योगमाया किसे कहते हैं :-
भगवान की अचिन्त्य शक्ति का नाम ‘योगमाया’ या ‘महामाया’ है।‘अचिन्त्य’ का अर्थ होता है अचिंतनीय । भगवान की लीला के लिए पहले से ही मंच, पात्र आदि तैयार कर देना, संसारी जीवों के सामने भगवान की भगवत्ता को छुपा कर रखना आदि काम योगमाया ही करती हैं। जब भी हम भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं को पढ़ते हैं तो अक्सर योगमाया का नाम आता है ।
भगवान की ऐश्वर्य-शक्ति है योगमाया:-
योगमाया भगवान की अत्यन्त प्रभावशाली वैष्णवी ऐश्वर्य-शक्ति है जिसके वश में सम्पूर्ण जगत रहता है । उसी योगमाया को अपने वश में करके भगवान लीला के लिए दिव्य गुणों के साथ मनुष्य जन्म धारण करते हैं और साधारण मनुष्य से ही प्रतीत होते हैं । इसी मायाशक्ति का नाम योगमाया है ।
असली रूप छिपाकर लीला करते हैं लीलाधारी :-
भगवान जब मनुष्य के रूप में अवतरित होते हैं तब जैसे बहुरूपिया किसी दूसरे स्वांग में लोगों के सामने आता है, उस समय अपना असली रूप छिपा लेता है; वैसे ही भगवान अपनी योगमाया को चारों ओर फैलाकर स्वयं उसमें छिपे रहते हैं । साधारण मनुष्यों की दृष्टि उस माया के परदे से पार नहीं जा सकती; इसलिए अधिकांश लोग उन्हें अपने जैसा ही साधारण मनुष्य मानते हैं । गीता (७।२५) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- ‘मैं सबके सामने प्रकाशित क्यों नहीं होता, लोग मुझे पहचानते क्यों नहीं ? क्योंकि मैं योगमाया से अपने को ढका रखता हूँ ।’
भगवत लीला का आयोजन योगमाया द्वारा ही होता है :-
भगवान की लीला का आयोजन योगमाया ही करती है । भगवान की लीला के लिए पहले से ही मंच, पात्र आदि तैयार कर देना, संसारी जीवों के सामने भगवान की भगवत्ता को छुपा कर रखना आदि काम योगमाया ही करती हैं । यह योगमाया शक्ति वही है, जिसे परमब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण ने व्रज में स्वयं अवतरित होने से पूर्व ही अपनी लीला के सम्पादन के लिए भूतल पर भेज दिया था । गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण ने योगमाया को आदेश दिया था -
‘गच्छ देवि व्रजं भद्रे गोपगोभिरलंकृतम् ।’
‘हे देवि ! आप ग्वालों और गौओं से सुशोभित व्रज में जाओ और मेरा कार्य-संपादन करो।’
-(श्रीमद्भागवत १०।२।७) ।
तब योगमाया ने पूछा था-‘भगवन् ! यह व्रज कहां है और वहां क्या करना है ?’
