पारदर्शिता बनाए रखना, विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) का एक संस्थागत कार्य है और व्यापार नीति समीक्षा (टीपीआर) इसके विभिन्न तरीकों में से एक है। यह समय-समय पर होने वाली एक उत्कृष्ट सहकर्मी समीक्षा प्रक्रिया है, जिसमें सचिवालय किसी सदस्य देश की व्यापार नीतियों और प्रथाओं का विस्तार से अध्ययन करता है, जिसमें वृहद् आर्थिक स्थितियां भी शामिल होती हैं और सदस्य पूरी प्रक्रिया के दौरान सोच-समझकर, सटीक और अक्सर आलोचनात्मक सवाल उठाते हैं। जुलाई 2026 के अंत में, भारत ने डब्ल्यूटीओ में अपनी आठवें टीपीआर का समापन किया, यह एक ऐसी प्रक्रिया थी, जिसके लिए कई महीनों की तैयारी की गयी थी। इन तैयारियों में सचिवालय कर्मचारियों का दौरा, प्रतिनिधिमंडलों द्वारा 1,100 से अधिक सवाल पूछना, विचारों का आदान-प्रदान आदि शामिल थे। भारत ने अंतर-विभागीय और बहु-हितधारक संवाद के माध्यम से इन सवालों और स्पष्टीकरणों का जवाब दिया। यह भारत के लिए एक मौका था कि वह सदस्य देशों के सामने अपने आर्थिक और विकास विज़न की व्याख्या कर सके और यह बता सके कि भारत वैश्विक धन और समृद्धि में कैसे योगदान दे सकता है।भारत की पिछली व्यापार नीति की समीक्षा कोविड-19 महामारी की पृष्ठभूमि में 2021 में हुई थी। हालांकि, स्वास्थ्य संकट को नियंत्रित कर लिया गया है, लेकिन आर्थिक कमजोरियां और ऊर्जा स्रोतों सहित आवश्यक आपूर्ति की गंभीर कमी जैसी समस्याएं हाल के दिनों में बढ़ गई हैं। दुनिया महामारी संकट से उबर गई है, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधानों से नई चुनौतियां सामने आईं हैं। ऐसे माहौल में, आठवीं समीक्षा ने एक बहुत ही सकारात्मक तस्वीर पेश की: भारत बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनकर उभरा है, इसने वैश्विक व्यापार में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है और इसे तेज़ी से एक अहम व्यापारिक साझेदार के तौर पर देखा जा रहा है। डब्ल्यूटीओ के सदस्यों ने विकसित भारत@ 2047 की दिशा में भारत के प्रयासों की सराहना की और स्वीकार किया कि भारत की मजबूत और निरंतर आर्थिक वृद्धि, दुनिया के साथ गहरे होते संबंध और तेजी से हुआ डिजिटल परिवर्तन एक साथ मिलकर 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनने के अपने विज़न की दिशा में इसकी निरंतर प्रगति को रेखांकित करते हैं।
इस साल की समीक्षा की गंभीरता ही बहुत कुछ बताने वाली है। इस समीक्षा में डब्ल्यूटीओ के सदस्यों ने सभी क्षेत्रों के बारे में असाधारण रूप से व्यापक और निरंतर संवाद किया, जो भारत के व्यापार, नियामक और वृहद् आर्थिक नीतियों के प्रति उनकी रुचि को दर्शाता है। सदस्यों ने मोटे तौर पर भारत की आर्थिक मजबूती और बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली के साथ रचनात्मक साझेदारी की सराहना की, साथ ही डिजिटल नवाचार, सीमा-शुल्क व व्यापार सुविधा, स्टार्ट-अप्स और मुक्त व्यापार समझौतों जैसी उपलब्धियों का भी उल्लेख किया। इसलिए, इसमें शामिल होने वालों की संख्या सिर्फ़ बारीकी से जांच-परख का पैमाना नहीं है; यह इस बात का भी संकेत है कि भारत के आर्थिक बदलाव में अब कितनी दिलचस्पी ली जा रही है।
यह बदलाव आंकड़ों में साफ़ दिखता है। 2021-22 और 2025-26 के बीच, भारत की अर्थव्यवस्था की सालाना औसत विकास दर लगभग 8 प्रतिशत रही। 2025-26 में कुल निर्यात रिकॉर्ड 863 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया, जिसमें 441.8 बिलियन डॉलर का वस्तु निर्यात और 421.3 बिलियन डॉलर का सेवा निर्यात शामिल है। कई सदस्यों ने भारत में डिजिटल रूप से दी जाने वाली सेवाओं के क्षेत्र में हुई शानदार प्रगति पर ज़ोर दिया। सातवें टीपीआर के बाद की अवधि में भारत के कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सुदृढ़ता स्थापित करने की स्पष्ट दिशा प्रतिबिंबित होती है, साथ ही देश ने व्यापारिक साझेदारों को भारत की विकास गाथा का हिस्सा बनने का अभूतपूर्व अवसर भी दिया। समीक्षा अवधि के दौरान, भारत ने अपनी गति फिर से हासिल की और वैश्विक बाजारों के लिए वस्तुओं और सेवाओं का एक महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में अपनी स्थिति को मजबूत किया।
