लखनऊ। डॉ. शकुन्तला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन ने समकालीन समाज, साहित्य और दिव्यांगता सरोकारों पर गंभीर और सार्थक विमर्श का मंच प्रदान किया। हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग की ओर से आयोजित इस सम्मेलन में देश-विदेश के विद्वानों, शोधार्थियों और साहित्यकारों की सक्रिय भागीदारी रही।
मुख्य अतिथि प्रो. हिमांशु शेखर झा ने कहा कि दिव्यांगजन समाज की मुख्यधारा के अभिन्न अंग हैं और उन्हें समान अवसर देना समाज की जिम्मेदारी है। उन्होंने समावेशी सोच और व्यवहार को सामाजिक विकास की आधारशिला बताया।
अध्यक्षता कर रहीं पद्मश्री विद्या विन्दु सिंह ने महिला सशक्तिकरण पर जोर देते हुए कहा कि साहित्य समाज में सकारात्मक बदलाव का प्रभावी माध्यम है। उन्होंने लैंगिक समानता और संवेदनशीलता को समय की जरूरत बताया।
विशिष्ट अतिथियों में डॉ. अमित कुमार राय, प्रो. कालीचरण स्नेही और प्रो. राम पाल गंगवार ने क्रमशः दिव्यांगता, सामाजिक विषमता और अस्मिता जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर अपने विचार रखे। उन्होंने साहित्य को समाज के वंचित और उपेक्षित वर्गों की आवाज बताया।
सम्मेलन की खास बात यह रही कि इसमें अमेरिका, नॉर्वे और थाइलैंड सहित विभिन्न देशों के विद्वानों ने भाग लेकर अपने शोध और अनुभव साझा किए। शोधार्थियों के लिए आयोजित अकादमिक सत्रों में कई महत्वपूर्ण शोध पत्र प्रस्तुत किए गए, जिससे ज्ञानवर्धक वातावरण बना रहा।
- कवि सम्मेलन ने जीता दिल
समापन सत्र में आयोजित कवि सम्मेलन कार्यक्रम का आकर्षण केंद्र रहा। कवि पंकज प्रसून ने महंगाई पर व्यंग्य करते हुए श्रोताओं को हंसी से लोटपोट कर दिया। शिखा श्रीवास्तव, अभिश्रेष्ठ तिवारी, मानक मुकेश और अशोक झंझटी ने अपनी रचनाओं से प्रेम, समाज और राजनीति पर प्रभावशाली प्रस्तुति दी।
अशोक झंझटी की व्यंग्यपूर्ण पंक्तियों— “अजब हालात बनते जा रहे हैं अब सियासत में…” —ने खूब तालियां बटोरीं और कार्यक्रम को यादगार बना दिया।
कुल मिलाकर, यह राष्ट्रीय सम्मेलन न केवल अकादमिक दृष्टि से समृद्ध रहा, बल्कि सामाजिक संवेदना और रचनात्मक अभिव्यक्ति का भी सशक्त उदाहरण बनकर उभरा।

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