भगवान ने कहा था- ‘देवि ! व्रज-भूमि मेरी अपनी निज भूमि है । मैं अजन्मा होते हुए भी व्रज में जन्म लेता हूँ । नित्य तृप्त होते हुए भी व्रजांगनाओं की छछिया भर छाछ पीने के लिए उनके इशारों पर नाचता हूँ । व्रजवासियों की रूखी-सूखी, ‘अरे’, ‘ओरे’ की बोली (भाषा) मुझे वेद की स्तुति से भी अधिक प्रिय है । मैं परमेश्वर, सर्वेश्वर हूँ; परन्तु वात्सल्यमयी मां यशोदा मुझे प्रेम की डोरी से लपेट कर बांध देती हैं । उसी व्रज के व्रजराज श्रीनन्दबाबा के घर में उनकी धर्मपत्नी यशोदा के गर्भ से तुम्हें कन्या के रूप में प्रकट होना हैं और मैं अपने समस्त ज्ञान, बल, आदि अंशों के साथ देवकी का पुत्र बनूंगा ।’
विविध नामों से पूज्य जाने का बरदान-
भगवान की आज्ञा पाते ही भगवती योगमाया जब व्रजमण्डल में पधारीं, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें यह वरदान दिया - ‘सभी लोग तुम्हें देवी मानकर तुम्हारे नाम और स्थान पर मन्दिर बनाएंगे । व्रज में दुर्गा, भद्रकाली, विजया, वैष्णवी, कुमुदा, चण्डिका, कृष्णा, माधवी, कन्यका, माया, नारायणी, ईशानी, शारदा, अम्बिका आदि नामों से तुम विख्यात होगी । तुम लोगों को मुंहमांगे वरदान देने में समर्थ होगी । तुम्हें अपनी समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाली जानकर भक्त घनघोर शब्द करने वाले घण्टों, लम्बी- लम्बी- लाल- पीली- केसरिया ध्वजाओं से एवं गन्ध, अक्षत, फल, फूल, धूप-दीप, मिष्ठान्न, श्रीफल नारियल, भेंट आदि विभिन्न सामग्रियों से तुम्हारी पूजा करेंगे क्योंकि आप ही सर्वकाम वरप्रदायिनी हैं।’ इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लीलाओं के सृजन और विस्तार के लिए योगमाया को रंगमंच तैयार कराने का आदेश दिया था।
-(श्रीमद्भागवत १०।२।१०-१२)
श्रीकृष्ण की बहन हैं योगमाया :-
द्वापरयुग से जुड़ी यह घटना है। भगवान विष्णु की माया कन्या अष्टभुजी रूप में अपने इष्टदेव के कार्य सिद्धि के लिए अवतरित होती है। अष्टभुजी मां भगवान कृष्ण की बहन के रूप में भी जानी जाती है। पापी कंस ने अपनी मृत्यु के डर से अपनी बहन देवकी को पति सहित कारागार में कैद कर लिया था। अपने विनाश के भय से वह देवकी की कोख से जन्म लेने वाले हर बच्चे को वध करता गया। कंस का कारागार, भाद्रप्रद कृष्ण अष्टमी की अर्धनिशा में जब श्रीकृष्णचन्द्र का प्राकट्य हुआ, तब वह चतुर्भुज रूप माता देवकी की प्रार्थना करने पर देखते- ही- देखते शिशु बन गया, बंदीगृह की बेड़ियां ताले स्वत: खुल गए । इसी बीच भगवान श्री कृष्ण की प्रेरणा से ही उनके पालक मां यशोदा के कोख से ज्ञान की देवी अष्टभुजी अवतरित होती है। वसुदेवजी अपने उस हृदयघन को गोकुल में जाकर नन्दभवन में रख आए और यशोदाजी को जन्मी योगमाया को ले आए
जब कंस उस कन्या का वध करने के लिए शिला पर पटक रहा था, तब वे योगमाया कंस के हाथ से छूट कर गगन में अष्टभुजा हो गईं । उनके हाथ में धनुष, त्रिशूल,बाण, ढाल, तलवार, शंख, चक्र और गदा- ये आठ आयुध थे ।
