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Tuesday, August 25, 2026

समाज को बचाना है तो संवाद बचाइए- विक्रम दयाल


आज देश विकास की नई ऊँचाइयों की ओर बढ़ने का संकल्प ले रहा है। विज्ञान, तकनीक, संचार और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में परिवर्तन दिखाई दे रहा है। हमारे हाथों में दुनिया से जुड़ने के साधन हैं, लेकिन विडंबना यह है कि अपने ही आसपास के लोगों से हमारा संवाद कम होता जा रहा है। हम पहले से अधिक बोल रहे हैं, पर एक-दूसरे को सुनने की क्षमता खोते जा रहे हैं।  समाज की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता में छिपी एकता होती है। विचार अलग हो सकते हैं, आस्थाएँ अलग हो सकती हैं, जीवन जीने के तरीके अलग हो सकते हैं, लेकिन मनुष्य होने का रिश्ता सबसे बड़ा होना चाहिए। दुर्भाग्य से आज छोटी-सी असहमति भी कई बार मनभेद का कारण बन जाती है। विचारों का विरोध धीरे-धीरे व्यक्ति के विरोध में बदल जाता है और व्यक्ति का विरोध कभी-कभी सामाजिक कटुता का रूप ले लेता है। लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं। वास्तव में स्वस्थ लोकतंत्र वही है जिसमें अलग-अलग विचारों के लिए स्थान हो। समस्या मतभेद में नहीं, बल्कि मतभेद को दुश्मनी समझ लेने में है। हमें यह समझना होगा कि किसी विचार से असहमत होना, उस विचार को रखने वाले व्यक्ति से घृणा करना नहीं है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने घरों से लेकर सार्वजनिक जीवन तक संवाद की संस्कृति को पुनर्जीवित करें। परिवार में बच्चे को केवल अपनी बात मनवाना नहीं, दूसरों की बात सुनना भी सिखाया जाए। समाज में बुजुर्गों के अनुभव को बोझ नहीं, मार्गदर्शन माना जाए। युवाओं की ऊर्जा को केवल आलोचना में नहीं, रचनात्मक कार्यों में लगाया जाए। सोशल मीडिया ने संवाद को आसान बनाया है, लेकिन इसी माध्यम ने अफवाह, अधूरी जानकारी और उत्तेजना को भी बहुत तेज कर दिया है। कोई संदेश देखकर तुरंत प्रतिक्रिया देना आज सामान्य हो गया है। हम सत्य की पुष्टि करने से पहले उसे आगे बढ़ा देते हैं और कई बार अनजाने में सामाजिक तनाव को बढ़ाने का कारण बन जाते हैं। इसलिए डिजिटल युग में नागरिक जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गई है। हमें यह भी विचार करना होगा कि समाज केवल कानूनों से नहीं चलता। कानून व्यवस्था आवश्यक है, लेकिन सामाजिक शांति केवल कानून के भरोसे कायम नहीं रह सकती। उसके लिए संवेदना, संयम और परस्पर सम्मान चाहिए। यदि पड़ोसी को पड़ोसी का दुख दिखाई न दे, यदि किसी परिवार की परेशानी दूसरे परिवार को प्रभावित न करे, यदि कमजोर की पीड़ा देखकर हमारा मन विचलित न हो, तो फिर विकास के बड़े-बड़े दावे भी अधूरे रह जाएंगे। भारत की सामाजिक परंपरा ने सदियों से हमें सह-अस्तित्व का संदेश दिया है। यहां विभिन्न भाषाएँ, संस्कृतियाँ, परंपराएँ और जीवन-पद्धतियाँ साथ-साथ विकसित हुई हैं। इस विरासत की रक्षा केवल नारों से नहीं, बल्कि अपने व्यवहार से करनी होगी। हमें अपने बच्चों को यह बताना होगा कि भारत की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि उसकी सामाजिक आत्मा भी है। आज सबसे बड़ा संकट शायद गरीबी, बेरोजगारी या महंगाई जितना ही आपसी विश्वास का संकट भी है। जब समाज में विश्वास घटता है तो अफवाह बढ़ती है, भय बढ़ता है और संदेह बढ़ता है। इसके विपरीत जब विश्वास मजबूत होता है तो कठिन परिस्थितियों में भी समाज एक-दूसरे का सहारा बन जाता है। इसलिए समय की मांग है कि हम बहस करें, लेकिन मर्यादा के साथ; विरोध करें, लेकिन वैमनस्य के बिना; प्रश्न पूछें, लेकिन अपमान के बिना; और अपनी बात रखें, लेकिन दूसरे की बात सुनने का धैर्य भी रखें। देश केवल संसद, सरकार, न्यायालय, बाजार और संस्थाओं से नहीं बनता। देश उन करोड़ों सामान्य नागरिकों से बनता है जो रोज अपने घर, मोहल्ले, कार्यस्थल और समाज में व्यवहार करते हैं। हमारा छोटा-सा व्यवहार भी सामाजिक वातावरण को प्रभावित करता है। आज हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम किसी अफवाह को सत्य मानकर आगे नहीं बढ़ाएंगे, किसी असहमति को दुश्मनी नहीं बनाएंगे और किसी मनुष्य को उसकी पहचान के आधार पर छोटा नहीं समझेंगे। क्योंकि अंततः समाज की मजबूती इस बात से तय नहीं होती कि हम कितनी ऊँची आवाज में बोलते हैं, बल्कि इस बात से तय होती है कि हम एक-दूसरे को कितनी संवेदना और सम्मान से सुनते हैं। देश को मजबूत बनाना है तो केवल विकास की गति नहीं, सामाजिक विश्वास भी बढ़ाना होगा। और सामाजिक विश्वास बचाना है तो संवाद बचाना होगा। आज देश को सबसे अधिक आवश्यकता शायद इसी की है—  विचारों में विविधता रहे, लेकिन दिलों में दूरी न बढ़े।

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