- श्री राजेश अग्रवाल, सचिव, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के वाणिज्य विभाग
भारत का यूरोप के साथ 250 ईसा पूर्व से एक समृद्ध व्यापारिक संबंध रहा है, जो सिल्क रोड से भी पहले की अवधि है। अगले 2000 वर्षों के अधिकांश हिस्से के दौरान, भारतीय मसलिन, कपास, हस्तशिल्प, मसाले, पन्ना और रत्न अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की सबसे पसंदीदा वस्तुओं में शुमार होते थे, जिनमें से अधिकांश यूरोप तक पहुँचती थीं। इन शानदार वस्तुओं के भुगतान के तौर पर भारत को सोना और चांदी मिलते थे। अपने सुनहरे दिनों में, भारत-यूरोप व्यापार ने मात्रा और पैमाने की दृष्टि से अभूतपूर्व वृद्धि हासिल की।
एक व्यापक मुक्त व्यापार समझौते के माध्यम से इस संबंध को सुदृढ़ करने के प्रयास 2007 में शुरू हुए थे। गंभीर मतभेदों के कारण 2013 में बातचीत को रोकना पड़ा, क्योंकि कई मुद्दों पर दोनों पक्षों के विचार अलग थे। 2022 में बातचीत फिर से शुरू हुई और चुनौतियों की जटिलता के बावजूद इसे केवल दोनों राजनेताओं की मजबूत प्रतिबद्धता और दूरदर्शी नेतृत्व के कारण अंतिम रूप दिया जा सका। महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस व्यापार समझौते को दोनों पक्षों ने बातचीत के माध्यम से पूरा किया है, वह अस्थिर वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में नियम-आधारित व्यापार संबंध की पुष्टि करता है। यह समझौता ऐतिहासिक है सिर्फ इसलिए नहीं कि इसमें शामिल विषय और क्षेत्र व्यापक हैं; समझौता ऐतिहासिक इसलिए भी है क्योंकि दोनों पक्षों को ऐसे मुद्दों पर साझा रुख अपनाना पड़ा, जो कठिन और जटिल थे।
सबसे महत्वपूर्ण व्यापार समझौता: भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता शायद हाल के समय में किया गया सबसे महत्वपूर्ण व्यापार समझौता है। यह दुनिया के सबसे बड़े मुक्त व्यापार क्षेत्रों में से एक का निर्माण कर सकता है, जिसमें लगभग 2 अरब लोग और 28 देश शामिल होंगे और जो वैश्विक जीडीपी का 25 प्रतिशत है। इसके अलावा, यह समझौता मुद्दों और चिंताओं के समाधान के सन्दर्भ में आधुनिक और नवीन है। इस समझौते में व्यापार संबंध को प्रगाढ़ करने के लिए अद्यतन और मूल विषयों के साथ-साथ प्रक्रिया-संबंधी प्रावधान भी हैं। यह समझौता वस्तु और सेवा; दोनों के लिए बाजार पहुंच और नियामक बाधाओं के समाधान के लिए एक नया मॉडल स्थापित करता है, जो पारंपरिक विषयों को नवाचार-तत्वों के साथ सुदृढ़ करता है। उदाहरण के लिए, उत्पत्ति के नियमों का अध्याय सुनिश्चित करता है कि केवल वही उत्पाद जिनका पर्याप्त प्रसंस्करण या उत्पादन साझेदार देशों में हुआ है, उन्हें मूल देश का प्रमाण दिया जाएगा; इसे विस्तृत और जटिल उत्पाद-विशिष्ट नियमों के माध्यम से हासिल किया गया है, जो मौजूदा और नयी आपूर्ति श्रृंखलाओं के अनुरूप हैं। इसके अलावा, यह समझौता बौद्धिक संपदा संरक्षण को पुनर्स्थापित करता है और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण व सूचना प्रवाह को बढ़ावा देने पर अतिरिक्त ध्यान केंद्रित करता है।
वस्तु और सेवाओं के लिए बाजार खोलना: समझौते का मुख्य ध्यान दोनों पक्षों के विशाल और व्यापक बाजारों को एक-दूसरे के लिए खोलना है। यह समझौता भारत के निर्यात व्यापार मूल्य के 99 प्रतिशत से अधिक के लिए बाजार पहुँच प्रदान करता है, जिसमें कम से कम 90 प्रतिशत भारतीय निर्यात को समझौते के लागू होने पर तुरंत निःशुल्क प्रवेश की सुविधा मिलेगी। विशेष रूप से, श्रम-सघन वस्तुएँ जैसे वस्त्र और परिधान, चमड़ा, रत्न और आभूषण, लकड़ी और लकड़ी की शिल्पकला और समुद्री उत्पादों को जल्दी लाभ मिलेगा। यह रसायन, इलेक्ट्रॉनिक्स, कृषि-प्रसंस्करण उद्योग और खनिज जैसे उद्योगों को भी जीवंत ईयू सामान्य बाजार में अपने निर्यात को विविधता देने में सक्षम करेगा। हालांकि, भारत ने ईयू वाहन के लिए बाजार पहुँच की अनुमति दी है, लेकिन इसे चरणबद्ध और सन्तुलित तरीके से टैरिफ कोटा के माध्यम से अंतिम रूप दिया गया है। इसी तरह, यूरोपीय संघ की शराब पर भारत की छूट घरेलू उद्योग के हितों की रक्षा करने के साथ-साथ उच्च मूल्य वर्ग में प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करती है।