उस समय योगमाया ने कंस से कहा-‘तेरे पूर्वजन्म का शत्रु तुझे मारने के लिए किसी स्थान पर पैदा हो चुका है ।’ योगमाया कंस के हाथों से छूट कर विंध्याचल पहाड़ी पर विराजमान होती है और तब से मां विंध्य वासिनी अपने भक्तों को अभय प्रदान कर रही हैं।
शक्ति-सिद्ध - मणिपीठ है विंध्याचल
मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश- विंध्याचल धाम में सती का कोई अंग नहीं गिरा था। यह मंदिर एक शक्तिपीठ है। पुराणों में विन्ध्याचल को शक्तिपीठ, सिद्धपीठ व मणिपीठ कहा गया है। यह एक पूर्ण पीठ माना जाता है, जहां माता स्वयं विराजमान हैं। योगमाया को विंध्यवासिनी, महामाया और एकानंशा के नाम से भी जाना जाता है, यह एक हिंदू देवी हैं। वैष्णव परंपरा में, उन्हें नारायणी की संज्ञा दी गई है, और वह विष्णु की माया की शक्तियों के अवतार के रूप में कार्य करती हैं। भागवत पुराण में देवी को देवी दुर्गा का परोपकारी पहलू माना गया है। शाक्त उन्हें आदि शक्ति का रूप मानते हैं। हिंदू साहित्य में उनका जन्म यादव परिवार में नंद और माता यशोदा की बेटी के रूप में हुआ है। मान्यता है कि यहां देवी दुर्गा ने खुद को स्थापित किया था।विन्ध्य पर्वत माला की आंचलों में स्थित यह विंध्याचल शक्तिपीठ अनादिकाल से ही शक्ति की लीला भूमि रही है। शास़्त्रों के अनुसार देवी सती के पृष्ठभाग का विपार्थ हुआ था। कहा जाता है कि मां देवी पार्वती ने यहीं पर तप कर अर्पणा नाम पाया व भगवान शिव को प्राप्त किया। इस क्षेत्र को साधना व तपस्या हेतु जागृत प्रदेश माना जाता है।
नारायण को सुदर्शन चक्र यहीं पर प्राप्त हुआ था:-
विन्ध्य क्षेत्र में ही नारायण ने महादेव की आराधना कर चक्र सुदर्शन प्राप्त किया था। इसके पीछे कथा यह है कि भगवान विष्णु की आराधना से जब महादेव प्रसंन हुए तो बदले में उनका नेत्र मांगा और जैसे ही विष्णु ने चाकू से अपनी आंख निकालने की कोशिश की, महादेव नेे रोक लिया और विश्व कल्याण व सुरक्षा के लिए सुदर्शन चक्र भेंट किया। इसके बाद यहीं पर मां लक्ष्मी ने शिवशंकर की तपस्या की तथा महादेव से स्त्री यौवन व सदैव युवती रहने का वरदान प्राप्त किया। कहा जाता है कि देवासुर संग्राम के वक्त जब दानव देवों पर भारी पड़ने लगे तब स्वयं देवों के देव महादेव, ब्रह्मा एवं विष्णु ने मां विन्ध्य वासिनी के गर्भगृह में बने कुंड में हजारों साल तक तपस्या कर मां के आर्शीवाद से दानवों को परास्त कर सके थे।
विंध्यवासिनी जागृत शक्तिपीठ है :-
मां विंध्यवासिनी ऐसी जागृत शक्तिपीठ है, जिसका अस्तित्व सृष्टि आरंभ होने से पूर्व और प्रलय के बाद भी रहेगा। त्रिकोण यंत्र पर स्थित विंध्याचल निवासिनी देवी लोकहिताय, महालक्ष्मी, महाकाली तथा महासरस्वती का रूप धारण करती हैं। विंध्यवासिनी देवी विंध्य पर्वत पर स्थित मधु तथा कैटभ नामक असुरों का नाश करने वाली भगवती यंत्र की अधिष्ठात्री देवी हैं। कहा जाता है कि इस स्थान पर जो तप करता है, उसे अवश्य सिद्वि प्राप्त होती है। शायद यही वजह है जब देवासुर संग्राम के वक्त देवों पर दानव भारी पड़ने लगे तो देवों के देव महादेव, ब्रह्मा व विष्णु ने भी इस धाम में तप की और मां के आर्शीवाद से विजय हासिल की। विविध संप्रदाय के उपासकों को मनवांछित फल देने वाली मां विंध्यवासिनी देवी अपने अलौकिक प्रकाश के साथ यहां नित्य विराजमान रहती हैं। वे वहां से अन्तर्ध्यान हो गईं हैं। वे ही परमात्मा श्रीकृष्ण की पराशक्ति योगमाया पवित्र भारतभूमि के चारों ओर अनेक नाम व रूपों से निवास कर रहीं हैं । जैसे -
