<!--Can't find substitution for tag [blog.voiceofbasti.page]--> - Voice of basti

Voice of basti

सच्ची और अच्छी खबरें

Breaking

वॉयस ऑफ बस्ती में आपका स्वागत है विज्ञापन देने के लिए सम्पर्क करें 9598462331

Wednesday, August 19, 2026

प्राकृतिक खेती - सतत कृषि और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम- डॉ. देवेश चतुर्वेदी


भारत ने पिछले दशक में कृषि क्षेत्र में तेज प्रगति की है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, पिछले 5 सालों में विकास दर 4% से अधिक रही है। खाद्यान्न, बागवानी और तेलहन फसलों का बंपर उत्पादन हुआ है। यह किसानों द्वारा नई तकनीकों को अपनाने और सिंचाई वाले क्षेत्र का विस्तार, बेहतर जल उपयोग दक्षता और समय पर व पर्याप्त मात्रा में उर्वरक उपलब्धता जैसी सरकार की ठोस नीतियों के समर्थन का परिणाम है। बागवानी फसलों की हिस्सेदारी भी काफ़ी बढ़ रही है और इसकी विकास दर अपेक्षाकृत अधिक है।      

हालांकि, रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग को लेकर भी चिंताएं बढ़ रही हैं, जिसके कारण मिट्टी की उर्वरता में गिरावट और प्रमुख फसलों की उत्पादकता में स्थिरता आ रही है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, नाइट्रोजन उपयोग दक्षता (एनयूई) में धीरे-धीरे आई कमी के कारण एक ऐसा दुष्चक्र बन गया है, जिसमें किसान रासायनिक खादों की मात्रा तो लगातार बढ़ा रहे हैं, लेकिन उत्पादकता में बहुत मामूली बढ़ोतरी ही हो रही है।    
सरकार की मृदा स्वाथ्य और उर्वरक योजना के तहत 26 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्डों का वितरण किया गया है। इससे प्राप्त डेटा के अखिल-इंडिया विश्लेषण से चिंताजनक बात सामने आई है कि मिट्टी में जैविक कार्बन (एसओसी)  और अन्य जरूरी सूक्ष्म-पोषक तत्वों की भारी कमी है। स्वस्थ मिट्टी में एसओसी 1% से अधिक होना चाहिए, लेकिन यह औसतन 0.5% के आसपास है और कुछ क्षेत्रों में यह 0.3% तक के यह खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है।
कम मात्रा में एसओसी से मिट्टी की सरंध्रता कम हो जाती है, जिसका दोहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है: पानी का जमीन में रिसाव और जल धारण क्षमता, दोनों में कमी आती है। परिणामस्वरूप, वर्षा और सिंचाई का पानी बह जाता है, जो ऊपरी मिट्टी को बहा ले जाता है और न तो यह जमीन के नीचे जाकर भूजल स्तर बढ़ा पाता है और न ही पौधों की वृद्धि के लिए आसानी से उपलब्ध रहता है।
कम एसओसी का एक और नकारात्मक प्रभाव यह है कि ऐसे मिट्टी पर उगाए जाने वाले पौधों की पोषक तत्व अवशोषण क्षमता कम हो जाती है। समान उत्पादकता स्तर तक पहुँचने के लिए अधिक से अधिक उर्वरकों की आवश्यकता होती है। रासायनिक उर्वरकों की बढ़ी हुई खुराक उर्वरक उपयोग दक्षता को और कम कर देती है, जिससे मृदा-स्वास्थ्य का नुकसान होता है और देश रासायनिक उर्वरकों या उनके घरेलू उत्पादन के कच्चे माल को आयात करने में अपनी कीमती विदेशी मुद्रा खर्च करता है।  
अत्यधिक रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों के असंतुलित उपयोग ने उन लाभकारी सूक्ष्मजीवों और कीड़ों को भी कम कर दिया है, जो मिट्टी की सरंध्रता को बेहतर बनाने और गहरी मिट्टी से पोषक तत्वों को ऊपरी मिट्टी तक स्थानांतरित करने में मदद करते हैं, ताकि पौधे उन्हें अवशोषित कर सकें।
