बस्ती। जब-जब सृष्टि में अनीति, कुबुद्धि और कुविचार का विस्तार होता है, तब ईश्वर विभिन्न रूपों में अवतार लेकर जगत का मार्गदर्शन करते हैं। यह विचार कथा व्यास स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज ने नारायण सेवा संस्थान ट्रस्ट द्वारा आयोजित 9 दिवसीय संगीतमयी श्रीराम कथा के शुभारंभ अवसर पर व्यक्त किए। कार्यक्रम का आयोजन दुबौलिया बाजार स्थित राम विवाह मैदान में किया गया।
कथा का शुभारंभ “ऊं नमो भगवते वासुदेवाय” और हनुमान जी की आराधना से हुआ। स्वामी जी ने कहा कि “सियाराम मय सब जग जानी” — इस जगत में ऐसा कुछ भी नहीं है जो परमात्मा से भिन्न हो। उन्होंने बताया कि भक्ति भाव ही नहीं, बल्कि शत्रु भाव से भी जिसने परमात्मा को अपने चित्त में धारण किया, उसका भी कल्याण हुआ है। रावण, कंस और हिरण्यकश्यप जैसे उदाहरण इसका प्रमाण हैं।
शिव तत्व का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि जहां प्राकृतिक शत्रुता मित्रता में परिवर्तित हो जाए, वहीं शिव तत्व की अनुभूति होती है। उन्होंने श्रीराम कथा को कल्पवृक्ष के समान बताते हुए कहा कि श्रीराम का नाम युगों-युगों से करोड़ों जीवों का उद्धार कर रहा है, जबकि स्वयं श्रीराम ने केवल कुछ राक्षसों का वध किया था। उन्होंने यह भी कहा कि भगवान शंकर की कृपा के बिना श्रीराम के हृदय में प्रवेश संभव नहीं है।
कार्यक्रम के प्रथम दिन पूर्व विधायक अंबिका सिंह ने कथा व्यास का विधि-विधान से पूजन करते हुए कहा कि गांव-गांव श्रीराम कथा का आयोजन आवश्यक है, जिससे नई पीढ़ी श्रीराम की मर्यादा और त्याग को अपने जीवन में उतार सके। इससे एक स्वस्थ और समृद्ध समाज का निर्माण संभव है।
नारायण सेवा संस्थान ट्रस्ट के अध्यक्ष बाबूराम सिंह एडवोकेट ने कहा कि श्रीराम कथा धरती पर अमृत के समान है और रामचरितमानस केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि मानव समाज का मस्तक है।
इस अवसर पर कृष्ण दत्त दूबे, बालमुकुंद मिश्रा, अनिल भारती, अभिषेक सिंह सूर्यवंशी ने कथा व्यास का माल्यार्पण कर स्वागत किया। मुख्य यजमान संजीव सिंह ने वैदिक परंपरा के अनुसार पूजन किया।
कार्यक्रम में सह-आयोजक अनिल सिंह, हीरा सिंह, जगदंबा पांडेय, जीत बहादुर सिंह, सुरेंद्र बहादुर सिंह, घनश्याम सिंह, सुनील सिंह, जसवंत सिंह, अनूप सिंह, प्रमोद पांडेय, हर्षित, अरुण सिंह, मनोज गुप्ता, देवनारायण चौहान, नीरज गुप्ता, राधे गुप्ता, इंद्रपरी सिंह, विभा सिंह, शीला सिंह सहित बड़ी संख्या में क्षेत्रीय श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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