उत्तर में - जम्मू-कश्मीर में वैष्णवी
पूर्व में -असम में कामाख्यादेवी
दक्षिण में - तमिलनाडु में कन्यका कुमारी
पश्चिम में- गुजरात में अम्बिका माता।
ये प्रसिद्ध सिद्धपीठ आज भी भारतवर्ष की चारों दिशाओं में विद्यमान हैं । श्रीमद
भागवत के दशम् स्कन्ध में ‘श्रीरास- पंचाध्यायी’ के आरम्भ में ही भगवान श्रीकृष्ण ने योगमाया शक्ति की उपासना की है-
भगवानपि ता रात्री:शरदोत्फुल्लमल्लिका:।
वीक्ष्य रन्तुं मनश्चके योगमायामुपाश्रित: ।
वैसे तो भगवान सर्वसमर्थ हैं, परन्तु जब श्रीकृष्ण ने शरद् पूर्णिमा की धवल रात्रि में व्रजगोपियों के संग रास लीला की, तब वे रासेश्वरी श्रीराधारानी रूप योगमाया के पास गए; क्योंकि बिना योगमाया के रास नही हो सकता था । रस के समूह को ‘रास’ कहते हैं । ‘रस’ स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हैं; किन्तु रस को अनेक बनाकर ही रास हो सकता है । योगमाया ने इस रात्रि को छ: माह के बराबर कर दिया था; इसीलिए यह रासलीला लौकिक सृष्टि के स्तर से ऊपर थी।जीव और ईश्वर का मिलन ही रास लीला है ।
योगमाया के अनेक अर्थ और रूप :-
विद्वानों ने योगमाया के अनेक अर्थ किए हैं । जैसे-भगवान से बिछड़े हुए संसारी जीवों का भगवान के साथ योग कराने, मिलाने के लिए भगवान के हृदय में जो कृपा है, वह योगमाया है । योगमाया ही मुरली नाद है । योगमाया श्रीराधारानी हैं ।
व्रज में योगमाया ‘मां कात्यायनी’ के नाम से जानी जाती हैं । व्रज में श्रीधामवृन्दावन में श्रीराधा बाग स्थित केशवाश्रम में विराजमान मां कात्यायनी श्रीकृष्ण की कृपाशक्ति का ही नाम है । मनुष्य को यदि सौभाग्य, शोभा, सम्पत्ति की कामना हो तो उसे महामाया मां कात्यायनी का दर्शन, सेवा, पूजन, प्रणाम और भजन करना चाहिए । योगमाया मां कात्यायनी ने सभी के मनोरथ पूर्ण किए हैं । व्रज गोपियों ने मां कात्यायनी से अपना अभीष्ट वर मांगा-
कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि ।
नन्दगोपसुतं देवी पतिं मे कुरु ते नम: ।। -(श्रीमद्भागवत, १०-२२-४)
हे कात्यायनि ! हे महामाये ! हे महायोगिनि ! हे अधीश्वरि ! हे देवि ! नन्दगोपकुमार श्रीकृष्णचन्द्र को हमारा पति बना दीजिए हम श्रद्धापूर्वक आपको प्रणाम करती हैं।
महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्यजी ने अपनी ‘सुबोधिनी’ टीका में लिखा है—‘मां कात्यायनी ! आप बड़े भाग वाली हैं, तभी तो भगवान ने आपको व्रज में यशोदाजी के गर्भ में प्रकट होने की आज्ञा दी है । आपको भगवान ने अपनी बहिन बना लिया और वह भी बड़ी बहिन; इसलिए आप महाभागा हैं । आप ही सुयोग बनाने वाली हैं । देवकी के सप्तम गर्भ का आकर्षण करके रोहिणी जी के गर्भ से संकर्षण रूप से प्रकट करने वाली योगिनी आप ही हैं । आप भगवान की अंतरंगा शक्ति है, भगवान पर अधिकार करके आप ही रखती हैं, क्योंकि आप अधीश्वरी हैं ।