एक अन्य चिंताजनक प्रभाव उपज की गुणवत्ता और सुरक्षा पर पड़ता है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि रसायन खाने-पीने और पशु चारे की श्रृंखला में पहुँच जायेंगे और आखिरकार मानव स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा करेंगे। ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें फलों, सब्जियों, अनाज और अन्य वाणिज्यिक फसलों में कीटनाशकों का न्यूनतम अवशेष स्तर तय सीमा को पार कर गया है, जिसके चलते निर्यात की खेपें रद्द होती हैं और वैश्विक बाजार में ब्रांड इंडिया की छवि पर बुरा पड़ता है।
हालांकि ये चिंताएँ कुछ समय से व्यक्त की जा रही हैं, लेकिन सरकार ने वर्ष 2024 में राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन की शुरुआत की, जिसका मुख्य उद्देश्य सतत कृषि के लिए पशुधन या गाय आधारित रसायन मुक्त खेती को बढ़ावा देना है, ताकि मिट्टी की सेहत खासकर एसओसी में सुधार हो सके, पौष्टिक तत्वों के अवशोषण की क्षमता बढ़ सके और रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों पर देश की निर्भरता कम हो सके।
प्राकृतिक खेती, जिसे इसके समर्थकों द्वारा आमतौर पर 'जीरो बजट खेती' कहा जाता है, एक ऐसी तकनीक पर आधारित है, जिसे किसानों ने कई सालों तक आज़माया और परखा है तथा इसे मान्यता दी है। इसके परिणाम भी बहुत उत्साहजनक रहे हैं। यह एक समग्र तकनीकी समाधान पर आधारित है, जिसमें स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री का उपयोग किया जाता है, जैसे स्थानीय नस्ल की गाय का गोबर और गोमूत्र, जिनकी लागत किसान के लिए लगभग शून्य होती है।
बीजों के उपचार में इस्तेमाल होने वाला बीजामृत सूत्र बेहतर अंकुरण और मजबूत पौधों में मदद करता है, जबकि  जीवामृत, घन-जीवामृत और सप्तयांकुर का उपचार मित्र सूक्ष्मजीवों की मौजूदगी और मृदा-उत्पादकता को काफी बढ़ा देता है। पौधों के स्वास्थ्य की रक्षा सौंठास्त्र और खट्टी लस्सी के इस्तेमाल से की जाती है, जो बैक्टीरिया और फफूंद संक्रमण को रोकते हैं, जबकि विभिन्न प्रकार के कीड़ों और कीट को नियंत्रित करने के लिए 'नीमास्त्र', 'ब्रह्मास्त्र', 'अग्निअस्त्र' और 'दशपर्णी अर्क' का प्रयोग किया जाता है।
उपरोक्त सभी उपचारों की सावधानीपूर्वक तैयारी और उचित मात्रा में उपयोग से मिट्टी की सेहत के बेहतर परिणाम मिले हैं और उत्पादकता पर भी कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है, जबकि उपज की गुणवत्ता में सुधार हुआ है।
मिशन राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के सहयोग से प्रगति कर रहा है, जिसका लक्षित क्षेत्र 7.5 लाख हेक्टेयर से अधिक है और यह 18 लाख से अधिक किसानों को कम से कम 50 हेक्टेयर के क्लस्टर में कवर करता है। कृषि विज्ञान केंद्रों के प्रशिक्षित वैज्ञानिकों की टीम, जिसे किसान प्रशिक्षक और कृषि सखी संसाधन व्यक्ति के रूप में सहायता प्रदान कर रहे हैं, किसानो को जागरूक कर रही है, प्रशिक्षण दे रही है और इस खेती को अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है।