शायद यह बदलाव साफ़ तौर पर भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था में सबसे ज़्यादा दिखाई देता है। डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (डीपीआई) ने भारत को बड़ी आबादी के स्तर पर डिजिटल प्रणाली बनाने में मदद की है; अकेले एकीकृत भुगतान इंटरफेस (यूपीआई) का भारत के डिजिटल भुगतान लेन-देन में 85 प्रतिशत और 2025 में दुनिया भर के वास्तविक समय पर हुए कुल भुगतान में लगभग 49 प्रतिशत हिस्सा है। डब्ल्यूटीओ में सदस्यों ने खास तौर पर डीपीआई में भारत की उपलब्धियों का ज़िक्र किया। भारत के डिजिटल और विकास-उन्मुख सुधारों को विकासशील और सबसे कम विकसित देशों के लिए एक उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है, जो अपने यहाँ डिजिटल बदलाव की कोशिश कर रहे हैं। यह भारत की उभरती हुई व्यापार गाथा का एक अहम पहलू है: खुलेपन को घरेलू क्षमताओं का भी समर्थन मिल रहा है, जिससे लेन-देन की लागत कम होती है और यह छोटे उद्यमों समेत सभी तरह के व्यवसायों को औपचारिक और डिजिटल अर्थव्यवस्था में शामिल होने में सक्षम बनाती है।
भारत की व्यापार नीति बाहरी दुनिया पर अब ज़्यादा केंद्रित हो गई है, और विकसित तथा विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के साथ मुक्त व्यापार समझौतों का दायरा बढ़ रहा है— या तो लागू हो चुके हैं या इन पर बातचीत चल रही है। यह विस्तार साझेदारी में विविधता लाने और भारतीय सामान व सेवाओं के लिए बाज़ार तक बेहतर पहुँच सुनिश्चित करने की कोशिशों को दिखाता है। साथ ही, जैसा टीआरपी चर्चाओं में रेखांकित किया गया था, भारत की एफटीए में भागीदारी, डब्ल्यूटीओ में बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली के प्रति उसकी लगातार और स्पष्ट प्रतिबद्धता के साथ-साथ जारी रहती है।
टीपीआर यह भी दिखाता है कि अधिक खुलापन अपनाने का मतलब भारत के वैध सार्वजनिक नीतिगत हितों को छोड़ देना नहीं है। भारत ने सदस्यों को आश्वस्त किया कि वैश्विक बाजारों के साथ एकीकृत होने का उसका दृष्टिकोण, अपनी विशिष्ट विकास वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए नीतियों के साथ संतुलित रहेगा। यह विशेष रूप से कृषि में साफ दिखाई देता है, जहां भारत ने किसानों की आजीविका की सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों और तकनीकी विनियमों से संबंधित मुद्दों पर, भारत ने पारदर्शिता, हितधारक परामर्श और डब्ल्यूटीओ नियमों के अनुपालन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई और इस संबंध में सदस्यों को स्पष्ट जानकारी दी।
यह आत्मनिर्भर भारत का एक सूक्ष्म अर्थ है। आत्मनिर्भरता का मतलब दुनिया की अर्थव्यवस्था से खुद को अलग-थलग करना नहीं है। भारत के लिए, इसका मतलब घरेलू क्षमताओं, मजबूत आपूर्ति श्रृंखला और तकनीकी क्षमता को विकसित करना है, ताकि देश वैश्विक व्यापार में अधिक ताकत के साथ हिस्सा ले सके। पिछले पांच सालों का रिकॉर्ड यह दिखाता है कि भारत यही संतुलन बना रहा है: जहां यह अवसर निर्मित करता है, वहां अधिक खुलापन रखना और साथ ही वैध घरेलू हितों की रक्षा करने की क्षमता बनाए रखना।
यह दृष्टिकोण ऐसे समय में विशेष महत्व रखता है, जब एकतरफा कदमों, आपूर्ति श्रृंखला व्यवधानों और भू-राजनीतिक तनावों ने वैश्विक व्यापार प्रणाली में भरोसे को कमजोर कर दिया है। इसलिए, डब्ल्यूटीओ को केंद्र में रखते हुए एक पूर्वानुमानित, नियम-आधारित और विकास-उन्मुख बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली के प्रति भारत की प्रतिबद्धता का विशेष महत्त्व है, जो इसके व्यापारिक हितों से कहीं ज़्यादा मायने रखती है। जैसा कि भारत की व्यापार नीति समीक्षा की अध्यक्ष ने अपने समापन भाषण में उल्लेख किया, भारत के प्रतिनिधिमंडल ने उस महत्व को प्रदर्शित किया है, जो देश टीपीआर व्यवस्था और बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को देता है। इस तरह, आठवां टीपीआर एक व्यापक संदेश देता है: भारत दुनिया से मुंह मोड़ने वाला सदस्य नहीं है। यह एक ऐसी अर्थव्यवस्था है, जो प्रगति को अपनाने और वैश्विक व्यापार प्रणाली के साथ गहराई से एकीकृत होने का प्रयास कर रही है, साथ ही यह सुनिश्चित कर रही है कि यह एकीकरण उसकी विकास प्राथमिकताओं, घरेलू क्षमताओं और राष्ट्रीय हितों के अनुकूल बना रहे।
(लेखक वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय, भारत सरकार, के वाणिज्य विभाग में सचिव हैं।)

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