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Tuesday, April 21, 2026

शंकराचार्य की कृतियाँ सनातन संस्कृति की अमूल्य धरोहर – पं. बृजेश पाण्डेय


गोरखपुर। सामाजिक, धार्मिक एवं राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रेरित संस्था विद्वत् जनकल्याण समिति द्वारा मंगलवार को आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य जी की जयंती श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मनाई गई। इस अवसर पर संस्था के महामंत्री पं. बृजेश पाण्डेय (ज्योतिषाचार्य) ने राजेन्द्र नगर पश्चिमी स्थित कार्यालय में शंकराचार्य जी के चित्र पर माल्यार्पण कर धूप-दीप प्रज्वलित किया तथा उनके जीवन और कृतित्व का स्मरण किया।
पं. बृजेश पाण्डेय ने कहा कि आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य का जन्म बैशाख शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि को केरल के कालड़ी में हुआ था। अद्वैत वेदांत के प्रतिपादक शंकराचार्य जी को भगवान शिव का अवतार माना जाता है। वे भारत के महान दार्शनिक, संत और आध्यात्मिक चिंतक थे, जिन्होंने भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म की एकता को सुदृढ़ करने का ऐतिहासिक कार्य किया। उस समय समाज में फैली वैचारिक विभाजन की स्थिति को समाप्त कर उन्होंने सनातन धर्म को पुनः जागृत किया।
उन्होंने मात्र आठ वर्ष की आयु में संन्यास ग्रहण किया और अल्पायु में ही वेद, उपनिषद तथा शास्त्रों का गहन अध्ययन किया। 32 वर्ष की आयु में उन्होंने देश की चारों दिशाओं—द्वारका, पुरी, श्रृंगेरी और बद्रीनाथ—में मठों की स्थापना कर भारत की सांस्कृतिक एकता को मजबूत किया। अद्वैत वेदांत का प्रतिपादन उनका प्रमुख योगदान रहा, जिसके माध्यम से उन्होंने ज्ञान, भक्ति और कर्म के समन्वय का संदेश दिया।
शंकराचार्य जी ने उपनिषद, भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखकर भारतीय दर्शन को नई दिशा प्रदान की। उनके द्वारा रचित ‘भज गोविंदम्’, ‘भवानी अष्टकम’ तथा ‘कनकधारा स्तोत्र’ आज भी श्रद्धा के साथ पाठ किए जाते हैं। उन्होंने समाज को धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीय एकता के सूत्र में पिरोने का कार्य किया। पं. बृजेश पाण्डेय ने कहा कि शंकराचार्य जी का जीवन और उनकी कृतियाँ सभी सनातनियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बनी रहेंगी।

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