अत: नंदगोपकुमार श्रीकृष्ण को हमारा पति बना दीजिए। कृष्णरूप फल प्रदान करने वाली देवी, हम आपको प्रणाम करती हैं ।’दु:ख संतप्त मनुष्य का श्रीकृष्ण से अटूट सम्बन्ध कराने में जिनकी कृपा-शक्ति परम आवश्यक है, उन्हीं मां कात्यायनी का आश्रय लेकर मनुष्य परमात्मा श्रीकृष्ण की अविचल भक्ति प्राप्त कर सकता है और जन्म- जन्मान्तरों के कर्म-बंधनों को काटकर भगवान श्रीकृष्ण को प्राप्त कर सकता है ।
योगमाया ने दी थी कंस को चेतावनी :-
माँ अष्टभुजी महामाया ने कंस को चेतावनी दी थी- “तुम्हारे जैसा दुष्ट मेरा क्या बिगाड़ लेगा?” तुम्हें मारने वाला पहले ही पैदा हो चुका है।” ऐसा कहकर देवी आकाश की ओर उड़ गईं और विंध्य पर्वत पर उतर गईं, जिसका वर्णन मार्कंडेय ऋषि ने दुर्गा सप्तशती में इस प्रकार किया है ।
"नंद गोप गृहे जाता यशोदा गर्भ संभव, ततस्तो नष्टयिष्यामि विंध्याचल निवासिनी।
विन्ध्य क्षेत्रे परम् दिव्यम् नास्ति ब्रह्मांड गोलके ।”
अर्थात विन्ध्याचल जैसा स्थान, जहां मां भगवती के तीनों रुप मां लक्ष्मी, मां काली मां सरस्वती एक ऐसे त्रिकोण पर विराजमान है, जो पूरे ब्रहमांड में कहीं नहीं है।
विंध्य वासनी मां के मंदिर की अवस्थिति :-
प्राकृतिक गोद में बसा हुआ मां विंध्य वासनी मंदिर बड़ा दिव्य और रमणीक है। यह स्थान अपने शांत और सुंदर दृश्यों के कारण भक्तों के साथ-साथ पर्यटकों के बीच भी लोकप्रिय है। तभी से मां विंध्य वासिनी विंध्य पर्वत पर निवास कर अपने भक्तों को आशीर्वाद देती आ रही हैं। नवरात्रि के दौरान विंध्यधाम में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है। अष्टभुजा देवी मंदिर में अष्टभुजा देवी की पूजा और दर्शन के बिना त्रिकोण परिक्रमा अधूरी है। विंध्य क्षेत्र के एक तरफ आदि शक्ति माता विंध्यवासिनी हैं, जबकि दूसरी तरफ महाकाली और महासरस्वती (अष्टभुजा देवी) हैं, जो इस क्षेत्र को एक पवित्र तीर्थ स्थल बनाती हैं।
पूरे देश में श्रीकृष्णजन्माष्टमी की धूम:-
देशभर में कृष्ण जन्माष्टमी धूमधाम से मनाई जाती है। देश के विभिन्न मंदिरों में खास तैयारियां की जाती हैं और सुबह से ही श्रद्धालुजन मंदिर में कान्हा के दर्शन करने के लिए आते रहते हैं। भगवान कृष्ण के जन्मस्थली मथुरा और वृंदावन में जन्माष्टमी के भव्य तैयारियां होती हैं और भक्तों के लिए खास व्यवस्था की जाती है। लोग अपने घरों को सजाते हैं, दही-हांडी प्रतियोगिता आयोजित करते हैं और भगवान कृष्ण के बाल रूप की पूजा करते हैं। यह त्योहार प्रेम, करुणा और सच्चाई के प्रतीक भगवान कृष्ण की याद मेंमनाया जाता है। कृष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर भगवान श्री कृष्ण को छप्पन भोग लगाया जाता है। साथ ही विशेष पोशाकपहनाकर उनका श्रृंगार भी किया जाता है। इस दिन भगवान कृष्ण की पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन व्रत रखने, दान करने और भगवान कृष्ण के मंदिरों में जाने का विशेष महत्व होता है।
भगवान कृष्ण की सहचरी योगमाया देवी के जन्मोत्सव की उपेक्षा क्यों ?
