विक्रम दयाल
सावन केवल वर्षा का महीना नहीं, बल्कि आत्मा के जागरण, भक्ति के उत्कर्ष और भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का परम पावन अवसर है। जब आकाश से वर्षा की बूंदें धरती को शीतल करती हैं, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं आदिनाथ भगवान शिव अपनी अनंत करुणा का अमृत संसार पर बरसा रहे हों। हर दिशा में "हर-हर महादेव" का घोष, मंदिरों में बजती घंटियाँ, गूंजते शिव-मंत्र और भक्तों की आस्था से भरी कांवड़ यात्रा यह संदेश देती है कि आज भी शिव ही संसार के सबसे सहज, सरल और करुणामय देव हैं। भगवान शिव को आदिनाथ इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे सृष्टि के आदि भी हैं और अनंत भी। वे काल के भी महाकाल हैं, मृत्यु के भी स्वामी हैं और मोक्ष के भी दाता हैं। उनका सोमेश्वर स्वरूप चंद्रमा की शीतलता और करुणा का प्रतीक है। उनके मस्तक पर सुशोभित चंद्रमा हमें सिखाता है कि जीवन में चाहे कितनी ही तपिश क्यों न हो, मन को सदैव शीतल, शांत और संयमित रखना चाहिए। सावन का प्रत्येक सोमवार भक्त और भगवान के मिलन का पर्व है। श्रद्धालु गंगाजल, नर्मदा जल या पवित्र नदियों का जल लेकर शिवलिंग का अभिषेक करते हैं। देखने में यह केवल जल चढ़ाने की क्रिया प्रतीत होती है, परंतु वास्तव में यह अपने अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह और पापों को भगवान के चरणों में समर्पित करने का प्रतीक है। शिव को जल अर्पित करते समय भक्त का मन भी निर्मल होना चाहिए। केवल हाथों से चढ़ाया गया जल नहीं, बल्कि हृदय से निकली श्रद्धा ही भगवान को सबसे अधिक प्रिय होती है। शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान शिव "भाव के भूखे" हैं। वे वैभव नहीं, भक्ति देखते हैं; धन नहीं, समर्पण स्वीकार करते हैं। एक लोटा जल, कुछ बेलपत्र, धतूरा और सच्चे मन से किया गया "ॐ नमः शिवाय" का जाप करोड़ों यज्ञों के समान फलदायी माना गया है। यही कारण है कि शिव गरीब और अमीर, ज्ञानी और अज्ञानी, राजा और रंक—सभी के समान आराध्य हैं। आज का मनुष्य बाहरी सुख-सुविधाओं के पीछे भागते-भागते अपने भीतर के शिव को भूल बैठा है। परिणामस्वरूप अशांति, तनाव, ईर्ष्या, द्वेष और असंतोष उसके जीवन का हिस्सा बन गए हैं। सावन हमें याद दिलाता है कि यदि मन में शिव का वास हो जाए तो जीवन का प्रत्येक क्षण पवित्र हो सकता है। शिव का स्मरण केवल मंदिर तक सीमित न रहे, बल्कि व्यवहार में भी दिखाई दे। दूसरों के प्रति करुणा, सत्य, क्षमा, सेवा और संयम ही वास्तविक शिव-पूजा है। कांवड़ यात्रा भी केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि अनुशासन, धैर्य, त्याग और सामूहिक श्रद्धा का महान विद्यालय है। कठिन मार्ग, नंगे पैर चलना, निरंतर शिव-नाम का स्मरण और सेवा का भाव यह सिखाता है कि ईश्वर की प्राप्ति सरल नहीं, किंतु श्रद्धा और धैर्य से हर कठिनाई पार की जा सकती है। शिव का परिवार भी मानव समाज को अद्भुत संदेश देता है। जहाँ नंदी, सिंह, सर्प, चूहा और मोर जैसे स्वभाव से भिन्न जीव एक ही परिवार में रहते हैं, वहाँ यह शिक्षा मिलती है कि भिन्नता विरोध का नहीं, समरसता का आधार बन सकती है। आज जब समाज जाति, वर्ग, भाषा और विचारों के आधार पर विभाजित हो रहा है, तब शिव परिवार हमें प्रेम, सहिष्णुता और एकता का पाठ पढ़ाता है। सावन में किया गया रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय मंत्र का जप, शिवपुराण का श्रवण और "ॐ नमः शिवाय" का निरंतर स्मरण केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा को निर्मल करने की साधना है। जब मनुष्य अपने भीतर के विकारों को त्याग देता है, तभी भगवान शिव उसके हृदय में हृदयेश बनकर विराजमान होते हैं। कहा गया है कि जन्म और मृत्यु का यह अनवरत चक्र तभी समाप्त होता है जब मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान ले। भगवान शिव मोक्ष के अधिपति हैं। जो भक्त निष्काम भाव से उनकी आराधना करता है, वह धीरे-धीरे कर्मबंधनों से मुक्त होकर आत्मिक शांति की ओर अग्रसर होता है। यही "आवागमन से मुक्ति" का वास्तविक अर्थ है—केवल शरीर का नहीं, बल्कि अज्ञान, भय और अहंकार से भी मुक्ति। आइए, इस पावन सावन में हम केवल शिवलिंग पर जल ही न चढ़ाएँ, बल्कि अपने भीतर की कटुता, अहंकार, हिंसा और स्वार्थ को भी भगवान के चरणों में अर्पित करें। अपने हृदय को शिव का मंदिर बनाएँ, अपने विचारों को गंगाजल की तरह निर्मल रखें और अपने कर्मों को बेलपत्र की तरह पवित्र बनाएँ। जब भक्त प्रेमपूर्वक शिव को जल से अभिषिक्त करता है, तब केवल शिव ही नहीं मुस्कुराते, बल्कि भक्त का जीवन भी आनंद, शांति और दिव्यता से भर उठता है। तब आदिनाथ शिवजी सोमेश्वर सचमुच सावन में मुस्काते हैं, हृदयेश प्रभु भक्तों के हृदय में विराजते हैं और उनकी कृपा से जीवन का अंधकार दूर होकर मोक्ष का प्रकाश प्रकट होता है। हर-हर महादेव!
ॐ नमः शिवाय!

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