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Monday, August 3, 2026

जेन-ज़ी : आज़ादी नहीं, जिम्मेदारी भी - अरूणेश कुमार श्रीवास्तव
































































हर पीढ़ी अपने समय की पहचान होती है। जिस तरह स्वतंत्रता के बाद की पीढ़ी ने राष्ट्र निर्माण को प्राथमिकता दी, उदारीकरण के दौर की पीढ़ी ने आर्थिक अवसरों को अपनाया, उसी प्रकार आज की युवा पीढ़ी, जिसे सामान्यतः जेन-ज़ी कहा जाता है, डिजिटल युग की प्रतिनिधि है। यह पीढ़ी तकनीक के साथ पैदा हुई, इंटरनेट के साथ बड़ी हुई और दुनिया को अपनी हथेली पर लेकर चल रही है। इसकी सोच तेज़ है, सीखने की क्षमता अद्भुत है, नवाचार में विश्वास है और पुराने ढर्रे को चुनौती देने का साहस भी है। यही कारण है कि आज स्टार्टअप, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल कारोबार, सामाजिक अभियानों और नई तकनीकों में इस पीढ़ी की महत्वपूर्ण भूमिका दिखाई देती है। लेकिन हर शक्ति के साथ जिम्मेदारी भी आती है। यदि ऊर्जा को सही दिशा न मिले तो वही शक्ति समाज के लिए चिंता का कारण भी बन सकती है।
जेन-ज़ी की सबसे बड़ी ताकत उसकी निर्भीक अभिव्यक्ति है। यह पीढ़ी अपने विचार खुलकर रखती है, अन्याय के खिलाफ आवाज उठाती है और सामाजिक बदलाव की पक्षधर है। लोकतंत्र में यह एक सकारात्मक गुण है। लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अभद्रता के बीच एक स्पष्ट रेखा भी होती है। दुर्भाग्य से आज सामाजिक माध्यमों पर कुछ युवाओं के व्यवहार में यह सीमा धुंधली होती दिखाई दे रही है। किसी भी सार्वजनिक व्यक्ति, संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति या विचारधारा से असहमति होना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन असहमति व्यक्त करने के नाम पर अशोभनीय, अपमानजनक या अश्लील भाषा का प्रयोग न तो लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा है और न ही सभ्य समाज की पहचान।
आज सामाजिक माध्यमों ने प्रत्येक व्यक्ति को मंच दे दिया है। पहले विचार सीमित दायरे में रहते थे, अब कुछ ही क्षणों में लाखों लोगों तक पहुँच जाते हैं। यही कारण है कि शब्दों की जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। एक टिप्पणी केवल व्यक्तिगत राय नहीं रह जाती, बल्कि समाज के सामने व्यक्ति के संस्कार, सोच और व्यक्तित्व का परिचय भी बन जाती है। इसलिए डिजिटल मंच पर लिखा गया प्रत्येक शब्द सोच-समझकर लिखा जाना चाहिए।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यहाँ सरकार की आलोचना की जा सकती है। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक या कोई भी जनप्रतिनिधि आलोचना से ऊपर नहीं है। लोकतंत्र में प्रश्न पूछना, नीतियों का विश्लेषण करना और निर्णयों पर असहमति जताना पूरी तरह वैध और आवश्यक है। लेकिन आलोचना और गाली-गलौज में उतना ही अंतर है जितना तर्क और उन्माद में। यदि किसी प्रधानमंत्री या किसी अन्य संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिए अश्लील या अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया जाता है, तो उससे उस पद की गरिमा भी प्रभावित होती है और लोकतांत्रिक संवाद का स्तर भी गिरता है। यह बात किसी एक व्यक्ति या किसी एक दल तक सीमित नहीं है। यही सिद्धांत हर राजनीतिक दल, हर नेता और हर सार्वजनिक पद पर समान रूप से लागू होना चाहिए।
जेन-ज़ी को यह समझना होगा कि किसी विचार का विरोध करने के लिए भाषा का स्तर गिराना आवश्यक नहीं है। दुनिया के अनेक महान नेताओं, चिंतकों और समाज सुधारकों ने तीखी से तीखी असहमति भी मर्यादित भाषा में व्यक्त की। उनके तर्क आज भी पढ़े और सम्मानित किए जाते हैं। इसके विपरीत अपशब्दों का जीवन बहुत छोटा होता है। वे कुछ समय के लिए ध्यान तो आकर्षित कर सकते हैं, लेकिन सम्मान कभी नहीं दिला सकते।
