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Monday, August 7, 2023

निर्देशों की उड़ रही धज्जिया, शहर बना तबेला

बस्ती। डीएम, सीडीओ, नगरपालिका अध्यक्ष एवं अधिशाषी अधिकारी की लापरवाही और खाऊ कमाऊ नीति के चलते बस्ती जनपद का शहरी क्षेत्र तबेला बन चुका है। कहीं भी जाइये 4/6 छुट्टा जानवर सड़कों और गलियों में आपका रास्ता रोकने, घायल करने या आपको जान से मारने के लिये बैठे नजर आ जायेंगे। ताजा नज़ारा गांधीनगर स्थित एनआर होटल के सामने का है। यही हाल पूरे शहर का है, मुख्य मार्ग हो या गली मोहल्ले हर जगह छुट्टा जानवरों का आतंक कायम है। कई बार लोग छुट्टा जानवरों की चपेट में आकर घायल हो रहे हैं या जांन तक गंवा रहे हैं। गाँवों में भी इनके वजह से न जाने कितने फसल बर्बाद हो जाते है,लेकिन जिम्मेदारों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है।


 

लेकिन डीएम, सीडीओ महज फरमान जारी करके आखों पर एक ऐसा चश्मा लगा लेते हैं जिसमे सिर्फ ‘आल इज वेल’ दिखाई देता है। जनपदवासियो की मुसीबत से किसी को लेना देना नही है। हालांकि डीएम, सीडीओ ने अलग अलग तारीखों पर अनेक आदेश जारी कर चुके हैं जिसमे कैटर कैचर से छुट्टा जानवरों को पकड़कर उन्हे गौशालाओं में संरक्षित करने का स्पष्ट आदेश है। किन्तु इन आदेशों का पालन हुआ या नही, कभी इसकी समीक्षा धरातल पर उतरकर नही की। समीक्षा सिर्फ कागजी रही तथा अधिकारियों के बयान या कलेक्ट्रेट सभागार तक ही सीमित रही।

नगरपालिका के अधिशाषी अधिकारी दुर्गेश्वर त्रिपाठी से इस मामले में बात किया, पूछा गया छुट्टा जानवरों को संरक्षित करने के लिये सालाना कितना धन नगरपालिका से खर्च होता है ? उन्होने कहा इसकी जानकारी नही है। गो संरक्षण के इंचार्ज सत्यदेव शुक्ला से पूछिये। उनसे पूछा तो पता चला शासन से 25 से 30 लाख रूपया गो संरक्षण के मद में प्राप्त होता है। यह कम पड़ जाता है, या इसका बंदरबांट हो जाता है ? इसका जवाब जिम्मेदारों के पास होगा, लेकिन सवाल जनता के पास है, जो नागरिक अपनी गाढ़ी कमाई से सरकार का खजाना भरते हैं उनकी कुछ मूलभूत जरूरतें हैं या नहीं ? उन्हे रहने के लिये एक सुरक्षित परिवेश चाहिये या नहीं ?जनता को उस वक्त का इंतजार रहेगा जब मुख्यमंत्री से लेकर डीएम, सीडीओ के आदेशों का असर धरातल पर भी दिखाई देगा।


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