लखनऊ। केंद्र सरकार ने सभी मीडिया माध्यमों पर तेजी से बढ़ रही फेक न्यूज और एआई आधारित डीप फेक्स पर नियंत्रण के लिए कानूनी ढांचे को और मजबूत किया है। सरकार का कहना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत सुनिश्चित है, लेकिन भ्रामक सूचनाओं का प्रसार लोकतांत्रिक व्यवस्था और सार्वजनिक शांति के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। इसी खतरे को देखते हुए विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर गलत और झूठी सामग्री को रोकने के लिए व्यापक नियम लागू किए गए हैं।
सरकार ने बताया कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए केबल टेलीविजन नेटवर्क (विनियमन) अधिनियम, 1995 के तहत कार्यक्रम संहिता लागू है, जिसमें अश्लील, मानहानिकारक, झूठी और आधी-अधूरी सच्चाई वाली सामग्री प्रसारित करने पर प्रतिबंध है। इसके उल्लंघन पर तीन-स्तरीय शिकायत निवारण तंत्र के माध्यम से कार्रवाई की जाती है, जिसमें प्रसारकों द्वारा स्व-नियमन, स्व-नियामक संस्थाओं की निगरानी और अंततः केंद्र सरकार की पर्यवेक्षण शक्ति शामिल है। आवश्यक होने पर चैनलों को चेतावनी, सलाह, क्षमा याचना या अस्थायी ऑफ-एयर जैसे निर्देश जारी किए जाते हैं।
प्रिंट मीडिया के लिए प्रेस परिषद द्वारा जारी पत्रकारिता आचार संहिता भ्रामक व फर्जी समाचारों के प्रकाशन को रोकती है। परिषद उल्लंघन की शिकायतों की जांच कर संबंधित अखबारों और पत्रकारों पर आवश्यक कार्रवाई करती है।
वहीं डिजिटल मीडिया को आईटी नियम 2021 के तहत नियंत्रित किया गया है। मध्यस्थों को यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि उपयोगकर्ता स्पष्ट रूप से झूठी या भ्रामक जानकारी साझा न करें। इन नियमों में भी तीन-स्तरीय शिकायत निवारण तंत्र और शिकायत अधिकारी की नियुक्ति का प्रावधान है। आईटी अधिनियम की धारा 69A के तहत सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और संप्रभुता से जुड़ी गलत सामग्री पर रोक लगा सकती है।
फेक न्यूज की पहचान के लिए पीआईबी की फैक्ट चेक यूनिट सक्रिय है, जो सरकारी स्रोतों से जानकारी सत्यापित कर भ्रामक सूचनाओं का खंडन करती है। सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने यह जानकारी राज्यसभा में मोहम्मद नदीमुल हक के प्रश्न के लिखित उत्तर में दी।

No comments:
Post a Comment