<!--Can't find substitution for tag [blog.voiceofbasti.page]--> - Voice of basti

Voice of basti

सच्ची और अच्छी खबरें

Breaking

वॉयस ऑफ बस्ती में आपका स्वागत है विज्ञापन देने के लिए सम्पर्क करें 9598462331

Wednesday, March 4, 2026

यमुना एक्सप्रेस-वे पर काल बनकर दौड़ी रफ्तार : हाथरस हादसे ने एक ही परिवार से छीन ली दो पीढ़ियों की उम्मीद


आगरा। उत्तर प्रदेश के हाथरस में यमुना एक्सप्रेस-वे पर हुआ भीषण सड़क हादसा सात जिंदगियां निगल गया। तेज रफ्तार कार और बस की टक्कर इतनी भयावह थी कि मौके पर ही सात लोगों ने दम तोड़ दिया। इन्हीं में चौरंगाबीहड़ गांव के हलवाई विजय और उनकी पत्नी पिंकी भी शामिल थे।
यह हादसा सिर्फ एक सड़क दुर्घटना नहीं, बल्कि एक परिवार के लिए जीवनभर का दर्द बन गया। छह महीने पहले ही बीमारी ने बड़े बेटे अजय बघेल को छीन लिया था। दिल्ली में हलवाई की दुकान चलाने वाले अजय की मौत के बाद छोटे भाई विजय ने पूरे परिवार की जिम्मेदारी संभाली थी। बूढ़े माता-पिता सुखराम और सुनीता की दवाइयां, बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च—सब कुछ विजय के कंधों पर था।
लेकिन मंगलवार सुबह आई एक फोन कॉल ने सब कुछ बदल दिया। हादसे की खबर सुनते ही घर में चीख-पुकार मच गई। सुनीता बेसुध होकर रोती रहीं—“भगवान, बेटों से पहले हमें उठा लेते… अब यह बुढ़ापा कैसे कटेगा?” सुखराम की आंखों में सिर्फ सूनापन है। जिन दो बेटों के सहारे जीवन की गाड़ी चल रही थी, वे दोनों एक साल के भीतर छिन गए।
परिवार के पांच बेटों में से एक अहमदाबाद में मजदूरी करता है, जबकि दो गांव में पशुपालन से जैसे-तैसे घर चला रहे हैं। मगर अजय के बाद विजय ही असली सहारा थे। अब वह सहारा भी टूट गया।हादसे में मासूम बच्चे भी घायल हुए हैं। एक साल का लक्ष्य, तीन साल की प्राची, आठ साल का आर्यन और छह साल की अंशु—इनके शरीर पर लगे जख्म परिवार के दिलों के जख्म से छोटे हैं। अस्पताल में बच्चों का इलाज चल रहा है और गांव में मातम पसरा है।
अजय की पत्नी प्रीति, जो पहले ही पति को खो चुकी थीं, अब देवर और देवरानी की मौत और बच्चों की हालत देखकर सुध-बुध खो बैठी हैं। विजय अपने भाई के बच्चों की पढ़ाई-लिखाई से लेकर भविष्य तक की जिम्मेदारी उठा रहे थे। अब सवाल है कि इन मासूमों का भविष्य कौन संभालेगा?
चौरंगाबीहड़ गांव में हर घर की आंखें नम हैं। होली के रंग इस बार गांव में फीके पड़ गए। मिठाई बनाने वाले हाथ अब हमेशा के लिए थम गए।एक ही साल में दो बेटों की चिता देखने वाले माता-पिता के आंसू यह सवाल पूछ रहे हैं—क्या किसी बूढ़े मां-बाप के लिए इससे बड़ा दुख हो सकता है?

No comments:

Post a Comment

Post Bottom Ad

Responsive Ads Here

Pages