गोरखपुर। राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ उत्तर प्रदेश (प्राथमिक संवर्ग) गोरखपुर ने वर्ष 2010 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) की अनिवार्यता से स्थायी रूप से मुक्त किए जाने की मांग उठाई है। महासंघ के पदाधिकारियों ने प्रधानमंत्री, केंद्रीय शिक्षा मंत्री तथा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के नाम संबोधित ज्ञापन जिलाधिकारी के माध्यम से प्रेषित किया।
ज्ञापन में कहा गया है कि 23 अगस्त 2010 को एनसीटीई द्वारा टीईटी को न्यूनतम शैक्षणिक अर्हता घोषित किए जाने से पहले देशभर में लाखों शिक्षकों की नियुक्तियां तत्कालीन नियमों के अनुरूप विधिवत हुई थीं। उत्तर प्रदेश में भी 27 जुलाई 2011 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों की सेवाएं उस समय लागू नियमों के तहत वैध हैं। ऐसे में बाद में लागू किए गए पात्रता मानकों को पूर्व प्रभाव से लागू करना प्राकृतिक न्याय, समानता तथा विधिक निश्चितता के सिद्धांतों के विपरीत है।
महासंघ ने कहा कि हाल ही में आए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद हजारों शिक्षकों में भविष्य को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। न्यायालय ने कानून की व्याख्या की है, जबकि इस विषय पर स्थायी समाधान निकालने का अधिकार संसद और सरकार के पास है। इसलिए केंद्र सरकार पुराने शिक्षकों के हितों की रक्षा के लिए विशेष विधायी अथवा नीतिगत प्रावधान कर उन्हें टीईटी की अनिवार्यता से स्थायी छूट प्रदान करे।
संगठन ने मांग की कि वर्ष 2010 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों की सेवा, वरिष्ठता, पदोन्नति, वेतनमान एवं अन्य सभी सेवा लाभों का पूर्ण संरक्षण सुनिश्चित किया जाए। साथ ही सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी कर शिक्षकों में व्याप्त असमंजस को समाप्त किया जाए। महासंघ ने विश्वास जताया कि प्रधानमंत्री, केंद्रीय शिक्षा मंत्री और उत्तर प्रदेश सरकार इस संवेदनशील विषय पर सकारात्मक निर्णय लेकर लाखों शिक्षकों को राहत प्रदान करेंगे।

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