आज एक नई प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है कि कुछ लोग केवल चर्चा में आने के लिए उत्तेजक बयान देते हैं। उन्हें लगता है कि जितनी विवादित भाषा होगी, उतनी अधिक लोकप्रियता मिलेगी। सामाजिक माध्यमों के कुछ मंच भी इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देते हैं, जहाँ संयमित विचारों की तुलना में विवादास्पद टिप्पणियाँ अधिक तेजी से फैलती हैं। लेकिन लोकप्रियता और प्रतिष्ठा में अंतर होता है। प्रतिष्ठा ज्ञान, शालीनता और जिम्मेदारी से मिलती है, जबकि क्षणिक लोकप्रियता कई बार विवादों से भी मिल जाती है। जेन-ज़ी को यह अंतर समझना होगा।
भारतीय संस्कृति में मतभेद को कभी शत्रुता का पर्याय नहीं माना गया। हमारे यहाँ शास्त्रार्थ की परंपरा रही है, जहाँ विचारों का संघर्ष होता था, व्यक्तियों का नहीं। विरोधी विचारों का सम्मान करते हुए तर्क प्रस्तुत किए जाते थे। यही लोकतंत्र की भी मूल भावना है। यदि हम विचारों की जगह व्यक्तियों को अपमानित करने लगेंगे, तो लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर होगा और समाज में कटुता बढ़ेगी।
परिवार और शिक्षा संस्थानों की भी इस दिशा में बड़ी जिम्मेदारी है। बच्चों और युवाओं को केवल आधुनिक तकनीक का उपयोग ही नहीं, बल्कि डिजिटल शिष्टाचार भी सिखाया जाना चाहिए। यह समझाना होगा कि सामाजिक माध्यम पर भी वही मर्यादा होनी चाहिए, जो वास्तविक जीवन में अपेक्षित होती है। यदि कोई व्यक्ति सामने खड़े होकर किसी के लिए अपशब्द नहीं कह सकता, तो उसे आभासी दुनिया में भी ऐसा करने का अधिकार नहीं मान लेना चाहिए।
मीडिया की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। समाज को ऐसे उदाहरण सामने लाने चाहिए जहाँ युवा अपनी प्रतिभा, नवाचार, शोध, साहित्य, विज्ञान, खेल और सामाजिक सेवा के माध्यम से देश का नाम रोशन कर रहे हैं। जेन-ज़ी की पहचान कुछ विवादित टिप्पणियों से नहीं, बल्कि उसके सकारात्मक योगदान से बननी चाहिए। करोड़ों युवा मेहनत, ईमानदारी और रचनात्मकता के साथ देश के विकास में योगदान दे रहे हैं। कुछ लोगों के अनुचित व्यवहार के आधार पर पूरी पीढ़ी का मूल्यांकन करना भी उचित नहीं होगा।
यह भी सत्य है कि हर पीढ़ी से गलतियाँ होती हैं। अनुभव समय के साथ आता है। लेकिन परिपक्व समाज वही होता है जो अपनी गलतियों से सीख ले। यदि कोई युवा कभी मर्यादा से बाहर चला गया है, तो उसके लिए सबसे बड़ी सीख यही है कि असहमति को तर्क के साथ रखा जाए, अपशब्दों के साथ नहीं। शब्दों की गरिमा व्यक्ति की पहचान होती है। जो अपनी भाषा पर नियंत्रण रख सकता है, वही अपने विचारों को प्रभावी ढंग से समाज तक पहुँचा सकता है।
भारत आज दुनिया का सबसे युवा देश बनने की दिशा में अग्रसर है। आने वाले वर्षों में यही जेन-ज़ी प्रशासन, न्यायपालिका, विज्ञान, उद्योग, पत्रकारिता, राजनीति और समाज का नेतृत्व करेगी। इसलिए इस पीढ़ी के सामने केवल अवसर ही नहीं, बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी भी है। उसे यह तय करना होगा कि वह डिजिटल मंचों को संवाद का माध्यम बनाएगी या विवाद का, विचारों का मंच बनाएगी या व्यक्तिगत अपमान का।
जेन-ज़ी को यह याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी पहचान मर्यादित अभिव्यक्ति है। सरकारें बदलती रहती हैं, राजनीतिक दल बदलते रहते हैं, नेता बदलते रहते हैं, लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों की गरिमा स्थायी होती है। यदि हम उन मूल्यों की रक्षा करना चाहते हैं, तो हमें अपनी भाषा, अपने व्यवहार और अपने सार्वजनिक संवाद को भी गरिमामय बनाना होगा।
भारत का भविष्य केवल तकनीकी रूप से सक्षम युवाओं से नहीं, बल्कि चरित्रवान, जिम्मेदार और संवेदनशील युवाओं से बनेगा। जेन-ज़ी यदि अपनी ऊर्जा को ज्ञान, नवाचार, राष्ट्र निर्माण और सकारात्मक विमर्श की दिशा में लगाएगी, तो वह भारत की सबसे बड़ी शक्ति सिद्ध होगी। लेकिन यदि वह असहमति को अपशब्दों और अश्लील भाषा का रूप देगी, तो सबसे पहले उसका अपना नैतिक कद छोटा होगा। इसलिए समय की पुकार यही हैकृविचारों में निर्भीक बनिए, लेकिन भाषा में मर्यादित रहिए। यही सच्चे लोकतंत्र की पहचान है और यही एक जागरूक नागरिक का सबसे बड़ा परिचय भी।

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