बस्ती। प्रो. डॉ. नवीन सिंह, राष्ट्रीय महासचिव, विश्व संवाद परिषद के योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा प्रकोष्ठ, भारत ने कहा कि एक्यूप्रेशर और रंग चिकित्सा का समन्वय शरीर की सूक्ष्म ऊर्जा को संतुलित कर स्वास्थ्य संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
उन्होंने बताया कि शरीर के प्रत्येक एक्यूप्रेशर बिंदु का संबंध किसी न किसी अंग, ग्रंथि या तंत्र से होता है। इन बिंदुओं पर नियंत्रित रूप से उपयुक्त रंगों का प्रयोग शरीर की जैव-ऊर्जा प्रणाली को प्रभावित कर सकता है और अवरोध की स्थिति में ऊर्जा प्रवाह को संतुलित करने में सहायक बन सकता है।
प्रो. डॉ. सिंह के अनुसार, रंग केवल देखने का माध्यम नहीं, बल्कि ऊर्जा तरंगें हैं, जिनकी अपनी विशिष्ट कंपन शक्ति होती है। सही रंग का चयन कर उसे संबंधित बिंदु पर प्रयोग करने से सकारात्मक प्रभाव प्राप्त किए जा सकते हैं। उदाहरण के तौर पर—
लाल रंग रक्तसंचार और ऊर्जा को सक्रिय करने में सहायक माना जाता है।
नीला रंग मानसिक शांति और शीतलता प्रदान कर तनाव कम करने में उपयोगी हो सकता है।
हरा रंग संतुलन, सामंजस्य और पुनरुत्थान का प्रतीक है।
पीला रंग पाचन शक्ति और मानसिक स्पष्टता को प्रोत्साहित करता है।
उन्होंने कहा कि कुछ प्राकृतिक चिकित्सक रंगीन प्रकाश, रंगीन पट्टियों अथवा हर्बल रंगों का उपयोग एक्यूप्रेशर बिंदुओं पर सहायक चिकित्सा के रूप में करते हैं। इसका उद्देश्य शरीर की स्व-चिकित्सा क्षमता (Self-Healing Mechanism) को जागृत करना है।
हालाँकि उन्होंने स्पष्ट किया कि गंभीर या असाध्य रोगों में किसी भी वैकल्पिक पद्धति को मुख्य चिकित्सा का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। रंग चिकित्सा और एक्यूप्रेशर को पूरक उपचार के रूप में अपनाते समय विशेषज्ञ चिकित्सकीय परामर्श आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संतुलित प्रयोग और प्रशिक्षित मार्गदर्शन के साथ इन दोनों पद्धतियों का समन्वय भविष्य में स्वास्थ्य जागरूकता और प्राकृतिक उपचार के क्षेत्र में सकारात्मक परिणाम दे सकता है।

No comments:
Post a Comment