श्री कृष्णा की सहचरी और उनके लक्ष्य की सहायिका के जन्म के क्षण को देश वह सम्मान नहीं दे रहा है जो मिलना चाहिए।"यस्य नार्यस्तु पुजंते रमंते तत्र देवता" वाले देश में इस देवी का जन्मोत्सव भी श्री कृष्ण जन्मोत्सव के समान ही मनाया जाना चाहिए। इसमें तनिक भी उपेक्षा नहीं करना चाहिए। हर श्रीकृष्णा के पंडाल में प्रमुखता के साथ मां जगदंबिका का जन्मोत्सव बड़ी धूम धाम से मनाया जाना चाहिए।
विंध्यवासिनी के तीन मुख्य स्वरूप :-
विंध्यवासिनी एक मात्र ऐसी जागृत शक्तिपीठ है जिसका अस्तित्व सृष्टि आरंभ होने से पूर्व और प्रलय के बाद भी रहेगा। यहां देवी के 3 रूपों का सौभाग्य भक्तों को प्राप्त होता है। पुराणों में विंध्य क्षेत्र का महत्व तपोभूमि के रूप में वर्णित है। त्रिकोण यंत्र पर स्थित विंध्याचल निवासिनी देवी लोकहिताय, महालक्ष्मी, महाकाली तथा महासरस्वती का रूप धारण करती हैं। विंध्यवासिनी देवी विंध्य पर्वत पर स्थित मधु तथा कैटभ नामक असुरों का नाश करने वाली भगवती यंत्र की अधिष्ठात्री देवी हैं। यहां पर संकल्प मात्र से उपासकों को सिद्वि प्राप्त होती है। इस कारण यह क्षेत्र सिद्व पीठ के रूप में विख्यात है। ब्रह्मा, विष्णु व महेश भी भगवती की मातृभाव से उपासना करते हैं, तभी वे सृष्टि की व्यवस्था करने में समर्थ होते हैं। इसकी पुष्टि मार्कंडेय पुराण श्री दुर्गा सप्तशती की कथा से भी होती है। शास्त्रों में मां विंध्यवासिनी के ऐतिहासिक महात्म्य का अलग-अलग वर्णन मिलता है. शिव पुराण में मां विंध्यवासिनी को सती माना गया है तो श्रीमद्भागवत में नंदजा देवी कहा गया है। मां के अन्य नाम कृष्णानुजा, वनदुर्गा भी शास्त्रों में वर्णित हैं। इस महाशक्तिपीठ में वैदिक तथा वाम मार्ग विधि से पूजन होता है। शास्त्रों में इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि आदि शक्ति देवी कहीं भी पूर्णरूप में विराजमान नहीं हैं, विंध्याचल ही ऐसा स्थान है जहां देवी के पूरे विग्रह के दर्शन होते हैं। शास्त्रों के अनुसार, अन्य शक्तिपीठों में देवी के अलग-अलग अंगों की प्रतीक रूप में पूजा होती है।

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