प्रयागराज। कल्पना कीजिए एक ऐसी नन्हीं बच्ची की, जिसके कदम अभी जमीन पर पूरी तरह जमे भी नहीं हैं। इसके लिए यमुना नदी का विशाल पाट किसी समंदर से कम नहीं है। जहां बड़े-बड़े तैराकों के हौसले लहरों का शोर सुनकर डगमगा जाते हैं, वहां चार वर्ष की एक मासूम ने पानी पर अपनी जीत की इबारत लिख दी है।
- नन्हीं जलपरी सत्या भारती का कमाल
यह कहानी किसी परीकथा की नहीं, बल्कि प्रयागराज की उस 'जलपरी' सत्या भारती की है, जिसने अपने चौथे जन्मदिन पर खिलौनों के बजाय तूफानी लहरों से खेलकर दुनिया को दांतों तले उंगलियां दबाने पर मजबूर कर दिया।
- कुशल डाल्फिन की तरह यमुना को किया पार
शहर के नैनी महेवा की रहने वाली सत्या भारती ने जब सुबह 7:24 पर यमुना की गहराई में छलांग लगाई, तो किनारे पर खड़े हर शख्स की धड़कनें थमी हुई थीं। 900 मीटर का वो सफर, जो किसी अनुभवी तैराक के लिए भी परीक्षा जैसा होता है, उसे सत्या ने 'ब्रेस्टस्ट्रोक' स्टाइल में किसी कुशल डाल्फिन की तरह महज 21 मिनट 28 सेकंड में तय कर लिया। जैसे-जैसे उनके छोटे-छोटे हाथ पानी को पीछे धकेल रहे थे, यमुना का लहरें सत्या के अटूट हौसले के आगे नतमस्तक हो रहा था।
- माता-पिता को बेटी के विश्वविजेता बनने का अटूट विश्वास
कोच त्रिभुवन निषाद के मार्गदर्शन में तैर रही सत्या की एकाग्रता देखने लायक थी। घाट पर मौजूद भीड़ का शोर और 'सत्या जिंदाबाद' के नारों ने मानों उसे ऊर्जा की एक नई लहर दे दी थी। माता-पिता और दादी की आँखों में डर नहीं, बल्कि अपनी बेटी के विश्वविजेता बनने का अटूट विश्वास चमक रहा था।
- यमुना नदी की 900 मीटर दूरी पार की
गुरुवार सुबह 7:45:28 बजे जब सत्या ने दूसरे छोर को छुआ तो प्रयागराज की माटी ने एक इतिहास बनते देखा। यह सिर्फ 900 मीटर की दूरी नहीं थी, बल्कि एक चार साल की बच्ची का वो संकल्प था जिसने असंभव शब्द की परिभाषा बदल दी। आज पूरा देश इस नन्हीं चैंपियन की ओर देख रहा है, जिसके सपनों में अभी से ओलंपिक के पदक चमकने लगे हैं।
- क्या कहते हैं नन्हीं जलपरी के कोच?
कोच त्रिभुवन निषाद कहते हैं कि सत्या की यह जीत महज एक रिकार्ड नहीं, बल्कि उन करोड़ों माता-पिता के लिए एक संदेश है कि प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती। आज यमुना की लहरें शांत हैं पर सत्या के हौसले की गूंज पूरे देश में सुनाई दे रही है। यह नन्हीं जलपरी कल जब बड़ी होगी, तो शायद समंदर भी छोटे पड़ जाएंगे, क्योंकि उसके सीने में धड़कता दिल किसी साधारण बच्ची का नहीं, बल्कि एक भविष्य की महाविजेता का है। लहरों ने तो सिर्फ रास्ता दिया था, इतिहास तो सत्या के हौसलों ने रचा है।
- माता-पिता और दादी के साथ पहुंची थी सत्या
सत्या का एडमिशन भी भारतीय विद्यापीठ स्कूल में इस वर्ष हुआ है। यमुना पार करने के लिए वह अपने पिता देवेंद्र कुमार, माता शिवानी भारतीय और दादी नीलम भारतीय के साथ महेवा घाट पर पहुंची तो वहां पहले से मौजूद दर्शकों ने ताली बजाकर उत्साह बढ़ाया। कोच कमला निषाद बताती हैं कि परिवार व रिश्तेदार सभी लोग दर्जनों नाव पर बैठकर मीरापुर सिंधु सागर घाट (बरगद घाट) की ओर पहुंचे । वहां सृष्टि निषाद, मानस निषाद व त्रिभुवन निषाद के साथ सत्या दूसरे नाव पर सवार हुई।
- प्रशिक्षक का इशारा पाकर यमुना में कूद गई सत्या भारती
सुबह 7:24 पर अपने प्रशिक्षक के इशारा पाते ही यमुना नदी में कूद गई और मछली के तरीके तैरना शुरू कर दिया साथ। दर्जनों नाव पर सवार दर्शकों ने गंगा मैया की जय, जमुना मैया की जय का उद्घोष किया। पूरी सुरक्षा के बीच सत्या भारती ने मात्र 21 मिनट 28 सेकंड में यमुना नदी को पार किया।
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