<!--Can't find substitution for tag [blog.voiceofbasti.page]--> - Voice of basti

Voice of basti

सच्ची और अच्छी खबरें

Breaking

वॉयस ऑफ बस्ती में आपका स्वागत है विज्ञापन देने के लिए सम्पर्क करें 9598462331

Friday, February 27, 2026

रंगभरी एकादशी पर भक्तिरस में डूबा देश


मथुरा। फाल्गुन मास की मस्ती अपने चरम पर है और देश के विभिन्न हिस्सों में रंग, अबीर और गुलाल की छटा बिखर गई है। ब्रज क्षेत्र के बरसाना, नंदगांव, मथुरा और वृंदावन में जहां लट्ठमार होली और पारंपरिक उत्सवों की धूम देखने को मिल रही है वहीं काशी में रंगभरी एकादशी के अवसर पर बाबा के दरबार में रंगों की अनोखी आभा देखने को मिली।
उत्तर प्रदेश के बरसाना में विश्व प्रसिद्ध लट्ठमार होली का आयोजन हर्ष और उल्लास के साथ हो रहा है। नंदगांव के हुरियारे परंपरागत वेशभूषा में बरसाना पहुंचे तो अलग ही छटा देखने को मिली। प्रिया कुंड पर उनका स्वागत मिठाई, पकवान और ठंडाई से किया गया। इसके बाद वे लाडली जी मंदिर में दर्शन कर रंगीली गली पहुंचे, जहां ढोल नगाड़ों की थाप पर होली के रसिया गूंज उठे। जैसे ही हुरियारों ने महिलाओं को रिझाने के लिए गीत गाए, हुरियारिनों ने प्रेम भरी लाठियां बरसानी शुरू कर दीं। पुरुषों ने ढाल से बचाव किया और पूरा वातावरण हंसी ठिठोली से गूंज उठा।
हम आपको बता दें कि यूपी प्रशासन की ओर से व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की गई है। मेला क्षेत्र को कई जोन और सेक्टर में बांटकर हजारों सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए हैं। प्रमुख स्थलों पर कैमरे और ड्रोन से निगरानी की गई। जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक स्वयं व्यवस्था पर नजर बनाए रहे। श्रद्धालुओं ने भी व्यवस्थाओं की सराहना की।
इसी क्रम में मथुरा और वृंदावन में भी होली का रंग चरम पर दिखाई दिया। मंदिरों में ठाकुर जी के संग गुलाल की होली खेली गई। बांके बिहारी मंदिर, राधा वल्लभ और अन्य प्रमुख मंदिरों में दर्शनार्थियों की लंबी कतारें लगी रहीं। टेसू के फूलों से बने प्राकृतिक रंगों की बौछार ने वातावरण को और भी सुरम्य बना दिया। विदेशी श्रद्धालु भी इस अनूठे उत्सव में शामिल होकर नाचते गाते नजर आए।
हम आपको बता दें कि ब्रज में होली का उत्सव बसंत पंचमी से आरंभ होकर कई सप्ताह तक चलता है, परंतु लट्ठमार होली और रंगभरनी एकादशी इसका विशेष आकर्षण माने जाते हैं। मान्यता है कि द्वापर काल में कान्हा अपने सखाओं के साथ बरसाना आकर राधा और सखियों को चिढ़ाते थे, तब सखियां उन्हें लाठियों से खदेड़ देती थीं। वही परंपरा आज भी जीवंत है।
उधर काशी में वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर में रंगभरी एकादशी का विशेष महत्व देखा गया। धार्मिक मान्यता है कि विवाह के बाद भगवान शिव माता पार्वती को पहली बार काशी लेकर आए थे और भक्तों ने रंगों से उनका स्वागत किया था। इसी परंपरा के तहत मंदिर परिसर में पुष्प, अबीर और गुलाल से होली खेली गई। साधु संतों और श्रद्धालुओं ने भक्ति गीतों के साथ उत्सव मनाया।
हम आपको बता दें कि रंगभरी एकादशी को आमलकी एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु, महादेव और आंवले के वृक्ष की पूजा का विधान है। प्रातः काल से ही श्रद्धालुओं ने व्रत रखकर पूजा अर्चना की और दान पुण्य किया। रंग, रस और भक्ति से सराबोर यह पर्व सामाजिक समरसता और प्रेम का संदेश देता है। बरसाना की लाठियों में जहां स्नेह छिपा है, वहीं मथुरा की गलियों में भक्ति का रंग और काशी में आस्था की छटा दिखाई देती है। फाल्गुन का यह उत्सव एक बार फिर देश को रंगों की डोर में बांधता नजर आया। अयोध्या में भी इस अवसर पर साधु संत झूमते नजर आये।

No comments:

Post a Comment

Post Bottom Ad

Responsive Ads Here

Pages