जिन किसानों के पास स्थानीय नस्ल की गायें हैं, उन्हें खेत पर ही इन उपचारों को तैयार करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। साथ ही, बड़ी संख्या में जैव-इनपुट संसाधन केंद्र भी मुख्य रूप से स्थानीय डेयरियों या पशु आश्रय गृहों के निकट स्थापित किए गए हैं, ताकि ये उपचार किसानों को मामूली कीमत पर उपलब्ध कराए जा सकें।
यह मिशन विज्ञान-आधारित रणनीति के माध्यम से लागू किया जा रहा है, ताकि किसान इन प्रथाओं को बिना किसी संदेह या हिचकिचाहट के अपना सकें। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने क्षेत्र और फ़सल-विशिष्ट क्षमता मानचित्र विकसित किए हैं, जो यह दर्शाते हैं कि प्राकृतिक खेती कहाँ प्रभावी होगी। आईसीएआर के संस्थानों और कृषि विश्वविद्यालयों में इस देसी तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए इसकी प्रभावशीलता को वैज्ञानिक रूप से मान्यता देने के लिए ठोस प्रयास किये जा रहे हैं। आईसीएआर संस्थानों की निगरानी में किए गए कई प्रयोगों ने कई फसलों के लिए बहुत सकारात्मक परिणाम दिए हैं और अब मिशन के ज़रिए इनका प्रचार-प्रसार किया जा रहा है।
प्राकृतिक उत्पादों का विपणन एक और महत्वपूर्ण रणनीति है, जो किसानों की आय में वृद्धि करेगी और उन्हें इन प्रथाओं को जारी रखने के लिए प्रेरित करेगी। राष्ट्रीय जैविक और प्राकृतिक कृषि केंद्र (एनसीओएनएफ) ने प्राकृतिक खेती के लिए प्रमाणीकरण नियम बनाये हैं। बड़ी संख्या में किसानों ने पहले ही सहभागी गारंटी प्रणाली (पीजीएस) प्रमाणपत्र प्राप्त कर लिए हैं, जिससे वे अपने प्रमाणित विशिष्ट उत्पाद को ऊंची कीमतों पर बेच सकते हैं।
एक तरफ जहां इस मिशन के तहत प्रमाणन, विपणन और ब्रांडिंग के साथ शुद्ध प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ एक हाइब्रिड मॉडल को प्रोत्साहन देने की रणनीति में यह दिखाया गया है कि प्राकृतिक खेती की प्रथाओं को अपनाने और रासायनिक उर्वरकों की खुराक को कम करने से भी लंबे समय तक उत्पादकता बनी रह सकती है और मिट्टी का स्वास्थ्य बेहतर हो सकता है। इस मॉडल को व्यापक स्वीकार्यता मिल सकती है। इसे अपनाने वाले किसानों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि हाइब्रिड मॉडल में प्राकृतिक खेती की प्रथाओं को अपनाने से रासायनिक उर्वरकों पर धीरे-धीरे निर्भरता कम होती है। यहाँ तक कि कुछ समय बाद, किसान कई फसलों में रासायनिक खाद का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर सकते हैं और फिर भी उतनी ही पैदावार और आमदनी बनाए रख सकते हैं।
मध्य पूर्व में चल रहे मौजूदा संकट से पैदा हुई चुनौतियों का सामना करने के लिए, हमारे माननीय प्रधानमंत्री ने देश के नागरिकों से सात सूत्रीय अपील की है, जिनमें रासायनिक खाद का समझदारी से इस्तेमाल और प्राकृतिक खेती को अपनाना शामिल हैं।
एक ओर जहाँ प्राकृतिक खेती को अपनाने से खेती में स्थायित्व आ रहा है, वहीं दूसरी ओर इससे पशुधन के आर्थिक मूल्य को बढ़ाने में भी मदद मिल रही है, जिनका आम तौर पर दूध देने की उम्र खत्म होने के बाद परित्याग कर दिया जाता है। इसका एक और फ़ायदा यह है कि घरेलु उपभोग और निर्यात के लिए सुरक्षित भोजन मिलता है, साथ ही देश की कीमती विदेशी मुद्रा की भी बचत होती है।            
……………………..
(लेखक भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के पूर्व सचिव हैं)

No comments:

Post a Comment

Pages