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Wednesday, August 5, 2026

भारतीय संस्कृति: आधुनिकता के बीच अपनी पहचान की तलाश- विक्रम दयाल


"यदि किसी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था टूट जाए तो वह फिर खड़ी हो सकती है, पर यदि उसकी संस्कृति टूट जाए तो उसका अस्तित्व ही संकट में पड़ जाता है।" आज भारत एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है जहाँ विकास की रफ्तार अभूतपूर्व है। चंद्रमा से लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक भारत अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रहा है। महानगर ऊँची इमारतों से भर रहे हैं, डिजिटल क्रांति गाँव-गाँव तक पहुँच रही है, दुनिया भारत की आर्थिक शक्ति को नए सम्मान से देख रही है। परंतु इसी चमक के बीच एक मौन प्रश्न बार-बार हमारे अंतर्मन को झकझोरता है—क्या हम आधुनिकता की दौड़ में अपनी सांस्कृतिक आत्मा को पीछे छोड़ते जा रहे हैं? आज आवश्यकता केवल आर्थिक विकास की नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जागरण की भी है। क्योंकि जिस राष्ट्र का वर्तमान अपनी जड़ों से कट जाता है, उसका भविष्य भी अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रह सकता। भारतीय संस्कृति किसी एक धर्म, जाति या भाषा की धरोहर नहीं है। यह उस जीवन-दर्शन का नाम है जिसने मनुष्य को मनुष्य समझना सिखाया। यहाँ गंगा केवल नदी नहीं, माँ है; धरती केवल भूमि नहीं, वसुंधरा है; वृक्ष केवल लकड़ी नहीं, जीवनदाता हैं; अतिथि केवल आगंतुक नहीं, देवता है। यही वह चेतना है जिसने भारत को विश्वगुरु बनाया। लेकिन आज उपभोक्तावाद की आँधी ने जीवन के मूल्य बदल दिए हैं। सफलता का अर्थ चरित्र नहीं, बल्कि चकाचौंध बनता जा रहा है। प्रतिष्ठा का आधार सेवा नहीं, प्रदर्शन बनता जा रहा है। जीवन का मूल्य त्याग से नहीं, भोग से आँका जाने लगा है। यह परिवर्तन केवल सामाजिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संकट का संकेत है। सबसे बड़ी चिंता नई पीढ़ी को लेकर है। उसके हाथों में आधुनिक तकनीक है, पर उसके मन तक अपने इतिहास, साहित्य, लोकपरंपराओं और सांस्कृतिक विरासत की धड़कन कितनी पहुँच पा रही है? बच्चे दुनिया के अनेक देशों की जानकारी रखते हैं, लेकिन अपने गाँव, अपनी लोकभाषा, अपने लोकगीत और अपने महापुरुषों से अपरिचित होते जा रहे हैं। यह स्थिति केवल शिक्षा की कमी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दिशा के अभाव का परिणाम है। परिवार, जो भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति था, आज अनेक चुनौतियों से घिरा है। एक ही छत के नीचे रहने वाले लोग संवाद के बजाय स्क्रीन से जुड़े हुए हैं। भोजन साथ बैठकर कम और अलग-अलग समय पर अधिक किया जा रहा है। बुज़ुर्ग अनुभव के स्रोत होने के बजाय उपेक्षा के शिकार बनते जा रहे हैं। यदि परिवार संस्कारों का विद्यालय था, तो आज वह विद्यालय स्वयं परीक्षा में खड़ा दिखाई देता है। त्योहार भी बदल रहे हैं। उत्सवों की आत्मा धीरे-धीरे बाज़ारवाद के शोर में दबती जा रही है। श्रद्धा का स्थान प्रदर्शन ले रहा है। धार्मिकता कभी-कभी आडंबर में बदल जाती है, जबकि भारतीय संस्कृति का मूल संदेश सादगी, संयम और सद्भाव रहा है। यह भी सत्य है कि आधुनिकता का विरोध समाधान