सेवाओं के व्यापार के लिए भारत-ईयू व्यापार संबंध में महत्वपूर्ण संभावनाएँ हैं। इस समझौते के तहत भारत ने 144 सेवा क्षेत्रों में ईयू की प्रतिबद्धताएँ प्राप्त की हैं, जो कि अभूतपूर्व है। इसके अलावा, गतिशीलता पर अध्याय यह सुनिश्चित करता है कि पेशेवरों और संविदा सेवा प्रदाताओं का अस्थायी प्रवेश और निवास सरल और भरोसेमंद होगा, जिसका अर्थ है कि भारत के प्रतिभाशाली सेवा पेशेवर ईयू बाजार में अपनी उपस्थिति दर्ज कर सकते हैं। वित्तीय सेवाओं पर संलग्नक भारत और ईयू के बीच इलेक्ट्रॉनिक भुगतान प्रणालियों पर अधिक सहभागिता का प्रावधान करता है, जिसमें भारत की डिजिटल भुगतान प्रणालियों जैसे यूपीआई में तकनीकी विशेषज्ञता का उपयोग शामिल है। यह समझौता आयुष और पारंपरिक चिकित्सा कर्मियों को भी अधिक निश्चितता के साथ ईयू में अपनी सेवाएँ प्रदान करने की संभावना पेश करता है।
मुक्त और न्यायसंगत व्यापार को बढ़ावा देना: मुक्त व्यापार समझौता दो बड़े बाजारों के बीच मुक्त, न्यायसंगत और पारस्परिक रूप से लाभकारी संबंध को बढ़ावा देने का प्रयास करता है। व्यापार और सतत विकास अध्याय सतत विकास संबंधी चिंताओं के संदर्भ में सहयोग का एक नया मॉडल प्रस्तुत करता है। यह अध्याय दोनों पक्षों के श्रम या पर्यावरण मानकों में तालमेल बिठाये बिना दोनों पक्षों के व्यापार संबंध में सतत विकास के उद्देश्य को समग्र रूप से एकीकृत करता है। इस सहभागिता का मुख्य उद्देश्य नीति संवाद, तकनीकी सहायता और वित्तीय उपकरणों और संसाधनों को जुटाने पर है। दोनों पक्षों ने त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र, गैर-उल्लंघन शिकायतें और स्वतंत्र परिशिष्ट जैसी व्यवस्थाओं पर भी बातचीत की है, जो कुछ नीति उपायों या उत्पाद-विशिष्ट उपायों के संबंध में उनकी विशिष्ट चिंताओं का समाधान कर सकते हैं।
असल चुनौती यह थी कि कुछ महत्वपूर्ण हितधारकों, जैसे कि डेयरी और कृषि क्षेत्र, की चिंताओं और संवेदनशीलताओं की अनदेखी किए बिना बाजार खोलने के उच्च महत्वाकांक्षा को हासिल किया जा सके। छोटे और सीमांत किसानों और कुछ उद्योग क्षेत्रों की आय और जीवनयापन की चिंताएं हमारे मन में सबसे पहले थीं। ईमानदारी से कहें तो, इस मामले में यूरोपीय संघ ने आवश्यक लचीलापन भी दिखाया।
भारत की एफटीए रणनीति का पूरक: आपूर्ति श्रृंखला व्यवधान के युग में, भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता; भारत-यूके एफटीए, ईएफटीए और अन्य व्यापक व्यापार समझौतों से हुए लाभ में पूरक की भूमिका निभाएगा। 2021 से, भारत ने 9 व्यापक व्यापार समझौते किए हैं और अगले कुछ महीनों में कई प्रमुख आर्थिक साझेदारी समझौतों को अंतिम रूप देने के लिए वार्ता कर रहा है। भारत-ईयू व्यापार समझौते का निष्कर्ष भारत की नई आर्थिक और व्यापारिक पहलों को तेज करने के लिए उत्प्रेरक के रूप में कार्य करेगा।
भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता विस्तारित बाजार पहुंच, नजदीकी आर्थिक एकीकरण और विशेष रूप से अनिश्चित और अस्थिर वैश्विक अर्थव्यवस्था में रणनीतिक स्वायत्तता और सुदृढ़ता प्राप्त करने में एक बड़ा कदम है। जैसा कि आर्थिक इतिहासकार उल्लेख करते हैं, आर्थिक समृद्धि सबसे अच्छे तरीके से तब प्राप्त की जा सकती है जब राष्ट्र न्यायपूर्ण, नियम-आधारित और पूर्व अनुमान योग्य कानूनी रूपरेखा और संस्थानों के आधार पर व्यापार करते हैं। भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता समय पर खरे उतरे इस सिद्धांत को बनाए रखने का प्रयास करता है।
(लेखक वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के वाणिज्य विभाग के सचिव हैं।)

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