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Sunday, August 30, 2026

महंगाई और बेरोजगारी : समाज की बीमारी- विक्रम दयाल


महंगाई और बेरोजगारी आज केवल आर्थिक समस्याएँ नहीं रह गई हैं, बल्कि ये समाज के उस दर्द की अभिव्यक्ति बन चुकी हैं, जो धीरे-धीरे हर घर की चौखट तक पहुँच रहा है। एक ओर बाजार में रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतें आम आदमी की जेब पर भारी पड़ रही हैं, तो दूसरी ओर पढ़ा-लिखा युवा रोजगार की तलाश में दर-दर भटकने को विवश है। जब कमाई सीमित हो और खर्च लगातार बढ़ता जाए, तब जीवन केवल कठिन नहीं होता, बल्कि परिवार की खुशियाँ भी धीरे-धीरे चिंता में बदलने लगती हैं। महंगाई का सबसे अधिक असर उस व्यक्ति पर पड़ता है जिसकी आय निश्चित है। वेतन वही, पेंशन वही, मजदूरी सीमित—लेकिन भोजन, शिक्षा, इलाज, आवास और दूसरी आवश्यकताओं का खर्च बढ़ता जाता है। गरीब आदमी अपनी जरूरतें घटाता है, मध्यमवर्ग अपनी इच्छाएँ छोड़ता है और निम्न आय वाला परिवार कई बार आवश्यकताओं में भी कटौती करने को मजबूर हो जाता है। प्रश्न यह है कि आखिर विकास का लाभ उस अंतिम व्यक्ति तक कब पहुँचेगा, जिसके लिए महीने का अंत आज भी आर्थिक परीक्षा बन जाता है? दूसरी ओर बेरोजगारी की समस्या और भी गंभीर है। हमारे युवा डिग्रियाँ लेकर निकलते हैं, सपने लेकर निकलते हैं, लेकिन रोजगार के पर्याप्त अवसर न मिलने पर निराशा लेकर लौटते हैं। बेरोजगार युवा केवल अपनी आय नहीं खोता; वह आत्मविश्वास, सामाजिक सम्मान और भविष्य के प्रति विश्वास भी खोने लगता है। लंबे समय तक रोजगार न मिलना परिवार पर आर्थिक बोझ बढ़ाता है और समाज में असंतोष को जन्म देता है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि महंगाई और बेरोजगारी एक-दूसरे को बढ़ाती हैं। रोजगार न हो तो आय नहीं, आय न हो तो खरीदारी कम, खरीदारी कम हो तो छोटे व्यापार और उत्पादन पर असर—और इसका परिणाम फिर रोजगार के अवसरों में कमी के रूप में सामने आता है। यह एक ऐसा आर्थिक चक्र है, जिसे तोड़ना केवल सरकारी घोषणाओं से संभव नहीं; इसके लिए जमीन पर ठोस और निरंतर प्रयास चाहिए। हमें यह भी समझना होगा कि रोजगार का अर्थ केवल सरकारी नौकरी नहीं है। देश में छोटे उद्योग, कुटीर उद्योग, कृषि आधारित व्यवसाय, हस्तशिल्प, सेवा क्षेत्र और स्थानीय उद्यम रोजगार के बड़े स्रोत बन सकते हैं। यदि युवाओं को प्रशिक्षण, पूंजी, बाजार और तकनीकी सहायता मिले तो वे नौकरी मांगने वाले ही नहीं, नौकरी देने वाले भी बन सकते हैं। महंगाई पर नियंत्रण के लिए भी केवल आंकड़ों को देखना पर्याप्त नहीं है। आम आदमी की थाली में क्या है, रसोई का बजट कितना बिगड़ा है और परिवार की आवश्यकताएँ कितनी कठिन हुई हैं—नीति निर्माण का केंद्र यही होना चाहिए। जमाखोरी, कालाबाजारी और अनावश्यक बिचौलियापन पर प्रभावी नियंत्रण के साथ उत्पादन और आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत करना भी जरूरी है।  आज आवश्यकता ऐसी अर्थव्यवस्था की है जिसमें विकास की चमक के साथ आम आदमी के जीवन में राहत भी दिखाई दे। बड़े-बड़े आंकड़े तभी सार्थक हैं, जब घर की रसोई में चूल्हा सहजता से जले, युवा के हाथ में काम हो और परिवार भविष्य को लेकर आश्वस्त हो। महंगाई और बेरोजगारी को केवल अर्थशास्त्र की भाषा में समझना अधूरा होगा। इनके पीछे करोड़ों लोगों की आशाएँ, चिंताएँ और सपने जुड़े हैं। बेरोजगार युवा की आँखों में भविष्य का प्रश्न है और महंगाई से जूझते परिवार की थाली में वर्तमान की चिंता। समाज तभी स्वस्थ कहलाएगा, जब उसकी आर्थिक व्यवस्था में संवेदना भी होगी। सरकार, उद्योग, समाज और नागरिक —सभी को मिलकर ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें मेहनत करने वाले को सम्मानजनक अवसर मिले और मेहनत की कमाई सम्मानपूर्वक जीवन जीने के लिए पर्याप्त हो। महंगाई और बेरोजगारी सचमुच समाज की बीमारी हैं, लेकिन बीमारी का इलाज असंभव नहीं। जरूरत है सही नीति, ईमानदार क्रियान्वयन और उस आम आदमी को केंद्र में रखने की, जिसके श्रम से देश की अर्थव्यवस्था चलती है। आखिर विकास का अंतिम उद्देश्य यही तो होना चाहिए—देश आगे बढ़े और उसके साथ देश का सामान्य नागरिक भी सुख, सम्मान और विश्वास के साथ आगे बढ़े।

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