नहीं है। विज्ञान, तकनीक और नवाचार किसी भी राष्ट्र की प्रगति के लिए आवश्यक हैं। भारत को आगे बढ़ना ही होगा। लेकिन प्रश्न यह है कि विकास का मार्ग अपनी जड़ों को काटकर क्यों बनाया जाए? जापान ने आधुनिकता अपनाई, पर अपनी संस्कृति नहीं छोड़ी। अनेक विकसित देशों ने अपनी भाषा और परंपराओं को सम्मान दिया। फिर भारत अपनी ही सांस्कृतिक धरोहर को लेकर संकोच क्यों करे? भारतीय भाषाओं की उपेक्षा भी गंभीर चिंता का विषय है। विदेशी भाषाओं का ज्ञान स्वागतयोग्य है, किंतु यदि अपनी मातृभाषा बोलने में संकोच होने लगे, तो यह आत्मविश्वास नहीं, सांस्कृतिक विस्मृति का संकेत है। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती; वह सभ्यता की स्मृति और समाज की आत्मा होती है। आज आवश्यकता केवल "डिजिटल इंडिया" की नहीं, बल्कि "सांस्कृतिक इंडिया" की भी है। तकनीक हमारे हाथों में हो, लेकिन तुलसीदास, कबीर, प्रेमचंद, महादेवी, निराला और भारतीय लोकसाहित्य हमारे हृदय में भी जीवित रहें। कृत्रिम बुद्धिमत्ता का स्वागत हो, पर मानवीय संवेदनाएँ कृत्रिम न बन जाएँ। यही संतुलन भारत की वास्तविक शक्ति है। शिक्षा व्यवस्था को भी आत्ममंथन करना होगा। यदि विद्यालय केवल नौकरी देने वाले संस्थान बनकर रह जाएँ और जीवन-मूल्य न गढ़ें, तो शिक्षित समाज भी संस्कारहीन हो सकता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल कुशल कर्मचारी तैयार करना नहीं, बल्कि जागरूक, संवेदनशील और चरित्रवान नागरिक तैयार करना होना चाहिए। सरकार, समाज, परिवार, विद्यालय, साहित्यकार, कलाकार और मीडिया—सभी की साझा जिम्मेदारी है कि भारतीय संस्कृति को केवल स्मृति का विषय न बनने दें, बल्कि जीवन का व्यवहार बनाएँ। संस्कृति भाषणों से नहीं बचती, वह आचरण से बचती है। आज जब पूरी दुनिया मानसिक तनाव, अकेलेपन, हिंसा, पर्यावरण संकट और नैतिक अवसाद से जूझ रही है, तब भारतीय संस्कृति का "वसुधैव कुटुम्बकम्", "सर्वे भवन्तु सुखिनः" और "अहिंसा परमो धर्मः" का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठा है। भारत यदि अपनी सांस्कृतिक चेतना को सहेज ले, तो वह केवल आर्थिक महाशक्ति नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक नेतृत्व भी कर सकता है।निष्कर्ष यह समय आत्ममंथन का है। हमें यह तय करना होगा कि हम केवल आधुनिक भारत बनाना चाहते हैं या संस्कारित और आधुनिक भारत। विकास की सड़कें जितनी चौड़ी हों, उतनी ही गहरी हमारी सांस्कृतिक जड़ें भी हों। यदि जड़ें सुरक्षित रहेंगी तो शाखाएँ आकाश छुएँगी; यदि जड़ें सूख गईं, तो विकास की हरियाली भी अधिक दिनों तक टिक नहीं पाएगी। भारत की पहचान उसके बाज़ारों से नहीं, उसके संस्कारों से है; उसकी शक्ति उसके शस्त्रों से नहीं, उसकी संस्कृति से है; और उसका भविष्य केवल तकनीक से नहीं, बल्कि उस आत्मा से सुरक्षित रहेगा जो हजारों वर्षों से इस भूमि को "भारत" बनाती आई है। आज का सबसे बड़ा राष्ट्रीय प्रश्न यही है—क्या हम आधुनिक बनने की जल्दबाज़ी में भारतीय बने रहने की बुद्धिमत्ता खो रहे हैं? यदि इस प्रश्न का उत्तर समय रहते खोज लिया गया, तो भारत का स्वर्णिम भविष्य सुनिश्चित है; अन्यथा आने वाली पीढ़ियाँ विकास की ऊँचाइयों पर खड़ी होकर भी अपनी पहचान तलाशती रह जाएँगी।

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