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Tuesday, September 14, 2021

14 सितम्बर हिन्दी दिवस नहीं, राजभाषा दिवस है : प्रो. उमेश सिंह

 राजभाषा दिवस पर राष्ट्रीय संगोष्ठी हिन्दी हम सबकी’ का आयोजनहिन्दी पत्रकारितासाहित्य एवं भाषा पर हुआ विचार विमर्श

भोपाल। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव के अंतर्गत राष्ट्र भाषा दिवस पर राष्ट्रीय संगोष्ठी 'हिन्दी हम सबकीका आयोजन किया गया। वक्ता प्रो. उमेश सिंह ने कहा कि आज का दिन राजभाषा दिवस के नाते मनाया जाना चाहिए क्योंकि 14 सितम्बर1949 को संविधान में हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया गया। कुलपति प्रो. केजी सुरेश ने उनकी इस बात को सहमती प्रदान की और कहा कि हिन्दी का कोई एक दिन नहींसभी दिन हिन्दी के हैं। आज के दिन को राजभाषा दिवस के रूप में मनाया जाना ही ठीक है।

            भाषा और हिन्दी’ विषय पर उच्च शिक्षा विभाग की स्वामी विवेकानंद करियर मार्गदर्शन योजना के निदेशक प्रो. उमेश सिंह ने कहा कि दो प्रकार की सत्ता हैं- राष्ट्र सत्ता और राजसत्ता। भाषा को लेकर सारा विवाद राजसत्ता में है। हमारे यहाँ राष्ट्र सत्ता में भाषा को लेकर कोई विवाद नहीं हैं। उन्होंने कहा कि पारलौकिक और लौकिक सत्ता के साथ जुड़कर भाषा हमारे साथ चलती है।

            पत्रकारिता और हिन्दी’ विषय पर वरिष्ठ पत्रकार श्री अनंत विजय ने कहा कि हमें हिन्दी को दैनिक जीवन में आत्मसात करने की आवश्यकता है क्योंकि यही वह भाषा है जो संचार में आत्मीयता और माधुर्य लाती है। पत्रकारिता में सर्वाधिक प्रचलित यदि कोई भाषा है तो वह हिंदी ही है। हिन्दी पत्रकारिता के मूर्धन्य पत्रकारों के योगदान का उल्लेख भी श्री विजय ने अपने उद्बोधन में किया। उन्होंने कहा कि हिन्दी हमें राष्ट्र संपर्क भाषा के तौर पर अपनाना चाहिए। हिन्दी को हम राष्ट्रभाषा के तौर पर अपनाएंगे तो सभी भारतीय भाषाएँ ज्ञान का एक संसार रचेंगी। उन्होंने कहा कि हिन्दी का आज बहुत विस्तार हो गया है। उसने खुली बाहों से अन्य भाषाओँ के शब्दों को स्वीकार किया है। लेकिन किसी भी भाषा में शब्द को उस भाषा की प्रकृति एवं स्वाभाव के अनुरूप शामिल करना चाहिए।

            साहित्य और हिन्दी’ विषय पर दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय की निदेशक एवं साहित्यकार प्रो. कुमुद शर्मा ने कहा कि सरस्वती पत्रिका हिन्दी की पाठशाला थी। निराला जैसे कवि को पहले हिन्दी नहीं आती थी। जब उनकी पत्नी ने कहा कि आपको हिन्दी तो आती ही नहीं। तब सरस्वती के माध्यम से उन्होंने हिन्दी सीखी और हिन्दी के बहुत बड़े कवि बन गए। उन्होंने कहा कि स्वाधीनता के बाद की कविता में भी राष्ट्रीय चेतना और राष्ट्रबोध का भाव बना रहा है। स्वतंत्र के बाद के 75 वर्ष का साहित्य अगर हम देखें तो हमें उसमें राष्ट्रीय स्वर स्पष्ट रूप से सुनाई देते हैं।

            कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे कुलपति प्रो. केजी सुरेश ने कहा कि हमें हर वह संभव प्रयास करना चाहिए जिससे हमारी भाषा और भी उन्नत हो सके। भाषाओं के नाम पर अनावश्यक विवाद नहीं होना चाहिए। यह समय की आवश्यकता है कि आज हम हिन्दी को संपर्क की भाषा के रूप में स्थापित करें। इस संगोष्ठी का समन्वय एवं संचालन जनसंपर्क अधिकारी श्री लोकेन्द्र सिंह ने किया। इस अवसर पर सभी विभागों के अध्यक्षशिक्षा एवं अधिकारीगण उपस्थित रहे। संगोष्ठी का आयोजन विश्वविद्यालय की प्रेमचंद साहित्य परिषद्’ द्वारा किया गया।


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