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Wednesday, May 27, 2026

यूपी के आयुर्वेद छात्रों के लिए बड़ी खुशखबरी, इन 5 राजकीय कॉलेजों में जल्द शुरू होगा पीजी कोर्स


लखनऊ। प्रदेश के पांच राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेजों में परास्नातक (पीजी) कोर्स शुरू करने का प्रस्ताव है। अभी राज्य के आठ कॉलेजों में से सिर्फ तीन में परास्नातक कोर्स पढ़ाया जाता है। आयुर्वेद निदेशालय ने प्रत्येक कॉलेज में पीजी की 20-20 सीटों शुरू करने का प्रस्ताव शासन को भेजा है।
जिस पर जल्द मंजूरी की उम्मीद है। नये कॉलेजों में परास्नातक कोर्स की मंजूरी से न सिर्फ रसायनों पर शोध और उसकी गुणवत्ता बढ़ेगी बल्कि सर्दी, बुखार, जुकाम जैसे सामान्य रोगियों की एलोपैथी पर निर्भरता कम होगी।
प्रदेश सरकार के राजकीय आयुर्वेद कॉलेजों में से पीलीभीत, लखनऊ और वाराणसी ऐसे हैं, जहां आयुर्वेद में परास्तनाक की पढ़ाई होती है। इनमें सबसे अधिक 49 सीट लखनऊ राजकीय आयुर्वेद कॉलेज में हैं।
36 सीटें वाराणसी कॉलेज में और छह सीटे पीलीभीत कॉलेज में हैं। जबकि प्रत्येक वर्ष सिर्फ राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेजों से 570 औसतन छात्र स्नातक (बीएएमएस) कोर्स की डिग्री लेकर निकलते हैं।
ऐसे में उनके सामने आगे की पढ़ाई के विकल्प सीमित हैं। राज्य में सिर्फ काशी बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में आयुर्वेद परास्नातक की 40 सीटें हैं। गोरखपुर में महायोगी गोरखनाथ आयुष विश्वविद्यालय में पीजी के 20 सीटों की मान्यता हुयी है। प्रवेश चल रहा है। ऐसे में बचे छात्रों के पास दूसरे राज्यों का ही विकल्प है।
इन्हीं दुश्वारी के मददेनजर आयुर्वेद अधिकारियों ने झांसी, बांदा, हंडिया ( प्रयागराज), बरेली, मुजफ्फरनगर के राजकीय कॉलेजों में परास्नातक पाठ्यकक्रम शुरू करने का प्रस्ताव किया है। प्रस्ताव में शिक्षकों की उपलब्धता, अस्पतालों की सुविधाएं, प्रयोगशालाओं का विकास और अन्य आवश्यक संसाधनों का उल्लेख है। अधिकारियों का कहना है कि कॉलेजों में आधारभूत ढांचा पहले से मौजूद है।
इससे पीजी कक्षाएं शुरू करने में अधिक कठिनाई नहीं आएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि पीजी कोर्स शुरू होने से आयुर्वेदिक चिकित्सा के क्षेत्र में शोध और विशेषज्ञता को बढ़ावा मिलेगा। बेहतर आयुर्वेदिक चिकित्सकों का संख्या बढ़ेगी।
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में आयुर्वेदिक स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार होगा। आयुर्वेद के निदेशक डॉ.नरेन्द्र दास का आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ा है।
कोरोना के दौरान आयुष पद्धति की उपयोगिता को व्यापक रूप से महसूस किया गया। जिसके बाद आयुर्वेदिक शिक्षा और चिकित्सा सेवाओं को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

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