सद्भाव बनाए रखना है। यदि सरकार संवेदनशील हो, समाज जागरूक हो और नागरिक उत्तरदायी हों, तो अनेक संकट आने से पहले ही टाले जा सकते हैं। लेकिन यदि तीनों अपने-अपने दायित्व भूल जाएँ, तो फिर न केवल शासन डगमगाता है, बल्कि समाज भी दिशाहीन हो जाता है। सच्चाई यही है कि सत्ता की शक्ति भी क्षणभंगुर है और मनुष्य का अभिमान भी। स्थायी केवल वही व्यवस्था होती है, जो न्याय, करुणा, सत्य और जनकल्याण पर आधारित हो। इसलिए सरकार को यह स्मरण रखना चाहिए कि उसका अधिकार संविधान से है, किंतु उसकी वास्तविक शक्ति जनता के विश्वास से आती है; और मनुष्य को यह नहीं भूलना चाहिए कि करतार के दरबार में अंततः धन, पद और प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि कर्म का लेखा-जोखा ही स्वीकार होता है। ईश्वर ने मनुष्य को केवल भाग्य पर निर्भर रहने के लिए नहीं, बल्कि बुद्धि, विवेक और कर्म के लिए भी बनाया है। वास्तविक समस्या तब पैदा होती है जब सरकार अपनी जवाबदेही भूल जाए और समाज अपनी जिम्मेदारी। यदि सत्ता संवेदनशील हो, प्रशासन पारदर्शी हो और नागरिक कर्तव्यनिष्ठ हों, तो अनेक समस्याएँ जन्म लेने से पहले ही समाप्त हो सकती हैं। यह भी सत्य है कि हर कठिनाई के लिए सरकार को दोष देना उचित नहीं और हर सफलता का श्रेय केवल भाग्य को देना भी न्यायसंगत नहीं। जीवन कर्म और परिस्थिति, नीति और नियति, पुरुषार्थ और परमात्मा—इन सबके संतुलन से चलता है। जहाँ मनुष्य का अधिकार समाप्त होता है, वहाँ धैर्य की आवश्यकता होती है; और जहाँ अन्याय दिखाई देता है, वहाँ साहसपूर्वक आवाज़ उठाना भी उतना ही आवश्यक है। आज का समय हमें यही सिखाता है कि सत्ता का अहंकार और मनुष्य का अहंकार—दोनों टिकाऊ नहीं होते। अंततः वही व्यवस्था स्थायी रहती है जो न्याय, करुणा और जनहित पर आधारित हो। सरकार को यह स्मरण रखना चाहिए कि उसकी शक्ति जनता के विश्वास से आती है, और मनुष्य को यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रकृति के नियमों से बड़ा कोई कानून नहीं। अंततः प्रश्न यह नहीं कि सरकार की मनमानी बड़ी है या करतार की। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या मनुष्य अपने विवेक, साहस, नैतिकता और सामूहिक चेतना का उपयोग कर रहा है? क्योंकि जहाँ जागरूक नागरिक खड़े हो जाते हैं, वहाँ सत्ता को भी झुकना पड़ता है; और जहाँ सच्चा कर्म खड़ा हो जाता है, वहाँ कठिन से कठिन नियति भी नई राह दिखा देती है।
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