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Monday, August 24, 2026

धर्म के परिप्रेक्ष्य में धर्मज्ञ के ईश्वरीय नहीं, कर्म- विक्रम दयाल


धर्म केवल पूजा-पाठ, कर्मकांड, वेशभूषा अथवा धार्मिक पहचान का नाम नहीं है। धर्म तो मनुष्य के आचरण में दिखाई देने वाली वह पवित्र चेतना है, जो उसे सत्य, न्याय, करुणा, परोपकार और मानवता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। मंदिर में सिर झुकाना सरल है, लेकिन किसी दुखी व्यक्ति के आँसू पोंछना ही धर्म की वास्तविक परीक्षा है। आज हमारा समाज धर्म की चर्चा तो बहुत करता है, लेकिन धर्म के मूल उद्देश्य को समझने में कहीं-कहीं चूक रहा है। धार्मिक आयोजनों की भव्यता बढ़ रही है, उपदेशों की संख्या बढ़ रही है, धर्म के नाम पर बहसें बढ़ रही हैं, परंतु क्या हमारे व्यवहार में उसी अनुपात में सत्य, संवेदना और सदाचार बढ़ रहे हैं? यही वह प्रश्न है, जिस पर समाज को गंभीरता से विचार करना चाहिए। धर्मज्ञ होना केवल धर्मग्रंथों का ज्ञान प्राप्त कर लेना नहीं है। धर्मज्ञ वह है जिसके कर्मों में धर्म दिखाई दे। उसके शब्दों से अधिक उसका व्यवहार बोलता हो। वह अपने अधिकार के साथ अपने कर्तव्य को भी समझता हो। वह अपने लिए सुख चाहता है तो दूसरों के दुख को भी अपना दुख समझे। ईश्वर ने मनुष्य को केवल पूजा करने के लिए नहीं, बल्कि कर्म करने के लिए भी भेजा है। गीता का संदेश भी कर्म की महत्ता को सामने रखता है। मनुष्य का मूल्य उसके पद, प्रतिष्ठा, धन या धार्मिक पहचान से नहीं, बल्कि उसके कर्मों से निर्धारित होता है। एक व्यक्ति प्रतिदिन मंदिर जाता है, घंटियाँ बजाता है, अनेक धार्मिक अनुष्ठान करता है; लेकिन यदि वह घर लौटकर अपने माता-पिता का अपमान करता है, गरीब को तुच्छ समझता है, कमजोर का अधिकार छीनता है और अपने स्वार्थ के लिए झूठ बोलता है, तो उसके धार्मिक कर्मकांड पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। इसके विपरीत कोई साधारण व्यक्ति यदि भूखे को भोजन देता है, पीड़ित की सहायता करता है, किसी असहाय के लिए खड़ा होता है, अपने श्रम से ईमानदारी की रोटी कमाता है और किसी के अधिकार पर कब्जा नहीं करता, तो उसके भीतर धर्म की वास्तविक ज्योति दिखाई देती है। धर्म का सबसे सुंदर रूप मानवता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम धर्म को विवाद का विषय बनाने के बजाय चरित्र निर्माण का माध्यम बनाएं। धर्म यदि मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है तो वह समाज के लिए वरदान है; लेकिन यदि धर्म के नाम पर मनुष्यों में घृणा, अहंकार और विभाजन पैदा होने लगे तो हमें अपने भीतर झाँकने की आवश्यकता है। धर्मज्ञ व्यक्ति किसी दूसरे धर्म को नीचा दिखाकर बड़ा नहीं होता। वह अपने धर्म की श्रेष्ठता अपने आचरण से सिद्ध करता है। वह जानता है कि सत्य किसी एक व्यक्ति, संस्था या समुदाय की निजी संपत्ति नहीं है। करुणा की कोई जाति नहीं, मानवता का कोई संप्रदाय नहीं और सदाचार की कोई सीमा नहीं होती। ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए महंगे आयोजन करने से अधिक महत्वपूर्ण है किसी भूखे के पेट में अन्न पहुँचाना। हजारों दीप जलाने से अधिक सार्थक है किसी के जीवन के अंधकार में आशा का दीप जलाना। बड़े-बड़े धार्मिक भाषण देने से अधिक प्रभावशाली है अपने जीवन में सत्य और ईमानदारी को उतारना। हमारे समाज में आज सबसे बड़ी आवश्यकता धार्मिकता से अधिक धर्माचरण की है। धर्म को यदि केवल माथे के तिलक, गले की माला और हाथों की पूजा सामग्री तक सीमित कर दिया जाए तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाता है। धर्म तब जीवित होता है जब वह मनुष्य के विचारों में उतरता है, उसके शब्दों को मधुर बनाता है और उसके कर्मों को लोककल्याण की दिशा देता है। किसी व्यक्ति की वास्तविक पहचान यह नहीं कि वह कितनी बार पूजा करता है, बल्कि यह है कि उसके कारण कितने लोगों के जीवन में सुख आया। उसने कितनों का हाथ थामा, कितनों के आँसू पोंछे और कितनों के अधिकारों की रक्षा की। आज धर्म के नाम पर बढ़ते दिखावे के बीच हमें अपने पूर्वजों की उस परंपरा को याद करना होगा, जिसमें धर्म का अर्थ था—सत्य बोलना, परिश्रम करना, बड़ों का सम्मान करना, छोटों से प्रेम करना, अतिथि का सत्कार करना, प्रकृति की रक्षा करना और जरूरतमंद की सहायता करना। धर्म का अंतिम लक्ष्य मनुष्य को बेहतर मनुष्य बनाना है। इसलिए धर्मज्ञ होने का दावा करने से पहले हमें अपने कर्मों को देखना चाहिए। हमारी वाणी में कितना सत्य है? हमारे व्यवहार में कितनी करुणा है? हमारे निर्णयों में कितना न्याय है? हमारे जीवन में दूसरों के लिए कितनी जगह है? इन्हीं प्रश्नों के उत्तर हमारे वास्तविक धार्मिक होने का प्रमाण देंगे।  ईश्वर मंदिरों में है या नहीं, इस पर मनुष्य बहस कर सकता है; लेकिन पीड़ित की आँखों में दिखाई देने वाला दर्द निश्चित रूप से हमारे सामने है। उस दर्द को समझना और उसे कम करने का प्रयास करना ही मनुष्य के धर्म की सबसे बड़ी परीक्षा है। अंततः यही कहा जा सकता है कि ईश्वर को शब्दों से नहीं, कर्मों से खोजिए। धर्म को दिखावे से नहीं, आचरण से पहचानिए। और धर्मज्ञ होने का प्रमाण उपदेशों से नहीं, मानवता की सेवा से दीजिए। क्योंकि मनुष्य के माथे पर लगा धार्मिक चिह्न नहीं, बल्कि उसके कर्म ही बताते हैं कि उसके भीतर धर्म कितना जीवित है। धर्म का वास्तविक मंदिर मनुष्य का हृदय है और उसकी वास्तविक पूजा सद्कर्म।

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